इलाहाबाद कल आज और...ऐतिहासिक नीम बूढ़ी हो गई, पहचान में दम है

  • Hasnain
  • Monday | 5th February, 2018
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संक्षेप:

  • ऐतिहासिक और आजादी के अनगिनत शहीदों की याद दिलाता नीम का वृक्ष
  • आजादी की पहली लड़ाई 1857 की गदर के बाद बना लाल गिरजाघर
  • छुन्नन गुरु की पहचान की कोई दूसरी मिसाल इस क्षेत्र में नहीं बना सका

 

--वीरेन्द्र मिश्र

अनकही-अनसुनी इलाहाबाद ने कई पायदान चढ़ते हुए, गंगा-जमुनी तहजीब और वैदिक सिटी-हाईटेक सिटी इलाहाबाद शहर की पहचान के कई मानदण्डों को सहेजा है। त्रिवेणी की बहती पावनता भरी धारा और ज्ञान-विज्ञान के कई कालछन्दों को आप तक पहुंचाने का यत्न किया है, जिसने पुरानी पीढ़ी और नई हाईटेक होती पीढ़ी के बीच का सेतु बन्धन बनकर कई पड़ाव और मुकाम भी तय किये है।

ज्ञान-विज्ञान के साथ साहित्य सृजनशीलता और परिसंवादों की उपादेयता को भी सहेजा है। आज हम ऐतिहासिक काल के घटनक्रमों से जुड़ी कुछ ऐसी पहचान की अनुभूति को बताने का प्रयत्न करेंगे, जो यहां की पहचान को नये आयाम से भी जोड़ती है। यहां की संस्कृति से जुड़ी कुछ ऐसी व्यवस्थाओं को भी सहेजने का प्रयत्न करेंगे, जो यदि नहीं होती तो क्या होता और आज की बाशिन्दगी कहां किसी मोड़ पर अपनी पहचान और जीवन को आगे बढ़ा पाती? तो आइये चलते है पुराने ‘लाल डिग्गी’ क्षेत्र यानी चौक से पश्चिम दिशा की ओर... ग्रांट ट्रंक रोड, यहां से गुजरते हुए एक पूरब दिशा में ढाल चढ़ते पुराने यमुना पुल से यमुनापार कर नैनी से आगे मिर्जापुर की ओर बढ़ जाती है। वहीं दूसरी सड़क गंगा तट की ओर आगे बढ़ते हुए, शास्त्री पुल पार कर झूंसी पहुंचती है और बनारस की ओर आगे बढ़ जाती है। आइये  जीटी रोड पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़े।

चौक में ये ऐतिहासिक और आजादी के अनगिनत दीवानों की (शहीदों) की याद दिलाता नीम का वृक्ष है, जो कल तक अपनी विशालता के साथ लहराता था, आज ये बूढ़ी हो गई है। फिर भी अपने दमखम के साथ मौजूद तो है, अपनी विशालता की पहचान दिलाता किन्तु बुढ़ापे की उसकी लाठी अब लगता है गुम सी हो रही है। लिहाजा यह वृक्ष सिमटता जा रहा है। छोटा होता जा रहा है। उसके नीचे जो कल तक विशात खाना की दूकाने थीं, अब वो भी अपनी पहचान की रौनक को भुलाती जा रही हैं। समय ने लगता है, उन्हें भी बूढ़ा ही नहीं पुरातन बनाकर सिमटा दिया है। अब उनके न तो कद्रदान दिखते हैं और न ही यहां की पहचान को आगे बढ़ाने वाली पारम्परिक व्यवस्थायें नजर आती हैं। समय के साथ यहां की मेगामार्ट रूप में दूकानें तोड़-फोड़कर अपनी पहचान बनाने के लिए आगे बढ़ रही है।

जो सड़क के किनारे की दूकानें हैं यहां पहले तो कभी बैठना भी गुनाह था। आजादी की पहली लड़ाई 1857 की गदर के बाद यहां लाल गिरजाघर बना, जहां आराधना का पर्याय होता था। अब तो सम्भवत: यहां स्थान निमित्त मात्र है, क्योंकि बाहर जो दूकानों की कतारें हैं, उसमें घर-परिवार के रस्म-रिवाज की सामग्री भरपूर और एक ही स्थान पर मिल जाती है। इस गिरजाघर में कोई जाता है या नहीं यहां घर-परिवार में शादी-विवाह जैसी पारम्परिक अनुष्ठानों से जुड़ी एक ही दूकान में सबकुछ मिलता है।

सिन्दूर से सिन्धौरा तक चूड़ी से लंहगा-चुन्नी तक और तो और साज-ओ-सामान भी तरह-तरह के मिलते है, परन्तु आपको सहजता से इत्मीनान से बैठना होगा, तो ही फुटकर सामग्री उपलब्ध हो जाती है। यही नहीं किसी के घर में विषाद दु:ख का पहाड़ टूटा हो तो भी यही वो जगह की दूकानें हैं, जहां पूरी अन्तिम क्रिया से जुड़ी दान-पुण्य-लाभ से सामग्री भी उपलब्ध हो जाती है।

लाल गिरजाघर के ठीक बाहर जो दूकानें लगी हैं, उनमें मृत्यु उपरान्त ‘शुद्धि’ और ‘तेरहवीं’ से जुड़ी आवश्यक सामग्री सहजता से थोक भाव में मिलती है।

एक बात यहां याद रखने वाली बात है कि लाल गिरजाघर के बाहर ‘पर्यावरण-इको-फ्रेंडली’ जुड़ी सामग्री आज भी मिलती है। टोकरी, टोकरा, बेनवा, पंखी, पंखा, डलिया यही नहीं बेत, बांस, खपच्ची और ताड़ के पत्तों की बनी कृतियों को सीधे सहज रुप में यहां से खरीदा जा सकता है। जरा सामने की ओर नजर दौड़ाएंगे, तो पान देशी, विलायती, कलकत्तिया, मघई, महोबा वाले पान के पत्ते ढेर-के-ढेर ‘ढोली’ के ढोली भाव में मिल रहे होते हैं।

वास्तव में ‘लाल डिग्गी’ चौक के पास पहले चारों ओर लखौड़ी ईटों से बने घर थे, किन्तु अब सभी टूट चुके हैं अथवा टूट रहे हैं। समय के साथ यहां भी परिवर्तन हो रहा है। यहां जो खिलौना मण्डी थी वह अब अन्य दूकानों में बदल गयी है।

पहले यहां कोई सड़क नहीं थी, जो सड़क थी वह थाना कोतवाली के ठीक सामने थी। जो अब ठठेरी बाजार का आकार ले चुकी है। यहां थोक बर्तनों का भण्डार पूरी सड़क के दोनों ओर मिल जाते हैं। यहां जामा मस्जिद है, ये स्थान ऐसा पावन और ऐतिहासिक बन चुका है कि हर वर्ष श्रीराम दल जब निकलता है, तो पजावा और पत्थरचट्टी दोनों की झांकिया यहीं से गुजरती है, जिसका आनन्द रस सभी जाति-धर्म सम्प्रदाय के लोग यहां मौजूद रहते हुए उठाते हैं।

‘भरत मिलाप’ का तो इस स्थान से अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। सभी धर्म-संस्कृति के लोग उस कालछन्द को अपना मानकर सामूहिक चेतना का हिस्सा बनते है। तब श्रीराम का जयकारा पूरे वातावरण को गुंजायमान कर देता है।

ये जो ठठेरी बाजार है इसकी पहचान ‘होलसेल’ या फिर छोटा मुरादाबादी बर्तनों का खजाना माने या  कहे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अधिकांश जनों को शायद यह मालूम नहीं होगा पुरानी ऐतिहासिक नीम जो अब बूढ़ी नीम की पहचान से जानी जाती है। वहां से जो सड़क सिविल लाइन्स की ओर जाती है, वह पहले नहीं थी। पहले तो इसी ठठेरी बाजार से होकर आवा गमन होता था। यहीं पंजाब बर्तन भण्डार के मल्होत्रा जी की पहचान पुरातन सिक्कों, सोना-चांदी, तांबा, गिलट और लौहे तत्वों के साथ चमड़े का भी पुरातन सिक्का उनके पास संग्रहित था। जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। वक्त बदला आज सबकुछ बदल चुका है।

जब सन् 1938 में ‘जॉनसन` यहां के उच्च अधिकारी बनकर आये, तो उन्होंने एक नई सड़क बनवाई, जो इलाहाबाद के चौक घण्टाघर से सीधे ‘हीवेट रोड’ से जा मिली और वह सड़क ‘जॉनसन गंज’ कहलाई। यहां पहले घण्टाघर के पास पुरातन चुंगीघर होता था। जिसे सातवें दशक में सिविल लाइन्स नगर महापालिका के पास बना दिया गया और यह घण्टाघर आबाद हो गया, नई पहचान के साथ बाजार के रूप में, जो आज भी बना हुआ है।

घण्टाघर तो कायदे से अब गुम सा होता जा रहा है, किन्तु यहां के प्रतिष्ठित ‘नेता छुन्नन गुरु’ की प्रतिभा बरबस ही लोगों को आकर्षित कर लेती है।

छुन्नन गुरु की पहचान की कोई दूसरी मिसाल इस क्षेत्र में नहीं बना सका। वह पं. जवाहर लाल नेहरू को ‘काला झंडा’ जरूर दिखाते थे। नेहरू जी को डर लगता था, तो सिर्फ छुन्नन गुरु से और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी से, क्योंकि तीनों की अद्वितीय पहचान थी, जिनका कोई और सानी भी नहीं था। तीनों की राष्ट्रीय ख्याति रही है। अब लोग उन्हें भूल रहे हैं।

छुन्नन गुरु की लोकप्रियता का जायजा लीजिए, भारत रत्न महामना मदन मोहन मालवीय जी और भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जी की जो जन्म स्थली है, उनके करीब ही उनकी पैदाइश भी थी। पूरे मुहल्ले में ही नहीं, अपितु पूरे क्षेत्र में उनकी अपनी पहचान बोलती थी। रात में दो बजे भी कोई छुन्नन गुरु से मदद मांगने पहुंचता, तो वह तत्काल चल देते थे। कहते हैं सिर्फ एक पान खाते और हाथ में डण्डा लेकर अपनी लोक सेवा, जन सेवा के लिए वह जीवन पर्यन्त समर्पित रहे। उनके बाद की पीढ़ी में सत्य प्रकाश मालवीय नेता बने, जो जन सेवक होने के साथ संसद में भी पहुंचे थे। आज सबकुछ बदल गया है। पुरातन के साथ अर्वाचीन ज्ञानी जनों का संसार है और ‘हाईटेक युग’ की दास्तान है, जिसने नई पहचान को ‘पर’ लगाये है।

फिर भी चौक कोतवाली से आगे बढ़ने के लिए दाराशिकोह की संस्कृत भाषा की ज्ञानशाला के पारखी कौन कब हुए, ये जानने के लिए जानेंगे हम अगले सप्ताह, तो इन्तजार कीजिए अपनी अगली ‘अनकही-अनसुनी’ दास्तान के लिए शेष फिर...

(आज की ‘अनकही-अनसुनी’ यहीं तक, अगले अंक में फिर भेंट होगी। तब तक के लिए इंतजार कीजिए अपनी खासमखास ‘अनकही-अनसुनी’ के लिए।) 

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