इलाहाबाद कल आज और... यूनिवर्सिटी में गूंजती हैं कमलेश्वर की कहानियां और दुष्यंत की शायरी

  • Abhijit
  • Monday | 18th December, 2017
  • education
संक्षेप:

  • इलाहाबाद में `कथा संस्कृति` और `गजल-शायरी` का संगम
  • 1954 में दुष्यंत कुमार ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ली MA की डिग्री
  • जानिए क्यों कहा जाता है ‘क’ से कहानी और ‘क’ से कमलेश्वर

- वीरेन्द्र मिश्र

वैदिक सिटी इलाहाबाद की माटी की पावनता अगर `आध्यात्मिक अनुभूतियों` के साथ जुड़ी है। `साहित्य सृजनशीलता` या फिर `राजनीतिक तेवर` की कुशलता या फिर ‘वैज्ञानिकता के ज्ञान स्त्रोत’ के संर्वधन के साथ भी जुड़ा है। पुरानी पीढ़ी के बाद की पीढ़ी, जब आगे बढ़ी तो उनकी चर्चा ही प्रासंगिकता को यही बल प्रदान करती है।

आज हम पहले बात करेंगे शताब्दी पुरुषों की। व्यक्तित्व के धनी मनीषियों के कथा संसार की और `कथा संस्कृति` के साथ `गज़ल शायरी` की।

पहले कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में झांकते है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानी `पूष की रात` में बहती शीतलहर और चिल्ला जाड़ा-पाला में अमावस की स्याह की भयानक रात का चित्रण है। हाड़ कंपकंपा देने वाली कडक़ ठंडक ऐसी कि व्यक्ति सब कुछ भूल जाता है। रात के अंधकार में गांव में किसी कुत्ते की आवाज़ भी तब कितनी भली लगने लगती है, क्योंकि गांव-गांव की पगडंडियों से यात्रा करने वाले को इंसान के करीब पहुंचने का वही आवाज़ एहसास करा देती है। वहीं साथ का संबल बन जाती है।

और तो और, पूष की चांदनी रातों में जब शेफाली झरती है, तो दरख्तों के साये के नीचे पत्तों की खडख़ड़ाहट और बोलते झींगुर की आवाजें भी ना जाने कहां गुम सी होती जान पड़ती है, तब वो चांदनी रात भी नहीं सुहाती। ऐसे ही कालखण्ड में कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचन्द ने इसी इलाहाबाद की मिट्टी में गंगा-यमुना किनारे के किसी गांव की यात्रा के अहसास को अपनी कहानी `पूष की रात` में लिखा होगा, ऐसा ही जान पड़ता है।

मुंशी प्रेमचन्द की कहानी `ईदगाह` में बूढ़ी मां का हाथ ना जले, बच्चे का चिमटा खरीदकर लाना या फिर `हीरा-मोती` (दो बैलों की जोड़ी) का मालिक के प्रति समर्पण और चौकन्नेपन का कथानक हो अथवा यहां के दोआबा क्षेत्र के किसी गांव के बीच `बूढ़ी काकी` का ताना बाना ऐसा कि मानों सबकुछ आज भी प्रासंगिक होकर समाज में घटते घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि को जन्म देता महसूस कराता है। क्या इन कहानियों में अपनेपन की खुशबू बरकरार नहीं लगती है?

ये कहानियां आज की पीढ़ी ने यदि पढ़ी हैं, तो उन्हें जीवन्तता और दोहरे चरित्र की मानसिकता का अहसास  जरुर हुआ होगा। और नहीं पढ़ी तो पढक़र उसमें गोता लगाने की जरुरत की दरकरार है।

वास्तव में इलाहाबाद की मिट्टी में कहानी सम्राट मुंंशी प्रेमचन्द के जीवन के तमाम-तमाम प्रसंगो की पुरातन छवियां रची-बसी रही है। जो आज भी उन्हें जीवन्त बताती जान पड़ती है। बाद की पीढ़ी में ‘अमृतराय’ के ‘धूप-छांव’ घर को देखने मात्र से वहां का वातावरण उगते सूरज की स्वर्णिम आभा की बात कराता जान पड़ता रहा है। ऐसे ही डूबते सूरज की लालिमा का प्रभाव सबकुछ कहानी की शक्ल के अनुरुप सा महसूस कराता यहां जान पड़ता रहा है। यह ‘धूप-छांव’ भी कथानक का शब्द नजर  आता है।

मुंशी प्रेमचन्द के पौत्र आलोक कुमार अंग्रेजी के दिल्ली में प्रोफेसर बने (विदेश से लौटने के बाद), तो प्राय: उनसे बात करने का मौका मुझे मिलता रहा और वह भी हिन्दी भाषा के माधुर्य और हिन्दी की महत्ता में ही गोते लगाते जान पड़ते रहे। इलाहाबाद की मिट्टी, संस्कार और जीवन की बाते करते रहते।

वक्त बदला और सर्किट हाउस के करीब उसी ‘धूप-छांव’ में आज उनका बसेरा है। जरुर अपने पुरखों की स्मृतियों में ही वह जीते होंगे, क्योंकि शताब्दि बीत जाने के बाद। युग के अन्तराल में प्रेमचन्द और उनकी कहानियां आम जन की हो चुकी हैं।

ऐसे ही आइये अब ‘साकेत’ चलें।
घबड़ाइये नहीं। अयोध्या वाला साकेत नहीं, बल्कि यह डॉ. रामकुमार वर्मा के घर का नाम है। यह साकेत नया कटरा में ही है।
डॉ. राम कुमार वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में, न जाने कितनी ही उनकी काव्य धारायें बहती रही हैं। उनके लिखे नाटकों का मंचन इलाहाबाद के रंगकर्मी सुरेन्द्र सिंह प्राय: करते रहे हैं। उनका लिखा नाटक ‘पृथ्वीराज की आंखे’ तो अद्भुत है, उस पर अभिनय करने का मौका मुझे भी मिला था। हिन्दुस्तानी अकादमी भी उनकी ही छत्रछाया में समारोहों की सोपान दर सोपान चढ़ता रहा है।

डी.पी. गर्ल्स कॉलेज से आगे बढ़ते ही ‘साकेत’ है। यह सडक़ चैथम लाइन्स से जुड़ती है और प्रयाग स्टेशन पहुंच जाती है और विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल से भी मिल जाती है। इसके अलावा जनाब रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी और गोपेश जी के घरों का मिलन भी इसी चौराहे पर हो जाता है। 

यह ‘साकेत’ आज भी है। घर पर पहुंचिये प्यार-दुलार के साथ सम्मान की भावना प्रस्तुत करती डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा सक्रियता के साथ मिलती हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वह संस्कृत साहित्य की पुरोधा प्रोफे सर रही हैं। जब डॉ. राम कुमार वर्मा ने अमरीका यात्रा की, वाशिंगटन जाते वक्त खान-पान जीवन शैली पर मित्रों से 

खूब चर्चा करते  थे। डॉ. रामकुमार वर्मा कितने प्रकृति प्रेमी रहे। और हिन्दी साहित्य की रीढ़ से जुड़े रहने के साथ पाण्डित्य बोध से भी कितने भरे पूरे रहे। युवा पीढ़ी के कितने चहते रहे है, आज भी उस घर साकेत में पहुंचकर अनुभव किया जा सकता है।

ऐसे ही इलाहाबाद शहर की पहचान शायरी की दुनिया के शहंशाह अकबर इलाहाबादी के बाद जनाब रघुपति सहाय फिराक गोरखपुर और फैज अहमद फैज के नाम से भी जुड़ा माना जाता है, जो यहां की मिट्टी की सोंधी गंध से अपने ज्ञान को सुवासित कराते रहे है। स्मृतियां धूमिल जरुर हुई हैं, किन्तु उनकी कालजयी रचनायें आज भी प्रासंगिक हैं।

इस इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पहचान विश्व प्रसिद्ध रही है।
इसी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पांचवे दशक में आजादी के बाद मैनपुरी से पढऩे के लिए कमलेश्वर और बिजनौर से दुश्यन्त कुमार भी पहुंचे थे। दोनों जनों में तब खूब पटती थी। 1954 में दुष्यंत कुमार ने यहीं से ही एम.ए. हिन्दी में पास किया था। उन्होंने अपनी गजलों, शायरी का कुछ इस तरह से लोगों को दीवाना बनाया कि उनकी कालजयी रचनाओं को आज भी पीढिय़ां भूलती नहीं हैं। और भूलते नहीं है कमलेश्वर जिनकी सांसो में जीवन पर्यन्त इलाहाबाद बसा रहा है।

कमलेश्वर ने वहीं हिन्दी में ‘अपनी कहानियों’ का लेखन सिलसिला आरम्भ किया। कहानियां आकार ग्रहण करती रहीं, तो न जाने कितनी ही किताबे भी उन्होंने लिखीं। ‘कितने और पाकिस्तान’ हो अथवा ‘देश-परदेश’ में संकलित कहानियों की श्रंखला। हर कहानी का अपना अस्तित्व बोध और समय काल की अवधारणायें बोलती सी जान पड़ती है। 

कमलेश्वर ने अध्यात्म, वेद, उपनिषद पुराणों की कहानियों का संकलन भी सम्पादित किया ‘कथा संस्कृति’ में जिन्हें पढक़र लगता है अध्यात्म के प्रति अभिरुचि उनकी यहीं इसी इलाहाबाद की पृष्ठ भूमि में ही उपजी रही होगी। जो जीवन पर्यन्त रही है। वैदिक वांगमय की पूरी कथानकों की थाती है, उनकी ‘कथा संस्कृति’  युवा पीढ़ी पढ़े तो सही अवश्य आनन्द आयेगा।

कमलेश्वर की चर्चा फिल्म ‘आंधी’ से लेकर धारावाहिक ‘चन्द्रकांता संतति’ तक अथवा अन्य लेखन में उनकी कलम का ठाठ बोलता था। वह दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जब मनोनीत किये गये, तो उनका आरम्भ करवाया गया ‘परिक्रमा’ कार्यक्रम तो तब रेडियों की पहचान सा बन गया था। रेडियों की दुनियां में ‘परिक्रमा’ तब रेडियो का पर्याय बन गया था।

हम अपने पढऩे वाली युवा पीढ़ी को ये भी बता दें कि पहले इलाहाबाद में ‘नई कहानियां’ फिर बाद में ‘सारिका’ का सम्पादन कमलेश्वर ने किया। बाद में ‘श्रीवर्षा’ और ‘गंगा’ पत्रिका का भी उन्होंने सम्पादन किया। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित न जाने कितने ही समाचार पत्रों का सम्पादन उन्होंने किया।

अगर ये कहूं कि कमलेश्वर अध्यात्म जीवी थे, तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी गंगा-यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी तट का कथानक स्मृतियों में है।

आइये और अतीत में झांके।
साल 2001 में। 21वीं सदी का जब महाकुम्भ अवसर आया, तो इलाहाबाद में संगम किनारे कमलेश्वर ने भी रात बिताई थी और उसी दिन हम दोनों ही जनों ने ‘महाकुम्भ’ मेले से ‘आंखो देखा हाल’ पावन अवसर का सीधा प्रसारण दूरदर्शन से किया था। यानी धर्म, अध्यात्म और सामूहिक चेतना का दर्पण उस बहते सर्द हवाओं के बीच संगम किनारे ऊंचे मचान पर बैठकर अनुभव के नये आयाम तब स्थापित कर रहा था। कमलेश्वर की वह भिन्न पहचान रही। वह कितने अध्यात्म जीवी थे यह पता चला था। जो कमलेश्वर को धर्म अनुष्ठान और अध्यात्म से परे बताते थे, तो बता दूं यहां तब संगम में उन्होंने कुम्भ अवसर पर गोता भी लगाया था और बालू रेती पर माथे पर टीका भी लगाया था। पद यात्रा की और गरमा-गरम पकौड़ी फिर गरमा-गरम चाय का क्या कहना। संगम किनारे ‘रामदाना’ की लइया भी खायी थी।

कमलेश्वर इसी इलाहाबाद की मिट्टी से ही कमलेश्वर बने। यहां का दाना-पानी और जीवन के इन्द्रधनुषी रंगो के साथ जब वह बम्बई पहुंचे, तो उनके लेखन ने फिल्मों में कथानक ही बदल दिया था। न जाने कितने ही मील के पत्थर उन्होंने गाड़े थे। 

दूरदर्शन में कानपुर की घटना तीन बहनों की आत्महत्या पर ‘पानी में लकीरे’ जब बनाई, तो उस करंट अफेयर्स को देख लोग चौंक गये थे। 

1950 के बाद इलाहाबाद शहर के साहित्य सेवियों के बीच तब एक बात कहीं अधिक चर्चित रही है कि ‘क’ से कहानी और ‘क’ से कमलेश्वर। यही नहीं आजादी के बाद की गंगा-जमुना की बहती धारा थे कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार को संज्ञा भी दी जाती रही है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार को अजेय पहचान वाला माना जाता है। 
दुष्यंत कुमार की गजलों और शायरी के एक-एक शब्द आज भी गूंजते है। कमलेश्वर की लेखनी ने न जाने कितने ही मील के पत्थर गाड़े। उनको कथा साहित्य को माधुर्य और ज्ञान के साक्षात् युग कहें और दुश्यन्त कुमार! जिनकी शायरी में जिन्दगी के तमाम-तमाम लम्हों को हम जीवन्त महसूस कर सकते हैं, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

कमलेश्वर कथाकार के रुप में प्रतिष्ठित रहे, तो दुष्यंत कुमार शेर और गज़लों के लिए प्रतिष्ठित हुए। दोनो की कालजयी 

रचनायें-कथाये कभी न भुलाने वाली रही हैं। दुष्यंत की ‘शेर’ जरा पढक़र उसके मर्म को महसूस तो कीजिए। उस विराट मनीषी की कलम से निकले शब्दों का अर्थ और भाव पता चल जायेगा।

मत कहो आकाश में कोहरा घना है। ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।। 
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का। क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है।। 

कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए। कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।। 
यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है। चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।। 

तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमी नहीं। कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।।

बहरहाल तमाम विचारों के बाद हम यही कहेंगे कि कमलेश्वर-दुष्यंत कुमार की दोस्ती जब सम्बन्धों के डोर में बंधी, तो उसने युवा पीढ़ी के कई आयाम जोड़ दिये थे। उन महान लेखक, गज़ल-शेर के रचनाकारों का जीवन शैली गंगा-जमुनी तहजीब के साथ जीवन जीने की कला का जीता-जागता उदाहरण थे। इलाहाबाद की हिन्दी साहित्य की दुनिया हो अथवा पत्रकारिता जगत। कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार को हमेशा-हमेशा याद करती रहेगी। और याद दिलाता रहेगा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उन महान विभूतियों के पुष्पित पल्लवित होते अनेकानेक क्षणों, बिम्बों और सृजनशीलता के लम्हों को, जो आज भी भिन्न-भिन्न कथानकों में जीवन्त दिखने की लालसा संजोये है। सब कुछ प्रतिबिम्बित होता रहता है।

सच! आज कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार के बिना हिन्दी-उर्दू साहित्य जगत सूनां है और सूनी है। इलाहाबाद में कथा साहित्य की गलियां और आयाम दर आयाम की मंजरी। देखिये कब नई मंजरी में अंकुर फूटते हैं और कब ‘हाईटेक’ नई पीढ़ी नये मानदण्ड स्थापित करती है?

(आज यहीं तक अगले अंक में फिर भेंट होगी किसी खास ‘अनकही-अनसुनी’ कहानी के साथ)

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