इलाहाबाद कल आज और....गोस्वामी तुलसीदास का संग्रहित है जहां! हस्तलिखित 'रामचरित मानस'

  • Hasnain
  • Monday | 12th March, 2018
  • local
संक्षेप:

  • अंग्रेजों के शासन काल में कलकत्ता से पानी के जहाज में सामान लदकर आता था इलाहाबाद
  • रामचरित मानस` की मूल पांडु लिपी `बालकाण्ड` आज तक रखी है सुरक्षित
  • श्रृंगी ऋषि` के आशीर्वाद से `अयोध्यापति महाराजा दशरथ को हो सका था पुत्रलाभ

--वीरेन्द्र मिश्र

हर क्षण-हर पल। नवो-नवो भव होता ही रहता है और नित नूतन बिम्बों की आभा, अपने प्रभा मण्डल के साथ नये कथानकों को जन्म भी देती रहती है। जो उस काल के परिवेश और स्थितियों-परिस्थियों के अनुकूल वैचारिक दृष्टिकोण से समयानुसार उसे विस्तारित भी करती रहती है।

गंगा-यमुना की मिलन स्थली संगम (त्रिवेणी) तट पर बसा इलाहाबाद।

अंग्रेजों के शासन काल में कलकत्ता से पानी के जहाज में सामान व्यापार-विनिमय के लिए लदकर यहां इलाहाबाद पहुंचता था और यही सम्राट अकबर के किला के पास सरस्वती घाट पर जहां `मनकामेश्वर मन्दिर` है, उसके पास ही पानी का जहाज का छोटा बन्दरगाह भी बना था। उसकी पहचान यहां के आधुनिक विकास के पहले तक मौजूद रही है, जो नाव की सवारी करके बलुआ घाट, ककरहा घाट अथवा गऊघाट से संगम स्नान करने जाते, उस समय बखूबी उसका एहसास भी होता था।

अब तो सबकुछ बदल गया है। विस्तारित पुल, जो बना है। उसने उन सभी बीते दिनों की पहचान को आधुनिकतम धुरी से जोड़कर कहीं आगे बढ़ा दिया है। किन्तु यहां की यमुना नदी अथाह गहरी ही नहीं, निर्मल जलधारा के रूप में बहकर पहुंचती है, जिसे `बेतवा`, `केन` और `मन्दाकिनी` नदी की जलधारा विशाल बना  देती हैं, तभी तो विराट नदी का स्वरूप स्वयं उभर आता है। नानाजी देशमुख जब चित्रकूट में मन्दाकिनी के किनारे वास करते थे, तो उसकी जलधारा के मन्द-मन्द प्रवाह के पारखी और हिमायती थे।

यह बात मैं इसलिए आज चर्चित कर रहा हूं, क्योंकि पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी जब इलाहाबाद पहुंचे, तो उन्होंने पानी के जहाज की इलाहाबाद तक पहुंच बनाने पर मन्थन-चिन्तन भी किया और भविष्य की संभावनाओं को पंख लगाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रख छोड़ा है। गडकरी वैसे भी मोदी सरकार में ऐसे सम्मानित और विकासोन्मुखी वरिष्ठ मंत्री है, जो जनता के हितों में किये जाने वाले काम को पंख लगाने में माहिर हैं। अब तक जहां भी जुटे है चाहे राष्ट्रीय राजमार्गाे की बात हो अथवा जहाज रानी की समयावधि में येन-केन प्रकारेण उसे पूरा करवाना उनकी मंशा में शामिल रहा है। `नमामि गंगे` योजना तो वर्ष 2018 में निर्मल धारा के रूप में बहने की संकल्प साधना भी अब आगे चल पड़ी है।

मैं पिछले दिनों जब यमुना तट पर बसे गोस्वामी तुलसीदास की जन्म भूमि राजापुर पहुंचा, तो यह जानकर दंग रह गया कि अंग्रेजों के शासनकाल में उस समय कलकत्ता से मालवाहक जहाज राजापुर तक पहुंचा करते थे और वहां व्यापार जगत के व्यवसायी सीधे कलकत्ता तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब होते थे। ऐसा वहां के विशिष्ट बुद्धिजीवी व्यवसायी राजाराम अग्रवाल ने कहा। यदि यह सही है तो भविष्य में मालवाहक जहाजपोत सेवा निश्चित ही कामयाब हो सकती है और आगे बढ़ सकती है।

राजापुर की चर्चा सम्राट अकबर के शासन काल में यहां भक्तिकाल के महान कवि गोस्वामी तुलसीदास की सर्वाधिक स्थापित जन-जन के प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में रही है, जिन्होंने उस काल में `रामचरित मानस` जैसी महान कृति की रचना कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र का वर्णन क्या लिखा कि उस काल के मानस ग्रन्थ काव्य की लोकप्रियता को दूसरा आज तक छू नहीं सका हैं।

उनकी `रामचरित मानस` की मूल पांडु लिपी `बालकाण्ड` तो आज तक सुरक्षित भी है। `बालकाण्ड` के अधिकांश पन्ने गोस्वामी तुलसीदास के वंशजों के अधिकार क्षेत्र में वहां राजापुर में तुलसी घाट मन्दिर में सुरक्षित है, सुसज्जित संग्रहित है। इसे स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने अपने हाथों कलम-स्याही से लिखा-माना जाता है।

जब उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्य सचिव योगेन्द्र नारायण वहां पहुंचे थे, तो उन्होंने उसके संरक्षण की योजना को अंजाम दिलवाया था। उनके हाथों लिखा आदेश भी वहां संग्रहित है। हालांकि उसे अंग्रेजों के शासन काल में ही चोरी के बाद गंगा में फिकवा दिया गया था, जिसे खोज-बीन कर सुरक्षित रखना बड़ी बात है। यानी तुलसीदास के हस्तलिखित `मानस के पन्ने` (बालकाण्ड के अंश) 500 वर्षों बाद भी सुरक्षित हैं।

गंगा के किनारे `कड़ा धाम घाट` और उसके बाद `श्रृंगवेरपुर घाट` की ऐतिहासिक पौराणिक और उपनिषद् ज्ञान क्षेत्र के रूप में रही है, किन्तु जैसे ही शहर के करीब पहुंचती है गंगा। पहले `द्रौपदी घाट` राजापुर (शहर) पहुंचती है, बताते हैं यहा की पहचान महाभारत काल से जुड़ी रही है, जबकि इस घाट के दूसरी छोर पर `गुहराज` का क्षेत्र माना जाता रहा है, जो विभाण्डक ऋषि की यज्ञ तपस्थली भी रही है। विभाण्डक ऋषि ऐसे थे, जो जल के भीतर डुबकी लगाते, तो न जाने कितने दिनों तक डूबे रहते।

उन्हीं के परमप्रिय शिष्य `श्रृंगी ऋषि` के आशीर्वाद से `अयोध्यापति महाराजा दशरथ को पुत्रलाभ हो सका था।` श्रंगवेरपुर में उनका पावन आश्रम आज भी मान्यता प्राप्त है और अब उस क्षेत्र को उत्तर प्रदेश सरकार तीर्थ स्थली के रूप में विकसित करने की योजनाओं को भी अंजाम देने में जुटी है। श्रंगवेरपुर पहुंचय जाई... राजाराम के कथानक और ऋषि परम्परा तथा `शान्ता माई` के पहचान से जुड़ी है।

यहीं करीब है `कालाकांकर घाट` जहां गंगा के भीतर फेंकी गई गोस्वामी तुलसीदास लिखित रामचरित मानस की हस्तलिखित प्रतियां मिली थीं, जिन्हें आज भी राजापुर यमुना तट पर बने तुलसी घाट पर यथावत सुरक्षित रखा गया है। कालाकांकर में ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वदेशी के आह्वान के साथ विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। ये ऐतिहासिक कालखण्ड के धरोहर क्षेत्र हैं। वहीं से महामना मदन मोहन मालवीय ने `हिन्दुस्तान` अखबार निकाला था।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्राय: जब भी श्रृंगवेरपुर जाते, तो `कालाकांकर घाट` पर बैठा करते थे। उनकी पहचान स्थली आज भी वहां बनी हुई है - यमुना तट पर। प्रतापपुर से `रुसवाई घाट` होती `महिला घाट, मऊघाट, कौशाम्बी घाट` है, जो यमुना का क्षेत्र है। `पभोसा` की पहाड़ी के आगे `पौर-अलवारे` का क्षेत्र भी है, जहां इतिहासकार डॉ. अयोध्या प्रसाद पाण्डेय ने गंगा-यमुना दोनों नदियों के बालू पाये जाने की बात को आगे बढ़ाया और बताते हैं - पुरातन में इन्हीं क्षेत्रों से श्रीराम चलकर चित्रकूट पहुंचे थे। वहीं कभी संगम स्थली थी यानी घाटों-दर-घाटों की पहचान से सजा-संवरा है। इलाहाबाद का पूरा क्षेत्र। तभी तो नमामि गंगे योजना का केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इन घाटों की महत्ता के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। आइये अब इलाहाबाद के गंगा तट पर बने दूसरे राजापुर के `द्रौपदी घाट` की ओर चलें।

`द्रौपदी घाट`! जो कि शहर इलाहाबाद के उत्तरी पश्चिमी छोर पर स्थित घाट है। इस घाट के साथ महाभारत की द्रोपदी के पहुंच कर गंगा स्नान का कथानक मिलता है, किन्तु उससे आगे बढ़ते ही रसूलाबाद घाट भी है। यह ऐसा गंगा तट पर बना घाट है, जो भारतीय संस्कृति की पहचान स्वरूप पूरे शहर की आत्माओं की अन्तिम विश्राम स्थली बन चुका है। आज तो इलाहाबाद के विकास के क्रमों ने वहां घाट को `शान्ति स्थली` के रूप में विकसित कर दिया है। गंगा यहां से बहते फाफामऊ पुल के नीचे से आगे बढ़ती है और ऐतिहासिक `कर्जन रेलवे ब्रिज` (विश्व धरोहर) के नीचे से शिवकोटि घाट, फिर वहां से सीधे बक्शी बांध करीब नागवासुकी घाट पहुंचती है। जो आगे दशाश्वमेध घाट (दारागंज) से होकर गंगा घाट और संगम पहुंच जताी है। गंगा-यमुना के दो आबा पर बसा है प्रयाग, जहां तीन नदियों का संगम क्या हुआ। यज्ञ भूमि बन गया पूरा क्षेत्र और वहीं `त्रिवेणी` बन जाती है।

संगम क्षेत्र में यमुना का जो प्रवाह बहकर पहुंचता है, वह पीछे सरस्वती घाट, गऊ घाट, बलुआ घाट, कंकरहा घाट से आगे सुजावन घाट, जहां चारों ओर यमुना का प्रवाह है और बीच में `सुजावन देव` का विशाल मन्दिर पहाड़ के ऊपर युगों-युगों के बीतने के बाद भी मौजूद है। आगे बढ़ते जाइये `मझियारी, देवधान, नौढ़िया घाट, `सेमरी घाट` पहुंचती है। ये ऐसे क्षेत्र है, जहां नाम तो है घाटों का, किन्तु घाट हर क्षण-हर दिन घटता-बढ़ता, बदलता रहता है, क्योंकि इसके आगे बढ़कर ही गंगा अपनी बहन यमुना को अपने में डुबो लेती है, फिर आगे बढ़ चलती है। शांत होकर सिर्फ गंगा के नाम के साथ अथाह सागर में विलीन होने के लिए, जो काल की अवधारणा का सत्य रूप है।

यहां यह बात भी गौर करने वाली है कि आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कुम्भ मेले की परिकल्पना का जो स्वरूप बनाया, शायद उसी के चलते गंगा की धारा को निर्मल बनाने की जन चेतना भी बीते तीन दशक के प्रयासों में (जो अरबों की धन राशि खर्च करने के बाद भी पूरा नहीं हो सका), उसे आने वाले कुछ महीनों में पूरा करवाने की  कोशिश अब जारी है। जो कामयाबी की ओर बढ़ चली है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विकासोन्मुखी योजनाओं के साकार हो चले प्रयासों का यह परिणाम है। जिसमें इस क्षेत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आध्यात्मिक और प्रशासनिक व्यवस्था भी काम कर रही है। सच! गडकरी ने गंगा की धारा को निर्मल बनाने की ओर अब जोर लगा दिया है। उम्मीदें अब आकार ग्रहण करने लगी है।

(आज की `अनकही-अनसुनी` यहीं तक। अगले अंक में फिर भेंट होगी, इन्तजार कीजिए)

Related Articles