इलाहाबाद कल आज और...कुम्भ का रिहर्सल और माघ मेला इलाहाबाद का

  • Hasnain
  • Monday | 8th January, 2018
  • local
संक्षेप:

  • इलाहाबाद की मिट्टी लिख रही अपनी कहानी
  • पौष पूर्णिमा पर 35 लाख लोग कर चुके हैं त्रिवेणी संगम में स्नान
  • सम्राट अकबर पीता था गंगा जल

 

--वीरेन्द्र मिश्र

इलाहाबाद में वर्ष 2018 का जनवरी-फरवरी का महीना ‘कुम्भ’ रिहर्सल का महीना बन गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर यह कुम्भ रिहर्सल अपनी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक शक्ति से मनाया जा रहा है।

इलाहाबाद की मिट्टी अपनी कहानी लिख रही है। यहां त्रिवेणी है, तो मकर संक्रांति होने की सामूहिक चेतना में ऊर्जा संचयन की बेला भी है। इलाहाबाद की त्रिवेणी तट वासियों की जीवन ऊर्जा संचयन का इस काल में विशेष महत्व बढ़ जाता है। पूरा माघ महीना, जाड़े की परवाह किये बगैर बालू-रेती के ढेर पर पुआल का बिछावन और खुले आसमान के नीचे सोने के बाद ब्रह्मबेला में त्रिवेणी स्नान के दिन इतनी वैज्ञानिकता के साथ जीवन शैली की पहचान बन रही हैं।

वैदिक सिटी इलाहाबाद में ‘हाईटेक’ कुम्भ से सजी-संवरी कुम्भ नगरी में कुम्भ स्नान का रिहर्सल चल रहा है। पौष पूर्णिमा पर 35 लाख लोग त्रिवेणी संगम में स्नान कर चुके हैं, अब बारी है मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी और माघी पूर्णिमा स्नान की। यह तो माना ही जा सकता है कि पूरे एक माह में करोड़ों लोग अपनी मान्यतानुसार त्रिवेणी गंगा-यमुना के संगम में डुबकी लगा लेंगे। यह पहला मौका है जब आने वाले कुम्भ महात्म्य पर्व पर डुबकी लगाने का सिलसिला आगामी वर्ष 2019 में होगा, तो एक वर्ष पहले ही तैयारी को अंजाम दिया जा रहा है। इस महीने दो पूर्णिमा स्नान ने ‘नीला चांद’ के कथानक को पूरे 150 वर्ष बाद देखने का मौका भी दे दिया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे सन्त और कुशल प्रशासक के चलते आगामी वर्ष का ‘कुम्भ’ अवसर निश्चित ही ऐतिहासिक होगा। स्थितियां-परिस्थितियां कैसी भी हो दुनियाभर से कौतूहल और लालसा भरी निगाहें वक्त का इंतजार कर रही हैं, जिसमें ‘हाईटेक’ कुम्भ नगरी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष पहल पर ‘नमामि गंगे’ योजना के अन्तगर्त अपनी ‘मां गंगा’ के पावन, निर्मल, स्वच्छ गंगा में डुबकी लगाने का भक्तों को मौका मिलेगा। हालांकि इस रिहर्सल कुम्भ में भी स्वच्छ-निर्मल गंगा जल का पान और स्नान संभव हो चुका है।

कुम्भ स्नान में दुनियाभर से करोड़ों-करोड़ों सांसों का मेला जुटता है। यह मेला परम्परा रुप में युगों-युगों से लगता आ रहा है। वैदिक मंत्रों में चाहे ऋग्वेद हो, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद हो अथवा पौराणिक गाथायें हों रामायण, महाभारत सभी जगह सम्पदा दान कर देने का और कुम्भ का वर्णन मिलता है। यहां ब्राह्मण पुरोहित गरीबों के बीच अपना सर्वस्व शक्ति त्याग महाराज हर्ष हाथी पर सवार होकर आता है और सबकुछ दान कर पैदल वापस लौटता था। अद्भुत वर्णन चीनी यात्री ह्वेन सांग का मिलता है।

फिर तो चाहे आदि शंकराचार्य जी की यहां कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ हो अथवा स्वामी वल्लभचार्य की पावना की बात हो या फिर चैतन्य महाप्रभु की यहां पहुंच संगम में डुबकी लगाने की। यह अद्भुत कथानक भी मिलता है यज्ञ भूमि पावन तीर्थराज प्रयाग में लगने वाले कुम्भ का वर्णन मिलता है। हजारों-हजार साल का इतिहास है यहां संगम स्नान करने और पावन नक्षत्र योग में गंगा में डुबकी लगाने की परम्परा का।

जब पहला चीनी यात्री फाह्यान भारत आया, तो महात्मा गौतम बुद्ध के पांवों की धूलि की पावनता को तलाशते यहां आया था, परन्तु उसे उतनी कामयाबी नहीं मिली, किन्तु जब चीनी यात्री ह्वेन सांग भारत आया, तो संगम किनारे भी पहुंचा था और महाराजा हर्ष के साथ उसने पाया था कि न जाने कितने लोग यहां अपना सर्वस्व त्याग कर देते थे। तब महाराजा हर्ष  हर ‘अर्ध कुम्भ’ में (पांच वर्ष बाद) अपना पांच वर्ष का सिंचित धन दान कर दिया था।

ऐसे ही चैतन्य महाप्रभु वेणी माधव मन्दिर दर्शन करने के बाद बड़े हनुमानजी के मन्दिर होकर जब नाव से उस पार अरैल क्षेत्र में स्वामी वल्लभाचार्य से मिलने पहुंचे थे, तो दोनों ही जन नाव में एक साथ विचरण किया बताते है। फिर माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु को यहीं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। वे यमुना के जल में भाव बिहवल होकर कूद गये थे। जब उनकी मुलाकात स्वामी वल्लभाचार्य जी से हुई, तो दोनों जन घण्टों गले लगकर भक्त भाव में डूबे रहे थे।

परम्परायें यहीं थमी नहीं सनातन रुप में निरन्तर आगे बढ़ती रही। चाहे मुगलों का शासनकाल रहा हो अथवा उनके बाद अंग्रेजों का वर्चस्व, हर युग में मां गंगा के प्रति समर्पण भाव अपनी सजधज के साथ दिखता रहा है और कुम्भ पावनता कभी कम नहीं हुई।

‘आइने-अकबरी’ अनुसार तो सम्राट अकबर ने यहां किला बनवाया। वह जहां भी रहता गंगा जल ही पीता था। यहां तक कि उसके यहां का भोजन भी गंगा जल से ही बनता था। सम्राट अकबर ने तभी उसी काल में ‘गंगा-यमुना’ तहजीब को जन्म दिया। ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब भावनात्मक एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बन गया।

कहते हैं सम्राट अकबर भी इस किले के ऊपर बने मंच जहां आज तिरंगा झंडा लहराता हैं, वहीं बैठकर जोधाबाई के साथ महाकुम्भ मेले को देखा करता था, जहां परिदृश्य भी अद्भुत रहता था। जब विभिन्न अखाड़ा की ओर से शंकराचार्याे की शाही सवारी गंगा स्नान के लिए निकलती और नागा साधु-सन्तों की भीड़ उमड़ती, तो उन महान जनों का करतब और भाव विहवलता देखते ही बनती थी। परन्तु अफसोस इस बात का होता है कि उसी सम्राट अकबर ने संगम तट पर विशाल, पौराणिक ऐतिहासिक ‘अक्षयवट’ को अपने किले के भीतर कैद करवा दिया था। तब से लेकर आज तक उस ‘अक्षयवट’ की जड़ें और वृक्ष की पत्तियां, टहनी पूरे संगम यात्रियों को लुभाती हैं, किन्तु कोई भी वहां जा नहीं सकता है! वह वृक्ष आज रक्षा विभाग की देखरेख में है।

वर्ष 1989 में जब महाकुम्भ लगा था, तब 7 करोड़ भक्तों ने स्नान किया था। उसी काल में महाकुम्भ पर दूरदर्शन के लिए मैंने (वीरेन्द्र मिश्र) स्वयं कथानक तैयार किया। शंकर सुहेल के निर्देशन में और पं. रघुनाथ सेठ की संगीत निर्देशन में फिल्म ‘अमृत कुम्भ’ का निर्माण किया था। पूरे एक घण्टा की अवधि वाली फिल्म को दूरदर्शन ने राष्ट्रीय प्रसारण में प्रसारित किया था। उस फिल्म में अधिकांश ऐतिहासिक क्षणों के दृश्यों का फिल्मांकन भी हुआ था। चाहें सीता-राम का लक्ष्मण के साथ अक्षयवट पूजन हो अथवा चीनी चात्री ह्वेन सांग की संगम यात्रा हो या फिर महाराजा हर्ष का महादान का भव्य आयोजन सभी दृश्य गीतों की मणियों के साथ पूरे मेला परिसर में गूंज रहे थे।

यहां कुम्भ क्षेत्र ऐसा है, जहां हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध सभी धर्म के लोग इकट्ठा होते हैं और अपनी पहचान के साथ सजधज कर गंगा में गोता लगाते है। रोली-चन्दन लगाते हैं। बालू रेती पर भ्रमण करते हुए, बर्फीले पानी (गंगाजल) का पान करते है। रामदाना की लइया, तिल के लड्डू, मूंगफली और बाजरे-मेथी के बने लड्डुओं के साथ चना चबैना खाते है और गंगाजल पीते है यानी सबकुछ खाने और विचरण का अपना मजा होता है। बांसुरी धुन बजती रहती है, तो साधु-सन्तों-महात्माओं का प्रवचन जगह-जगह कौतूहल भरता रहता है।

हाईटेक युग में आज भी भक्तों का मेला वैसे ही जुटता है, जैसे बीते काल में जुटता रहा। अब ‘हाईटेक युग’ में भी चाहत वही है, किन्तु नागा साधुओं-साध्वी के दर्शन के लिए मन-भावन भीड़ उसी तरह जुटती है। जाहिर है अगले वर्ष 2019 में कुम्भ में हाईटेक कुम्भ के भी दर्शन होंगे। यानी जगह-जगह से सीधा प्रसारणों की फेहरिश्त होगी। कैमरा संचालन प्रसारण व्यक्ति-व्यक्ति के माध्यम से होगा, क्योंकि मोबाइल का युग है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्र की पहचान का प्रतीक बनकर यह कुम्भ मेला तब देखा जा सकेगा। दुनियाभर से तब करोड़ों की भीड़ इकट्ठा होने का अनुमान है।

इस रिहर्सल कुम्भ में, पूरे मेला परिसर में स्वच्छता का अभियान देखने को मिल रहा है। निर्मल गंगा, स्वच्छ गंगा का मिशन चरितार्थ हो रहा है। यही नहीं जगह-जगह हाईटेक शौचालयों के साथ इस बार ‘मिनरल वाटर आर.ओ.` पानी की व्यवस्था भी अंजाम पा रही है। पानी-स्वच्छता और पावन स्नान में डुबकी कुम्भ मेले की पहचान से जुड़ रहा है। अभी और भी बहुत कुछ बाकी है। शेष फिर...

(आज की यात्रा यहीं तक, अगले अंक में फिर भेंट होगी किसी खास ‘अनकही-अनसुनी’ कहानी के साथ)

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