इलाहाबाद कल आज और....संकल्प-साधना और सपनों को साकार कराने वाला शहर

  • Hasnain
  • Monday | 26th March, 2018
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संक्षेप:

  • `भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन` की साधना भी कम कठिन नहीं रही
  • हनुमान जी के प्रबल उपासक और भक्त थे प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
  • यास्मिन सुल्ताना` जापान में वहां के लोगों को हिन्दी भाषा का कराया ज्ञान

--वीरेन्द्र मिश्र

साधना। तप। अनुष्ठान और जीवन संघर्ष में शरणागत् होकर कुछ पा लेने की अनवरत तपश्चर्या कई मायनों में इंसान को दैवत्व से मिलने का मार्ग सुझाती है और गंगा का बालू भरा झुलसता रेतीला मैदान हो अथवा चिल्ला जाड़ा पडऩे पर बर्फ की सी ठंडक और शीत से पगा रेत का मैदान उन सभी जगहों पर इस धरती का आम जीवन भी अपने स्वयं के कथानक में साधनारत ही जान पड़ता है। हर प्रसंग अनवरत अपनी धुन की धारा में प्रवाहित होता रहा है, किन्तु यहां संस्कार भी निरन्तरा बदलता ही रहा है। जो भी बाहर से यहां पहुंचा। पांव पसारें जीवन को दो-चार किया नहीं, कामयाबी की डोर पर चढ़ आगे निकलता गया। अपने सपनों को साकार कर दिखाना यहां की मिट्टी की पहचान से जुड़ा है।

साहित्य की धारा बही, तो बस बह चली। राजनीति की दुनिया हो अथवा अध्यात्म जीवन कोई भी क्षेत्र मलीनता में नहीं रहता है। जैसे `कांटो की सेज` है तो ये कहावत, किन्तु संगम के किनारे `बबूल के कांटों की सेज` पर आराम से लेटा हुआ, पसरा साधु अपना जीवन जीता है। `खड़ेसी बाबा` तो यथा नाम: तथा गुणा: यानी वर्षों से कभी ये बाबा बैठे ही नहीं, बस खड़े-खड़े ही अपना जीवन जीते है। यहां उनकी साधना का पर्याय है `एक पैर पर खड़ा` जीवन। कितना कठिन साध्य है, यह भी यहीं दिखता है और ऐसे तपस्वी को पहचाना भी जा सकता है। खुले आसमान के नीचे पूष-माघ यानी नवम्बर-दिसम्बर जनवरी के महीने में बालू रेती पर रात के अंधेरे में चिल्ला जाड़ा और बर्फीले शीत की पखाह किये बगैर लोग यहां जीते है। महात्मा जी ने एक हाथ उठाये रखने का संकल्प साधना ठान ली, तो 20 वर्ष हो जाने के बाद भी हाथ नीचे नहीं झुका हर सावन-भादो जेठ सहता ही रहा है। वह कुम्भ में जरूर दिखते हैं।

ज्यादा दूर क्यों जायें `त्रिवेणी संगम` का किनारा तो पूरी तरह से हर माघ के महीने में `कल्पवासियों` का जीवन जीने वालों की संगम तट पर झोपड़ी, टेंट और घास-फूस की टटिया/छावनी में जीवन जीना आम फितरत बन जाती है, जो महीने भर की साधना और सुबह-शाम गंगा स्नान सन्ध्या वन्दन कर वहीं उसी बालू-रेती में भोजन पकाकर, उसका सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करना, उनकी आम बात होती है। ऐसे साधनारत गृहस्थ जीवन धर्मी का `सेजियादान` करने की तो एक परम्परा भी यहां काम करती है, जो पूरे `बारह वर्ष` तक लगातार कल्पवास करने के बाद `सेजियादान` करते है, जिसमें अपने जीवन के हर `मर्म-धन-सम्पदा` यहां तक कि आटा-दाल-चावल, बिछावन सहित अन्य सारी सामग्री का दान करते है और तो और यहां तीर्थ पुरोहित उस दान को पाने के लिए ललायित रहते है। पूरा शहर यहां के तीर्थ पुरोहितों पण्डा समाज भव्य जीवनशाला को युगों से देखता आ रहा है।

ये यहां के दारागंज, कीटगंज, अहियापुर, मालवीय नगर, नई बस्ती, मोहत्सिम गंज में वास करने वाले पण्डा समाज है, जिनकी ज्ञान, ध्यान और अध्यात्म सम्पदा भी ऐसे दान-पुण्य लाभ कमाने वालों के भरोसे ही चलती है, जिनमें राजा, महाराजा, रंक, किसान, सन्यासी, जीवटवासी सभी स्त्री-पुुरुष शामिल रहते हैं यानी दानशीलता के भाव और उससे मिली अपार शान्ति, सेहतमन्द बने रहने की परिकल्पना में बारीकी से जान समझ कर अनुभव किया जा सकता है।

आज हम बात करते है `अनकही-अनसुनी` से जुड़े कुछ कथानकों की जो विश्व पटल पर स्थापित हैं।

इन्होंने यहां त्रिवेणी तट पर साधना कर के तमाम युगों के कालछन्द बदलने में कामयाब हुए और आज देश-दुनिया में मिसाल हैं। जो ठाना वह पूरा कर दिखाया और जिनका कोई दूसरा सानी नहीं रहा।

इलाहाबाद की धरती की पहचान से जुड़ी है मालवा की धरती से पहुंचे मालवा वासियों की संतति महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय जैसे विराट व्यक्तित्व के धनी और `भारत रत्न महामना` के नाम से अलंकृत मनीषि का जन्म इलाहाबाद के अहियापुर भारती भवन क्षेत्र में हुआ। उन्हीं की देन से शैक्षिक सम्पदा का विकास उन्होंने स्वयं अपने कर्मठ भावों और तपश्चर्या से पूरा कर दिखाया। परिणाम स्वरूप विश्व प्रसिद्ध `काशी हिन्दू विश्वविद्यालय` की स्थापना हो सकी। जिस घर में उनका जनम् हुआ था, वह धरोहर बन जानी चाहिए, किन्तु गोपाल मालवीय जैसे सुधी जन का घर बन चुका है।

उस महामानव की साधना में बताते हैं कि नियमित रुप से हर दिन संगम स्नान की यात्रा जुड़ी थी। और इसी के साथ भारतीय पीढिय़ों के लिए `विद्या मन्दिरों`  का निर्माण स्थापना का संकल्प भी जुड़ा था, जिसे उन्होंने अपनी साधना से ही पूरा कर दिखाया।

ऐसे ही `भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन` की साधना भी कम कठिन नहीं रही, जिन्होंने चटाई का `बिछावन` और `पत्थर के सील की तकिया` बनाकर जीवन जीया और हिन्दी भाषा के आन्दोलन और विकास तथा राजनीति के धुरंधर पण्डित जवाहर लाल नेहरू का वह डटकर विरोध करने वालों में भी शामिल रहे। उनका पूरा जीवन सादा जीवन उच्च विचार की मनो भावना से जुड़ा रहा। उनके द्वारा स्थापित हिन्दी साहित्य की विश्व में पहचान है, तो उनके द्वारा स्थापित बालिकाओं के लिए विद्यालय और विश्वविद्यालय गौरी पाठशाला का कोई सानी नहीं। उन्हीं के प्रयास से हिन्दी भाषा का आन्दोलन केरल में वर्षों पहले जो शुरू हुआ था, उसके चलते ही, वहां के विद्यालयों में आज भी हिन्दी भाषा अनिवार्य भाषा के रूप में प्रारम्भिक शिक्षा में पढ़ाई जाती है। और भी न जाने कितने प्रयासों के कथानक जुड़ें हैं। आज तो उनके नाम से `मुक्त विश्वविद्यालय` और `मास कॉम`  तथा `पत्रकारिता` के अन्य आयामों से जुड़ी शिक्षा सर्व शुलभ ही नहीं, इलाहाबाद शहर की पहचान से भी जुड़ी है। उन्होंने राजनीति में नेहरू जी को कई मुकाम पर पसीने छुड़वाये हैं, यह तो ऐतिहासिक तथ्य भी है। ऐसे ही अन्य कालखण्डों में झांकते हुए कुछ मनीषियों और ज्ञानी जनों की `अनकही-अनसुनी` बातों का खुलासा भी हम करना चाहेंगे।

इलाहाबाद दारागंज क्षेत्र के उस पार झूंसी का किनारा और उसके करीब शास्त्री ब्रिज और उससे जुड़ा हुआ है। महान योगी तपस्वी `प्रभुदत्त ब्रह्मचारी` का आश्रम जो आज भी है। उनके आश्रम के शिक्षा के मानदण्ड।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी हनुमान जी के प्रबल उपासक और भक्त थे। वो संगम किनारे `बड़े लेटे हनुमान जी` की नियमित आराधना करते और गंगा तट पर ही निवास करते रहे। उन्होंने अपनी साधना से इलाहाबाद की मिट्टी की पहचान को अपनी तरह से स्थापित किया।

उसी काल में वह प्राय: कहा करते थे कि उनकी तमन्ना है कि `हनुमान जी` की ऐसी विशाल विराट प्रतिमा बनवाई जाये, जो एक चट्टान में अवतरित सी खड़ी हो सके और उनकी तमन्ना भी थी कि राजधानी दिल्ली के वसंत विहार क्षेत्र में उसे स्थापित करने की, जिसे उन्होंने अपने दम और बल पर पूरा करवाया।  कर्नाटक से विशाल शिला पर हनुमान जी की खड़ी विशाल प्रतिमा गढ़ी गई, जिसे कई महीने राजधानी पहुंचने में लग गये, फिर बमुश्किल येन-केन-प्रकारेण वो विशाल प्रतिमा खड़े हनुमान जी की मूर्ति की उन्होंने अपनी अराधना और तप-बल से प्राण-प्रतिष्ठा की। वसंत विहार दिल्ली में स्थापित उस विशाल प्रतिमा को प्राण-प्रतिष्ठित कराने वालों मेें उस समय ख्याति प्राप्त लेखिका, उपन्यासकार और पत्रकार शीला झुनझुनवाला जो स्वयं उनकी भक्त थी उसे स्थापित करवाने में उन्होंने पूर्ण योगदान सहयोग दिया। बात अजूबी जरूर लग सकती है, किन्तु प्रभुदत्त ब्रह्मचारी की संकल्प साधना ही थी कि 1985-86 में उन्होंने अपना संकल्प स्वयं पूरा किया और उस प्रतिमा की स्वयं प्राण-प्रतिष्ठा की। ये विराट `हनुमान जी` की मूर्ति वसंत विहार क्षेत्र के पावन रमणीक स्थान पर विराजित है। झूंसी गंगा तट स्थित ब्रह्मचारी के आश्रम में उदय मालवीय जैसे लेखक और जुझारु पत्रकार आज भी जुड़े हुए है। वहां विष्णुकान्त मालवीय जैसे आकाशवाणी के संवाददाता भी आजादी के दिनों से जीवन पर्यन्त जुड़े रहे।

ऐसे ही हम बात करते है उस महान प्राकृतिक योगी की, जिन्होंने अपनी अनवरत साधना से प्राकृतिक जीवन जीते हुये, `केदारनाथ अग्रवाल` की, जिन्होंने 97वें साल की उम्र का जीवन जीने में कामयाबी हासिल की। उनका जीवन भीगे और कच्चे अनाज के सेवन से जुड़ा था। वो फल-फूल खाते थे। केदारनाथ `अग्रवाल कॉलेज` (इलाहाबाद इण्टर कॉलेज, जीरो रोड) के प्रथम प्रधानाचार्य बने थे। उन्होंने अपने जीवन काल में ये घोषणा की थी कि `100 साल` का जीवन जीकर दिखायेंगे। जब तक वो प्रधानाचार्य रहे, तब तक वो अपने घर `दारागंज से हर दिन पैदल चलकर जीरो रोड स्थित अपने विद्यालय आते और जाते रहे।` उनकी किताब `100 साल कैसें जिये?` उनके स्वयं के अपने अनुभव पर लिखी किताब थी। यहां यह बात गौर करने वाली है कि वो `100 साल पूरा` नहीं जी सकें। किन्तु 97वें वर्ष की उम्र में अंतिम समय तक अपने कार्य स्वयं करते रहे। यही उनकी साधना का पर्याय है।

उल्लेखनीय नामों में महान उपन्यासकार पत्रकार इलाचन्द जोशी जैसे महान लेखक का भी है, जिन्होंने अपनी लेखनी को जीवन के अंतिम समय तक अपंग होने के बावजूद भी कभी अलग नहीं किया। उनपर शोध करने वाली लेखिका `डॉ. यास्मिन सुल्ताना` हिन्दी साहित्य को जापान तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब रही। आज भी उनकी सक्रियता उनके पहचान के साथ जुड़कर जारी है। डॉ. यास्मिन सुल्ताना हिन्दी की ऐसी लेखिका शिक्षाविद् बनी, जिन्होंने जापान देश में पहुंचकर वहां के निवासियों को हिन्दी भाषा का ज्ञान कराया। वह पहली लेखिका है, जिन्होंने इलाचन्द जोशी और उनके साहित्य पर अनुसंधान किया। वर्तमान में वह `सेंट जोजफ कॉलेज` में हिन्दी की अध्यापिका के रुप में सक्रिय है। उनका हिन्दी भाषा के प्रति समर्पण कई उपलब्धियों के मानदण्ड सामने रखता है।

पण्डित इलाचन्द जोशी के प्रमुख शिष्यों में डॉ. प्रमोद सिन्हा और ऊषा चौधरी जैसे प्रतिष्ठित कहानीकार कथाकार का नाम भी जोड़ा जा सकता है। डॉ. प्रमोद सिन्हा जैसे कहानीकार ने भी कई मुकाम बनाये है, उनकी पत्नी ऊषा चौधरी भी हिन्दी भाषा के ज्ञान को बढ़ाने में अपने जीवन के उत्तरार्ध के पड़ाव में कहीं कोताही नहीं की। उनकी कई किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं, जो येन-केन-प्रकारेण जोशी जी के साहित्य उपन्यास से प्रभावित रहा है।

इलाहाबाद के महान लेखकों की शृंखला में `मधुशाला` जैसी महान कृति के रचयिता `डॉ. हरिवंश राय बच्चन` की संघर्ष साधना और लेखन के प्रति समर्पण भावना को भी भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी अनवरत साधना ने ही उनको विश्व पटल पर हिन्दी जगत के प्रतिष्ठित पहचान के रूप में स्थापित किया और उनकी अपनी प्राकृतिक जीवन की अटल साधना ही थी, जिसके बलबूते पर वो भी 97वें साल तक `मधुशाला` जैसी अनेकानेक कृतियों और छन्दों की रचना और उपासना में जुड़े रहें। उन्होंने जीवन में किसी भी व्यसन को कभी पास फटकने नहीं दिया और वो कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। भारत के मेगास्टार `अमिताभ बच्चन` को अपने पिता की विरासत पर जहां गर्व है, वहीं अपने पिता `डॉ. बच्चन` के अलंकृ त भावों में विचरण करते हुये, वह कलात्मक छन्दों की नई लकीरें खींचते हुए, सतत जागरुक सृजनशील कलाकार के रुप में वह स्थापित है और हर पीढ़ी के प्रेरणा स्त्रोत भी बने हुये है।

आज की यात्रा यहीं तक। अगले अंक में फिर भेंट होगी। इन्तजार कीजिए...

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