इलाहाबाद कल आज और....बाबा कामिल बुल्के और हिन्दी साहित्य की इलाहाबादी बगिया

  • Hasnain
  • Monday | 2nd April, 2018
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संक्षेप:

  • इलाहाबाद की धरती की साहित्यिक सृजनशीलता का रहा है अद्भुत आपसी समन्वय
  • `बाबा कामिल बुल्के` ने काशी से संस्कृत भाषा का ज्ञान अर्जित किया
  • `बाबा कामिल बुल्के` को 1951 में भारत की नागरिकता मिली

--वीरेन्द्र मिश्र

नीला आसमान। अनन्त की ऊंचाइयां! और गहराइयों में विचरण करती इलाहाबाद की धरती की साहित्यिक सृजनशीलता का अद्भुत आपसी समन्वय रहा है। पूरे इलाहाबाद शहर की वादियों से जिनकी पहचान की धुरी भी चहु दिशाओं में उमड़ती-घुमड़ती रहीं। और तो और वे आन्दोलन की सी शक्ल में नित नये बिम्बों का आरोहण भी करती रहीं।

हम कह सकते हैं कि बीते काल में इलाहाबाद की पहचान भी साहित्य की अद्भुत लीलाओं का संगम रहा है। जिसमें गंगा-जमुनी तहजीब में कौन गोता नहीं लगाता था। यह जानने-समझने की बस जरूरत है।

आकाश की सी अनन्त ऊचांइयां में सप्तर्षि की आभा मण्डल जो आभासित होती है, उनमें आकाश गंगाओं और निहारिकाओं की अरुणिमा कुछ इस तरह शोभायमान होती रही है कि मानो हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक कालछन्दों की गणनायें भी पराश्त होकर ठिठक सी गयीं हो, किन्तु ऐसा कभी नहीं हुआ। एक ओर महाबीर प्रसाद द्विवेदी, बालकृष्ण भट्ट, अयोध्या प्रसाद सिंह हरिऔंध, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द, सुमित्रा नन्दन पंत जैसी महान विभूतियों का उत्तरायण पक्ष गहरा रहा था। तो दूसरी ओर धीरेन्द्र वर्मा, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, सूर्यकान्त त्रिपाठी `निराला`, डॉ. महादेवी वर्मा, डॉ. राम कुमार वर्मा, डॉ. हरिवंश राय बच्चन, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. मुकुन्द देव शर्मा, ओंकार शरद, भैरव प्रसाद गुप्त, कमलेश्वर, उपेन्द्र नाथ अश्क, दुष्यंत कुमार, डॉ. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नेमीचंद जैन, नरेश मेहता, फादर कामिल बुल्के, डॉ. जगदीश गुप्त, नर्मदेश्वर उपाध्याय, नरेश मिश्र, डॉ. सत्यदेव राजहंस, डॉ. शान्ति मेहरोत्रा, केशवचन्द वर्मा, डॉ. प्रभात शास्त्री, अमरकान्त, रविन्द्र कालिया - ममता कालिया, उमाकान्त मालवीय, केशव प्रसाद मिश्र, सिद्धेश्वर सिंह, कैलाश गौतम जैसी साहित्य काव्य और व्यंग्यविद्या की विभूतियां भी अवतरित होकर स्थापित रही थीं, जो नये कालछन्दों कथानकों के बीजांकुर को पौध बनाने में तत्पर और सक्रिय हो चलीं थी। कोई भी साहित्य सेवी किसी से कम नहीं था। कोई `छन्दबद्ध` था, कोई पारखी था, तो कोई `छन्दमुक्त` का हस्ताक्षर का जनक, कोई कथाकार-कहानीकार था, तो कोई शायर, कवि, आलोचक और रचना धर्मिता का अद्भुत संकलनकार। यही नहीं कुछ तो अपनी ज्ञान सम्पदा से हिन्दी भाषा। हिन्दी साहित्य की धारा को ही बदल कर नई कहानी गढ़ रहे थे।

इनमें अधिकांशत: जन्मना इलाहाबाद के नहीं थे। किन्तु कर्मणा और सृजनशीलता उनकी इसी त्रिवेणी संगम क्षेत्र इलाहाबाद में पनपी। और यहां के बाशिन्दों के अहम का वो दभंग करते हुए डटे तो डटे ही रहे। यहां तक कि विश्व पटल पर भी विराजमान हुए, तो इलाहाबाद के नाम से ही हुए और चमकते सितारों की बीच में सभी अनन्त यात्रा के साथ अपनी कालजयी सृजनधर्मिता को सौंप चमकते रहे। एक मायने में सभी अपना इतिहास रच रहे थे। आज हम ऐसे ही मनीषी जनों में से खास रहे व्यक्ति विशेष की चर्चा करेंगे, जिन्होंने सचमुच इतिहास रच दिया। तो आइये जानते हैं, ऐसे मनीषी-सन्त और समय के ऐसे सृजनकार को, जिनकी कालजयी रचनाओं ने नई कहानी लिख दी।

राम बोला? जी हां! आप जरुर चौंक गए होंगे, किन्तु चौंकिये नहीं।

ये नाम है बचपन का - `गोस्वामी तुलसीदास` जी का, जिन्होंने जन्म लेते ही `राम` का उच्चारण किया था। कहते हैं कि माता `हुलसी` सहित राजापुर के गांव और यमुना तट पर सर्वत्र उस बालक `राम बोला` की चर्चा तब आम हो गई थी। बस! इसी नाम से उन्हें पुकारा जाने लगा था। लगभग 600 वर्ष पुराना यह ऐतिहासिक खण्ड है।

रहीम दास जी ने उस काल में उनकी माता का नाम `हुलसी` ही लिखा था। बस! तभी से ये भी माना और जाना जाने लगा कि हुलसी पुत्र `राम बोला` यानी तुलसीदास है। जिनका कथानक आगे बढ़ा तो बढ़ता ही रहा। वह युगीन `रामचरित मानस` लिख भक्त मार्गी कहलाये और स्थापित हो गये कालजयी भक्त और रचनाकार के रुप में।

`विनय पत्रिका कवितावली` हो अथवा `सुंदरकाण्ड`, `हनुमान चालीसा, `हुनमान बाहुक`, `रामचरित मानस` जैसी महान कृति ने तो दुनियाभर में श्रीराम कथा को जन-जन तक पहुंचा दिया। कई सदियां बीत गई। तब से लेकर आज तक `मानस की चौपाई` और `गोस्वामी तुलसीदास` के कवित्त, दोहा, सोरठा की चर्चा आम जनमासन में यथावत रची-बसी है। ये तो कालजयी रचनायें हैं। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास प्राय: इलाहाबाद पहुंचकर त्रिवेणी संगम किनारे भी अपनी भक्ति के रस में डूबे रहते थे।

आज हम बात कर रहे हैं। `राम कथा और गोस्वामी तुलसीदास` के जीवन से जुड़े प्रसंगो पर। अत्याधुनिक काल में शोध करने के साथ हिन्दी भाषा के प्रचार-प्र्रसार को पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले बेल्जियम वासी `बाबा बुल्के` की। जिन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और डी. लिट भी किया और यहां की मिट्टी में रच-बस गये।

`बाबा कामिल बुल्के` निवासी तो थे विदेशी मूल के, लेकिन भारत पहुंचकर उन्होंने `संस्कृत भाषा और हिन्दी भाषा` का जो ज्ञान अर्जित किया, उसने उनकी पहचान को भारतीयता ही नहीं, बल्कि हिन्दी भाषी महान व्यक्तित्व के धनी के रुप में स्थापित कर दिया। और जन-जन के बीच वह `बाबा कामिल बुल्के` के नाम से स्थापित हो गए। इलाहाबाद शहर के हिन्दी साहित्य सेवियों के बीच उनका अच्छा ठाठ था। हिन्दी भाषा के प्रचार में उन्होंने जीवनभर काम किया।

`बाबा कामिल बुल्के` ने काशी से संस्कृत भाषा का ज्ञान अर्जित किया, फिर कलकत्ता पहुंचे और वहां से उन्होंने हिन्दी भाषा में ग्रेजुएट किया और फिर `म्योर सेण्ट्रल कॉलेज` इलाहाबाद पहुंचकर हिन्दी भाषा के प्रमुख श्री धीरेन्द्र वर्मा जी के सम्पर्क में वह आए। धीरेन्द्र वर्मा उस काल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे। डॉ.  रामकुमार वर्मा उन्हीं के परम् शिष्यों में रहे। बाद में वही हिन्दी विभाग के वह अध्यक्ष बने।

`बाबा कामिल बुल्के` भी उनके संरक्षण में ही हिन्दी के प्रति अपने राग-अनुराग में डूबे। वहीं से एम.ए. की (पोस्ट ग्रेजुएट) पढ़ाई पूरी की। उसी काल में उन्होंने `राम कथा और गोस्वामी तुलसीदास` पर जो शोध प्रबन्ध पूरा कर दिखाया, उसने उस महान व्यक्तित्व के धनी `बाबा कामिल बुल्के` के रूप में उन्हें स्थापित करा दिया। गोस्वामी तुलसीदास के जीवन वृत्त को लेकर वह ईसाई सन्त समर्पित रहा। वह `अवधी बोली` और `हिन्दी भाषा` का हिमायती होकर जीवन पर्यन्त प्रगति-दर-प्रगति वह चढ़ते रहे।

यह वही काल था, जब डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. रघुवंश, डॉ. हरिवंश राय बच्चन, डॉ. दामोदर अग्रवाल, फिराक गोरखपुरी, डॉ. महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जैसी महान हिन्दी साहित्य की विभूतियों का लालित्य चमकते सितारे के रुप में सुशोभित हो रहा था। उनके बीच में ही तब एक और नाम जुड़ चुका था। `बेल्जियम वासी कामिल बुल्के` का। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में जुटे और डूबे रहने वाले `बाबा कामिल बुल्के` इलाहाबाद के लिए भी चिरपरिचित नाम में शुमार करते थे। न जाने कितनी बार उन्होंने बस की सवारी करते हुये, सिराथू, मंंझनपुर, टेंवा, पूरव शरीरा, ऊनों, पौर-अलवारे से आगे महेवा घाट के यमुना पार बसे `राजापुर` जाते रहे और चित्रकूट के वन-वन, गांव-गांव भी घूमते रहे थे।

`बाबा कामिल बुल्के` को 1951 में भारत की नागरिकता मिली, तो फिर वो यहीं के जन-जन के चितेरे बनकर रह गए। `बाबा कामिल बुल्के` के मित्रों में तब आकाशवाणी इलाहाबाद के डॉ. नर्मदेश्वर उपाध्याय, डॉ. सत्यदेव राजहंस, कैशव चन्द्र वर्मा, नरेश मेहता, इलाचन्द जोशी जैसी महान विभूतियां भी शामिल रहीं।

मुझे भी उनका साक्षात्कार करने और उनसे बातचीत करने का कई बार मौका मिला। जब सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय जी की `श्रीराम जानकी यात्रा` इलाहाबाद पहुंची थी। तो उस समय भी लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा सहित अन्य हिन्दी जगत के प्रेमियों के बीच `बाबा कामिल बुल्के` भी शामिल रहे। आकाशवाणी इलाहाबाद में उनकी रिकॉर्डिंग के.के. वाष्र्णेय के सहयोग से कितनी ही बार हुयी थी। उनका संकलन भी वहां अवश्य मौजूद होगा।

`बाबा कामिल बुल्के` को हिन्दी भाषा के चितेरे साहित्यकार रामकथा के जानकार के अलावा आज की युवा पीढि़ उनकी लिखी हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश (डिक्शनरी) को अवश्य पढ़ती होगी। कैसी अद्भुत बात है कि विदेशी मूल का एक ऐसा संत जब इलाहाबाद की मिट्टी में रमा, जो प्राय: त्रिवेणी स्नान भी किया करते थे। तो उसने हिन्दी भाषा के विकास और उसे राजभाषा बनवाने के योगदान में अग्रणी पंक्ति के महान नायक लेखक के रुप में शामिल रहे। अपने जीवन के अंतिम काल में जब वो तमाम बीमारियों से जूझते हुये, रांची से काशी और काशी से इलाहाबाद आते, तो त्रिवेणी संगम का किनारा इलाहाबाद विश्वविद्यालय का कोना-कोना और वहां के हिन्दी सेवियों के बीच उनकी पहचान, मर्म और उनका ज्ञान खुलकर बोलता था। न जाने कितनी `अनकही-अनसुनी` कथानकों की लडिय़ां इलाहाबाद वासियों के बीच भी समायी होगी, जो 1948 से लेकर 1982 तक अनवरत रुप में हर क्षण नये मानदण्डों को स्थापित करवाती रही। परन्तु आज सूनी है इलाहाबाद की `साहित्य की बगिया`। किन्तु उनकी स्मृतियां हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद विश्वविद्यालय का परिसर, हिन्दुस्तानी अकादमी, आकाशवाणी, दारागंज अहाते में सुवासित होती रहती हैं। 

वह अपना रिजर्वेशन स्वयं कराने स्टेशन जाते गमछा लटकाये, खद्दर का कुर्ता-पायजामा धवल पोषाक उनकी पहचान से जुड़ा था। मुस्कुराकर मिलना और उनसे हिन्दी (अवधी) भाषा में बातें करना लोगों को सुहाता था। स्थापित रचनाकारों में उनकी पहचान रही। उनकी हिन्दी अवधी बोली की मिठास, उनकी पहचान को नित आगे बढ़ाती रही। जो समयकाल के बावजूद भी धूमिल नहीं हुई है। इलाहाबाद शहर से जुड़ी अनन्त हैं उनकी `अनकही-अनसुनी`

सच! `बाबा कामिल बुल्के` ने `राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन` और `महामना मदन मोहन मालवीय जी` की धरती प्रयाग से हिन्दी भाषा को विश्व स्तर तक लोकप्रिय बनाने और मानदण्ड स्थापित कराने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। अब जबकि रांची के `सेण्ट ज़ेवियर कॉलेज` के परिसर में `पद्मभूषण डॉ. कामिल बुल्के` की मूर्ति का अनावरण हुआ है। तो ईसाई समुदाय के महान संत और हिन्दी भाषा के अनन्य भक्त की पहचान से इलाहाबाद भी अभिसिंचित हो उठा है। जाहिर है यहां का `विश्वविद्यालय` अथवा `हिन्दी साहित्य` से जुड़े विविध सोपानों में उनकी मधुर वाणी आम जनों के बीच गूंजती और सुवासित होती जान पड़ती होगी।

ऐसे में  इलाहाबाद की धरती पर भी बाबा कामिल बुल्के के हिन्दी भाषा से जुड़े ज्ञान और उनकी अनुभूतियों पर इस शहर में भी कहीं न कहीं `उनकी मूर्ति का अनावरण` अवश्य किया जाना चाहिए। ताकि नई पीढ़ी भी उन्हें अपना सम्मान और भाव प्रकट करती रह सके और ज्ञान सम्पदा को भुला न सके!

आज की यात्रा यहीं तक। अगले अंक में फिर भेंट होगी। इन्तजार कीजिए...

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