इलाहाबाद कल आज और...गंगा मइया की आस्था, विश्वास और मान्यताएं

  • Hasnain
  • Monday | 15th January, 2018
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संक्षेप:

  • इलाहाबाद में जुटता है भक्तों का मेला
  • अपनी जिद पर कुम्भ देखने पहुंचे थे  जवाहरलाल नेहरू
  • गंगा पूजन के बाद अमिताभ बच्चन जीते थें चुनाव

 

--वीरेन्द्र मिश्र

वैदिक सिटी इलाहाबाद। सम्पूर्ण भारतवर्ष के सभी तीर्थों में श्रेष्ठ है। इसीलिए ये शहर तीर्थों का राजा प्रयागराज कहलाता है। गंगा-यमुना और सरस्वती का संगम यहां तो है ही और न जाने कितनी ही संस्कृतियों का संगम यहां होता आ रहा है। यहां भक्तों का मेला तो जुटता ही है। ये कहें कि यहां करोड़ों सांसों का मेला संगम में आस्था की डुबकी लगाने के लिए बेचैन रहता है, ताकि उसके मन का कलुष धुल जायें और जन्म-जन्मान्तर के पाप मिट जायें। आज हम यहां मान्यताओं में विचरण करने वाले आधुनिक भारत के मनीषियों, फिल्म अभिनेताओं, उद्योग पतियों और राजनीतिज्ञों की चर्चा करेंगे, जो येन-केन-प्रकारेण यहां आते रहे हैं। मां गंगा का पूजन कर अपनी पहचान को बढ़ाते रहे हैं।

गंगा यमुना सरस्वती संगम

वर्ष 1954 का जब महाकुम्भ त्रिवेणी संगम तट पर लगा था, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू अपनी जिद पर कुम्भ देखने महापर्व अमावस्या के दिन पहुंच गये। उनकी शान और व्यवस्था कुछ ऐसी हुई कि शाही अखाड़ा का स्नान करने में व्यवधान हुआ। अनायास ही नागा साधुओं की नाराजगी और नेहरू के व्यवस्थापकों के बीच जो विवाद हुआ, उससे मेला परिसर में भोले-भक्तों की सैकड़ों जाने चली गई थीं। उस भयावह दृश्यों के लिए इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र नार्दन इण्डिया पत्रिका के तब के पन्नों को पलटना होगा। उसमें नीपू दादा फोटोग्राफर के खींचे चित्रों ने हृदय विदारक दृश्य व्यक्त किया था। तब से प्रशासन चौकन्ना हो गया और उसके बाद के कुम्भ पर्वों पर प्राय: सावधानी बरती जाती है कि कभी भी कहीं भी नागा साधुओं के जुलूस में कोई व्यवधान न हो। शंकराचार्यों, महन्त, महामण्डलेश्वरों और सन्तों परम्परा के वाहकों की शान की सवारी संगम स्नान के लिए निकलती है, तो उनके दर्शन करने वालों की ही नहीं अपितु उनके नागा साधु-सन्तों तपस्वियों के पैरों की धूली माथे लगाने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

सन् 1954 के महाकुम्भ का एक दृश्य

जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने नियमों का पालन किया। और उसके बाद से ही यहां पावन पर्वों पर विशिष्ट जनों का आना प्रतिबिम्बित हो गया। पर्वों के बाद के दिनों में प्राय: आना-जाना लगा रहता रहा है। कुम्भ मेला क्षेत्र शिवकोटि क्षेत्र से लेकर नागवासुकी, झूसी अरैल, छत्रनाग दोनों छोर तक साधु-सन्तों और कल्पवासियों का निवास पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि तक समापन घर वापसी का परिदृश्य ऐसा बनता है कि पूरा लघु भारत ही नहीं अब तो वसुधैव: कुटुम्बकम् का दृश्य उत्पन्न हो जाता है, जहां विदेशों से भी दर्शक पर्यटक भक्त जनकुम्भ को आत्मसात करने के लिए कौतूहल में यहां पहुंचते है।

जवाहर लाल नेहरू

आज हम बात करेंगे आधुनिक युग की जन चेतना से जुडें कुछ राजनीतिक परिदृश्य की जो सत्ता में रहते हुए अथवा सत्ता विहीन होने पर त्रिवेणी गंगा मइया में डुबकी लगाने और गंगा पूजा से कभी पीछे नहीं हटे और मान्यताओं में काबिलियत भी हासिल की है, जो इतिहास बन गई।

`बात उन दिनों की है जब देश में आपातकाल की घोषणा हुई थी`

जब 77-78 में इलाहाबाद में महाकुम्भ लगा, तो इन्दिरा गांधी के मन में भी आया कि कुम्भ स्नान करना चाहिए, तो उन्होंने सारे नियमों को किनारे करते हुए, धत्ता बताते हुए अपने सहयोगी डॉ. कर्ण सिंह के साथ सोमवती कुम्भ पर्व का स्नान करने विशाल बजरा पर सवार होकर त्रिवेणी पहुंची थी, बताते हैं। जहां उन्होंने गंगा का जल आचमन तो किया, किन्तु गंगा स्नान नहीं किया। जबकि डॉ. कर्ण सिंह ने गंगा स्नान किया और गंगा पूजन भी किया साथ ही पुष्प चढ़ाए, चन्दन लगाया, गंगा जल आचमन किया। यह बात स्वयं डॉ. कर्ण सिंह ने एक साक्षात्कार में बताई थी (आस्था कुम्भ विशेष में) बाद में जब आम चुनाव हुए, तो गंगा मइया की महत्ता देखिये, इन्दिरा गांधी बुरी तहर से रायबरेली से परास्त हो गई। उनका मन्त्रिमण्डल भी बुरी तरह से हार गया। तब जनता सरकार भारी मतों से जीती थीं। जबकि डॉ. कर्ण सिंह जीत गये थे। यह एक कथानक है। उस काल का, जो भारतीय सभ्यता संस्कृति और अटूट आस्था विश्वास का पर्याय बन गया। इसे स्वयं डॉ. कर्ण सिंह पहले ही व्यक्त कर चुके हैं।

इन्दिरा गांधी

कर्ण सिंह

वक्त आगे बढ़ता रहा।  सन् 1982 में जब अर्धकुम्भ मेला का पावन अवसर आया, तो बंगाल की धरती से कुम्भ अवसर पर बंगाली भाषा में ‘अमृत कुम्भेर संघाने’ का निर्माण कार्य कुम्भ मेला क्षेत्र में किया गया, जिसमें मशहूर फिल्म अभिनेत्री अपर्णा सेन और अभिनेता सौमित्र चटर्जी के साथ महुआ राय चौधरी ने भी अभिनय के लिए पहुंचे थे। उस फिल्म का निर्माण पूरे माह भर संगम तट पर अलग-अलग लोकेशन पर चलता रहा। जिसमें अमृत कुम्भ की खोज में लगे भावनात्मक जुड़ाव से इलाहाबाद के अनेक कलाकारों, रंगकर्मियों और साधु-सन्तों तथा प्रशासन ने भी अपना सहयोग दिया था।

अभिनेत्री अपर्णा सेन

अभिनेता सौमित्र चटर्जी

यही वो काल था, जब दक्षिण भारत के मशहूर फिल्म अभिनेता और तमिलनाडू के मुख्यमंत्री रहे एम.जी. रामचन्द्रन और अभिनेत्री जयललिता भी संगम तट पर पहुंची थीं। यही नहीं वक्त के साथ जब इलाहाबाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अलग हटकर चुनाव लड़ना शुरू किया था, तो उन्होंने भी गंगा स्नान और पूजन के साथ बड़े हनुमानजी का दर्शन किया था। यही नहीं उनके चुनाव में उस समय मई-जून के महीने में एन.टी. रामाराव अपने दामाद चन्द्रबाबू नायडू के साथ चौधरी देवीलाल के समर्थकों के साथ गंगा पूजन किया था। चन्द्रबाबू नायडू जहां आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे और वो आज भी आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री भी रहे थे। अमिताभ बच्चन का चुनाव गवाह है कि गंगा पूजन और बड़े हनुमानजी का पूजन के बाद उन्होंने इलाहाबाद से विजय हासिल की थी।

एम.जी. रामचन्द्रन और अभिनेत्री जयललिता

`स्थितियां-परिस्थितियां कैसी भी हो, समय के साथ मान्यताओं का प्रभाव खुलकर बोलता रहता है`

आज हम 21वीं सदी में हाईटेक युग में जीवन की तमाम आपाधापी को अनगिनत अनकही-अनसुनी के साथ जीवन में नित नये आयाम जोड़ने का प्रयास करते रहते हैं। वक्त के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में सबका साथ, सबका विकास नित नये पड़ाव के साथ अगे बढ़ रहा है।

विश्वनाथ प्रताप सिंह

जब इलाहाबाद में भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न हुआ था, तब अनेकानेक नेताओं, कार्यकत्र्ताओं ने त्रिवेणी संगम में गोते लगाकर गंगा पूजन में अपनी मान्यता को आगे बढ़ा चुके है। यह सब आस्था और विश्वास का पर्याय है। पिछले दिनों भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द भी गंगा पूजन कर चुके हैं, जिससे आस्था को बल मिला है।

एन.टी. रामाराव और चन्द्रबाबू नायडू 

वैदिक सिटी। हाईटेक सिटी इलाहाबाद सब तीर्थों का राजा है। वहां की मान्यतायें अपनी तरह से है। सबकुछ गंगा मइया की कृपा से हुआ माना जाता है। महाकुम्भ नगरी आज विश्व पटल पर अपनी मान्यताओं और वैज्ञानिक दृष्टि की कसौटी पर खरे होकर आगे बढ़ चली है। आने वाले वर्ष 2019 में जब इलाहाबाद में कुम्भ का भव्य पावन अवसर आयेगा, तब मान्यतायें और सामाजिक चेतना, राष्ट्रीय चेतना के साथ मिलकर दिखाई पड़ेगी और इसकी पहचान निश्चित रुप से विश्व पटल पर प्रतिबिम्बित होगी। तब यहां का परिदृश्य ही कुछ ओर होगा। जो नये आयाम स्थापित कर रहा होगा।

पीएम नरेंद्र मोदी

(आज की ‘अनकही-अनसुनी’ यहीं तक, अगले अंक में फिर भेंट होगी। तब तक के लिए इंतजार कीजिए अपनी खासमखास ‘अनकही-अनसुनी’ के लिए।)

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