इलाहाबाद कल आज और....आध्यात्मिक अलंकार की विभूतियों की चाहत वाला शहर

  • Hasnain
  • Monday | 16th April, 2018
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संक्षेप:

  • आज हम तीन महान विभूतियों की करेंगे चर्चा
  • `देवरहा बाबा` की उम्र कितनी थी, किसी को नहीं पता था
  • देवरहा बाबा ने इन्दिरा गांधी के सिर पर लदवा दिया था पूरा `पुटका` 

--वीरेन्द्र मिश्र

इलाहाबाद की ओर अध्यात्म जीवियों का कारवां जब उमड़ता है, तो उनकी निगाहें यहां के उन आध्यात्मिक महापुरुषों की जीवन गाथा में स्वयं को बिलो देने के लिए आतुर रहता है, साथ ही उनके मन को शांति भी उन्हीं के चरणों में ही पहुंचकर मिलती है। अब ये बात दीगर जरूर हो सकती है कि कोई किसी सन्त महापुरुष की शरण में जाता है, तो कोई उन श्रेष्ठ विभूतियों की चरणों की धूलि माथे पर लगा लेने के लिए व्याकुल रहता है। चाहे राष्ट्रीय जगत का राजनीतिज्ञ हो अथवा अपने-अपने क्षेत्र के बेपनाह स्थापित जनों की भावनायें हो, उन्हें कहीं न कहीं से वहीं पहुंचकर जीवन की विशाल निधि पा लेना मानते रहे हैं।

आज हम तीन महान विभूतियों की चर्चा करेंगे, जिन्हें जिसे शायद नई पीढ़ी जानती भी न हो, किन्तु पुरानी पीढ़ी और बीते समय के लोगों को उनके बारे में विधिवत जानकारी सर्वविदित रही हैं और ये तीनों ही महान आध्यात्मिक विभूतियां भले ही ब्रह्मलीन हो चुकी हो, किन्तु उनकी पहचान और उनका दर्शन आज भी यथावत बरकरार है। उनकी तस्वीर रूपी `विग्रह` के चरणों में बैठने के सुख-आनन्द और समृद्धि का अहसास जन-जन को होता रहा है और उनके भक्तों की दुनियाभर में असंख्य फेहरिश्त भी रही है।

त्रिवेणी तट की ये `अलर्कपुरी` धरती स्वामी वल्लभाचार्य जी जैसी महान विभूति के नाम से भी जानी जाती रही है, जिनके दर्शन के लिए लालायित भाव विहवल होकर कलकत्ता से चैतन्य महाप्रभु पहुंचे थे। तब एक इतिहास बन गया था। बताते है चैतन्य महाप्रभु जी जब बांध से नीचे उतर कर यमुना-गंगा त्रिवेणी पार नाव से जा रहे थे, तो श्रीकृष्ण भक्ति में तल्लीन वह यमुना की जलधारा में कूद गये थे। फिर स्वामी वल्लभाचार्य जी से गले मिलकर घण्टों बालू रेती पर बैठे रहे थे। युग बीता यहां सम्राट अकबर ने किला बनवा दिया। वक्त आगे बढ़ता रहा। अनकही-अनसुनी बनती रहीं। सदियां बीततीं रहीं। 20वीं सदी में भी अनेक विभूतियों की चर्चायें प्राण प्रतिष्ठित होती रहीं।

जगद्गुरु शंकराचार्य बदरिकाश्रम जोशीमठ वाले `स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज` यही अलोपी बाग स्थित शंकराचार्य आश्रम में निवास करते थे। उन महान `गुरुदेव` की अनुकम्पा उनके परम् प्रिय शिष्यों `स्वामी शांतानन्द सरस्वती जी महाराज`, `स्वामी अखण्डानन्द जी`, `स्वामी करपात्री जी`, `महर्षि महेश योगी` `स्वामी विष्णु देवानन्द सरस्वती जी` और `स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती` मुख्य शिष्यों में रहे है, जिनकी दुनियाभर में भक्तों की असंख्य निधियां हैं।

भारत की आजादी के बाद जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी भारत के महामहिम राष्ट्रपति बने, तो वह भी `स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज` के परम् भक्तों शामिल में रहे, उनके चरणों के पास बैठकर तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद घण्टों विचार-विमर्श करते थे। यह प्रमाण जानने के लिए `यू-ट्यूब` पर सर्च कर उनकी फोटो तुरन्त ही देखी जा सकती है। तथ्य परक कथानक ये है कि जब जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज राजधानी पहुंचे, तो वह `कैनिंग लेन` वाले एक भवन में ठहरे। उस काल में महामहिम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी स्वयं चलकर उनके दर्शन के लिए वहां पहुंचे थे और घण्टों उनके साथ बैठकर `अध्यात्म चर्चा` ही नहीं किया था, बल्कि उस काल की स्थितियों-परिस्थितियों पर भी मन्थन-चिन्तन किया था। तभी तो यह आध्यात्मिक शहर इलाहाबाद, त्रिवेणी की ज्ञान धारा का ही पर्याय माना जाता रहा है।

ऐसे ही दूसरे कालखण्ड में हम चर्चा करेंगे `मां आनन्दमयी माता` की। जिनकी चरण रज पाने को आतुर उस काल के असंख्य स्त्री-पुरुष शामिल रहें। `मां आनन्दमयी` की स्नेहमयी मुस्कान और स्नेहिल आशीर्वाद और करुणामयी भाव पाने वालों का उनके इलाहाबाद स्थित आश्रम में पहुंचने पर तांता लगा रहता था।

बात वर्ष 1977 के महाकुम्भ की है। श्रीमती इन्दिरा गांधी, जो स्वयं उनकी भक्त थीं। वह भी त्रिवेणी क्षेत्र में लगे उनके आश्रम में पहुंची थीं और उन्होंने उससे आशीर्वाद लिया था। दरअसल देश में तब आपातकाल की घोषणा  के दौरान, जो कुछ भी हुआ था। उस काल की स्थितियां से स्वयं भी वह बेचैन थीं, बताया जाता है। किन्तु यह कहा जा सकता है कि शान्ति के लिए वह दर-दर भटक रहीं थीं, परन्तु तब शान्ति का उनके पास से लोप हो चुका था। उनके आपात कालीन कानून से देश तब चीत्कार कर रहा था। उस पीड़ा का दंश तब जनता भुगत रही थी। वह संगम किनारे जब पहुंची थीं, तो उन्होंने गंगा स्नान करना भी मुनासिब नहीं समझा था। यही नहीं उन्हीं दिनों उनकी चाची जो `टैगोर टाउन`, `जगत तारन गर्ल्स कॉलेज` के पास रहती थीं (एस.एस. नेहरू), उनके कहने पर वह संगम किनारे दारागंज घाट (गंगा का किनारा) पर `ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा` के दर्शन करने भी पहुंच गयीं थी।

`देवरहा बाबा` की उम्र कितनी थी, किसी को नहीं पता था। किन्तु वह ऐसे सिद्ध योगी थे, जो गंगाजल में घण्टों डुबकी लगाकर समाधि लेते थे। और एक ऊंची मचान पर बैठते और निवास करते थे, किसी को उनके दर्शन करने के लिए उनकी मचान के नीचे पहुंचकर घण्टों इन्तजार करने के बाद ही उनका दर्शन होता था और आलम ये कि `ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा` किसी को भी हाथ से आशीर्वाद नहीं देते थे, बल्कि `अपने पांव`, अपने मचान से लटका कर सिर पर सीधे पांव से आशीर्वाद देते थे। धरती पर वह किसी से नहीं मिलते थे, तभी तो वह `मचान वाले बाबा` के नाम से भी प्रतिष्ठित थे।

इन्दिरा गांधी भी जब वहां पहुंची, तो `देवरहा बाबा` ने उनको पहले आशीर्वाद नहीं दिया, बल्कि एक बड़े टोकरा में फल मंगवा कर उसका `पुटका` बनवाया और वह पूरा `पुटका` इन्दिरा गांधी के सिर पर लदवा दिया। और बोले -  `चल-उठाव एहका-लइजा, हुआं किनारे तक। फिर लौट के आव। जब तैं एका उठाइ के चल लेब। तबै देश चलऊबे नहीं तो तैं जान!`

इन्दिरा गांधी ने तब वह बड़ा पुटका बमुश्किल उठाया था। डगमगा गई थी, मगर कुछ दूर तक चलने के बाद वापस लौटीं। इस बीच वह लड़खड़ाती रहीं। यह घटना लोगों को अजूबी जरूर लग सकती है, किन्तु यह उस काल की सत्य घटना थी। जब इन्दिरा गांधी वापस लौटीं, तो पुटका उतारा गया और देवरहा बाबा के पैरों से उन्हें आशीर्वाद मिल सका था। कहते हैं उस आशीर्वाद से वह संतुष्ट थीं, किन्तु उनके मन में असमंजस की लकीरें तब भी थी। चालीस साल पुरानी यह घटना किसी को याद है या नहीं, किन्तु तत्कालीन संवाददाता दैनिक जागरण डॉ. राम नरेश त्रिपाठी और नार्दन इण्डिया पत्रिका के मुख्य संवाददाता शिव कुमार दुबे के साथ डॉ. महावीर अधिकारी की पत्रिका में वह घटना प्रकाशित भी हुई थी। कहने का आशय ये कि इस धरती की आध्यात्मिक शक्ति में तो बस झांकने की जरूरत है। क्या-क्या नहीं रहा है यहां, बस! जानने और समझने की जरूरत है।

बीत चुका है वो काल! न आध्यात्मिक विभूतियां रही और न ही उनकी शरण में जाने वाले। अब तो बस है `अनकही-अनसुनी` कहानियां। जो कि न्वदन्तियों की शक्ल भी लेती जा रही हैं।

आज सबकुछ बदल चुका है। नया कथानक है नई पहचान है हाईटेक युग है।

अब आगामी वर्ष 2019 में यहां कुम्भ का अवसर आने वाला है, तो क्या ऐसे सन्तों-महात्माओं, ऋषि-महर्षि का  दर्शन संभव हो सकेगा। और अगर होता है, तो क्या युवा जनमानस उनकी साधना के सम्मोहन में स्वयं को जोड़कर कुम्भ दर्शन कर सकेगी, क्योंकि `हाईटेक युग` सोशल मीडिया से `वायरल` होकर विश्वास का क्या तानां-बाना बुनता है, ये वक्त बतायेगा?

आज की चर्चा यहीं तक, अगले अंक में फिर भेंट होगी। इन्तजार कीजिए...

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