इलाहाबाद कल आज और....विश्व धरोहर 'कर्जन रेलवे पुल' और आगे बढ़ता इलाहाबाद शहर!

  • Hasnain
  • Monday | 9th April, 2018
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संक्षेप:

  • `कच्छपुरवा` था इलाहाबाद जंक्शन का पुराना नाम
  • `कर्जन पुल` पूरा कर चुका है सौ साल की अवधि
  • `सम्राट अकबर` का बनाया किला अपनी गंगा-जमुनी पहचान का करता है बखान

--वीरेन्द्र मिश्र

राजधानी दिल्ली की ओर से पूर्व दिशा में इलाहाबाद से होकर गुजरने वाली अथवा पूर्व दिशा के राज्यों से राजधानी पहुंचने वाली `अप` और `डाउन` गाड़ियां अमूमन इलाहाबाद जंक्शन पर जरूर रुकती है। हम ये कह सकते हैं कि चौबीसों घण्टें इलाहाबाद जंक्शन पर `अप` और `डाउन` गाड़ियों का तांता लगा रहता है। यही नहीं माल गाड़ियां भी वहीं से गुजरती है, जो गंगा या फिर यमुना पुलों से पार होकर गन्तव्य स्थान की ओर जाती है। हालांकि अब रेलवे का नया ट्रैक भी आकार ग्रहण कर रहा है, जो सीधे `छिवकी स्टेशन` से जुड़ता है। और आगे बढ़ जाता है।

इलाहाबाद जंक्शन का पुरातन नाम `कच्छपुरवा` था, जो शायद मुगलकाल में मच्छुआरों की बस्ती और बाग-बगीचें के रूप में ही जाना जाता था, परन्तु अंग्रेजी हुकूमत ने बीसवीं सदी के आरम्भ में यहां से जौनपुर फैजाबाद की ओर जाने वाले रेलवे लाइन की शुरुआत हुई, जो `फाफामऊ कर्जन पुल` से पार होती थी। यह `कर्जन पुल` ऐतिहासिक कालखण्डों से भी जुड़ा है। `कर्जन पुल` पूरा `शतक-यात्री` बनकर अब सौ साल की अवधि पूरी कर चुका है और भारतीय रेल की `अमानत` और `धरोहर` के रूप में स्थापित हो चुका है। इस `कर्जन पुल` को धरोहर के रूप में स्थापित कराने वालें प्रयासों में के.के. वाष्र्णेय की सक्रियता को नकारा नहीं जा सकता। इलाहाबाद के तेलियर गंज, मेंहदौरी, शिवकोटी, मोतीलाल इंजीनियरिन्ग कॉलेज और भारतीय सेना के जवानों का योगदान तो कही अधिक रहा है। जिन्होंने इसको बचाये रखने में अहम योगदान दिया।

कैसा अद्भुत पुल है यह `कर्जन पुल`। जिसको ध्वस्त करने की हजार कोशिशें भी बेकार गयीं। लाख जतन के बावजूद इसे हिलाया-तोड़ा भी नहीं जा सका। अंग्रेजों के जमाने का बना है ये पुल कितने कालखण्डों को पार कर चुका है। शायद कोई नहीं जानता।

`कर्जन पुल`! ये ऐसा पुल है, जिसकी पहचान के साथ `लॉर्ड कर्जन` का नाम विशेष रुप से जुड़ा रहा है। कहने के लिए लोहे का ये पुल जरूर है, जो  `झांझरिया पुल` के नाम से भी जाना जाता रहा है। किन्तु इसकी पहचान अमरिका तक पहुंच बनाने में कामयाब रही है। अमरीकी पत्र-पत्रिकाओं में भी भारतीय रेल की आरम्भिक दिनों की तस्वीरों में ये चर्चा का विषय रहा है। आज भी है, किन्तु! अब उस पर से रेलगाड़ियां नहीं गुजरती, बल्कि दूसरे पुल की आवाज़ के सहारे यह पुल अपनी पहचान को जिन्दा बनाये हुए है।

`भारतीय रेल` द्वारा यहां दूसरा पुल वर्षों पहले ही बन चुका है। गाडिय़ों का आवागमन भी उस पर जारी है। परन्तु गंगा पर बने इस `झांझरिया-कर्जन पुल (ब्रिज)` को ढहा देने, यानी नष्ट कर देने का प्रयास जब आरम्भ हुआ, तो इस पुल पर प्रात: यानी ब्रह्म बेला में सुधी नागरिकों की भ्रमण शैली ताकत बन गई। क्योंकि कर्जन पुल `भ्रमण पुल` के रूप में बन चुका है। पुल के ऊपर से गंगा का बहाव जितना लुभाता था, उससे कहीं अधिक पुल के दोनों ओर का लम्बा पाट और `कच्छार` अनायास ही डराता भी है। और गंगा मां के बहाव की पहचान शक्ति का द्योत्तक बनकर लोगों को अध्ययन का मौका भी देता आ रहा है। प्रात: भ्रमणकारियों की चाहत ने ही इस पुल को टूटने नहीं दिया, बल्कि अद्भुत सहभागिता ने एक नई कहानी ही लिख दी। वरिष्ठ इंजीनियर के.के. वार्ष्णेय, जो साहित्य और संगीत की सलिला को गंगा की कल-कल, छल-छल बहती धारा के साथ जोड़कर विचारों की पुनार्वृत्ति करते रहे है। और वहां का यशोगान प्रचार को सामूहिक चेतना के माध्यम से जन-जन को जागरूक करते रहे है। कहते हैं कि यह उनकी शौकिया पहचान का सबब है।

बताते हैं `यूनेस्कों के धरोहर` में शामिल हो चुके भारतीय रेल के इस `कर्जन पुल` पर आस-पास के बाशिन्दों ने दीपावली के अवसर पर दीप-ज्योति और कैंडल मार्च का नयनाभिराम दृश्य उत्पन्न कराने में कोई कोर कसर बाकि नहीं रख छोड़ा था। दोनों ओर से बड़ी सख्यां में दीपक की लौ की रोशनी के साथ पिछले काल में (सामूहिक यात्रा ने) एक नई कहानी लिख दी। शायद यह सामूहिक चेतना का पर्याय ही था, जिसने जागरुकता में चार चांद लगा दिये।

परिणाम ये निकला कि ये `कर्जन पुल` सौ साल की उम्र की दहलीज पूरा करने के बावजूद नष्ट नहीं हुआ, बल्कि धरोहर के रुप में आबाद हो गया और इलाहाबाद की मिट्टी और गंगा जल के बीच की इस पहचान ने अपनी नई कहानी लिख दी। वर्षों पहले जब विश्व प्रसिद्ध संगीतकार `एस डी बर्मन` (अगरतला वाले) की कलश यात्रा पर उनके पुत्र `आर डी बर्मन` स्वयं इलाहाबाद पहुंचे थे, तो वह इस `कर्जन पुल` को देखने भी पहुंचे थे। गाडिय़ों के गुजरने पर पुल से अद्भुत झंकरित आवाज गूंजती थीं। संगीत की स्वर लहरियों में झंकरित वातावरण में उन्होंने अगरतला में `क्षीर सागर` के किले के बीच गूंजने वाली ध्वनि तरंगों का अहसास किया था। हालांकि ये तो अब बीते काल की बातें हैं। परन्तु बीते वर्ष इस `कर्जन पुल` पर तो फिल्म `शादी में जरूर आना` की शूटिन्ग भी हो चुकी है। राजकुमार राव और कृति खरबंदा के अभिनय का साक्षी भी बन चुका है। यह फिल्म इलाहाबाद की पहचान से जुड़ी रही है। इस फिल्म के पोस्टर की पहचान में यही `कर्जन पुल` जुड़ा रहा है।

आइये अब जरा इलाहाबाद जंक्शन की ओर `सिविल लाइन्स` और `चौक` का क्षेत्र से निकलकर गंगा किनारे बांध की ओर आगे बढ़े। चौक की ओर जहां पुरातन बस्तियों की पहचान और महाराजा रींवा (जहां का सफेद बाग आज भी चर्चित है) का महल रुपी `गुलाब पैलेस` था, जो आज भी बना हुआ है, मौजूद है। हालांकि पहले यहां महाराजा का निवास था, अब होटल के रुप में तब्दील हो चुका है। और `गुलाब मैंशन` के नाम से जाना जाता है। यहीं कभी सिनेमा हॉल भी होता था। अब तो दूकानों की यहां भरमार है। आगे बढ़ते ही `यूनाइटेड भारत` का `विशाल भवन` है, जहां से कभी `यूनाइटेड भारत समाचार पत्र` भी निकलता था, जो अब शिक्षा का केन्द्र है। इलाहाबाद स्टेशन के बाहर दूसरी ओर `थार्न हिल रोड` की ओर कदम बढ़ाइये, तो `विशाल पत्थर गिरजाघर` का चक्कर काटने के पहले ऐतिहासिक पहचान के साथ `इलाहाबाद का हाईकोर्ट` अपनी पहचान और खूबसूरती के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। जो बरबस ही मन मोह लेता हैं, जहां की ऐतिहासिक पहचान कई कालखण्डों में समायी मिलती है।

`पत्थर गिरजाघर` के चारों ओर चक्कर काटिये और पुराने रिक्शे को अलविदा कहते हुए, ई-रिक्शा से सिविल लाइन की खूबसूरती और पहचान को निहारते आगे बढ़िए, तो गंगा के किनारे पहुंच बनाते-बनाते सिविल लाइन्स स्थित `हनुमान मन्दिर` `शहीद वॉल`, फिर `कम्पनी बाग`, `मेडिकल चौराहा,जॉर्ज टाउन, के.पी. कॉलेज ग्रांउड, सीएमपी डिग्री कॉलेज, सोहबतिया बाग` और `बैरहाना` जैसे मोहल्लों से गुजरते हुये, `परेड ग्राउंड` पार कर सहजता से त्रिवेणी संगम पहुंचा जा सकता है, जहां पहुंचने के पहले `सिद्धपीठ आलोप शंकरी`, (अलोपी देवी) और `भैरोनाथ जी` का मंदिर है। आगे बढ़िए इलाहाबाद में `सम्राट अकबर` का बनाया किला अपनी गंगा-जमुनी पहचान का बखान करता मौजूद है। तो वहीं बांधवा ढाल के ठीक नीचे उतरते ही किला घाट की ओर कदम बढ़ते ही `बड़े हनुमान जी` की विशाल प्रतिमा (विग्रह-लेटे हुयी) अपनी युगों पुरानी आध्यात्मिक शक्ति का बखान करते मन मोह लेती है। और अध्यात्म जीवी `जयकारा` के साथ आगे बढ़ जाते हैं। त्रिवेणी स्नान करने वाला जब तक `बड़े हनुमान` का दर्शन नहीं कर लेता, उसकी आध्यात्मिक भावना पूर्ण नहीं होती। और तो और यहां मगद (मोतीचूर) के लड्डू का प्रसाद और `कचौड़ी भाजी` का सेवन पूरी थकान को मिटा देता है।

वैसे इलाहाबाद शहर अब सचमुच बदल रहा है। कई मायनों में सज-धज भी रहा है। इलाहाबाद जंक्शन की ऐतिहासिक पहचान आध्यात्मिक कालखण्डों के साथ पुरातन धरोहरों की पहचान से स्वयं को बरबस ही अब जोड़ भी रही है।

इलाहाबाद जंक्शन के दोनों ओर की सहजता, सरलता और भव्यता का नमूना स्वच्छता का पर्याय बनकर  बोलता  है, साथ ही `आध्यात्म जीवियों` का यह शहर अब `हाइटेक` होता अपनी पहचान में नई कलाकृतियों को जोड़कर भी आगे बढ़ रहा है। स्टेशन से बाहर निकलिये, तो उसके पहले जरा ठिठकिये! तो आपको  सीढ़ी से उतरते ही मिलेगा `इलाहाबाद संग्राहलय` की पहचान से जुड़ी अनेक अनुकृतियों का दर्शन, मूर्तियों अथवा धरोहरों के बिम्बों के माध्यम से जो व्यक्त होता दिखाई पड़ता है। सिविल लाइन का क्षेत्र तो पूरी तरह से सज-धज गया है, जबकि चौक का क्षेत्र सजावट और सौन्दर्यीकरण के विविध भेदों से गुजरता अभी बस! आगे बढ़ रहा है। पास ही  खुसरो बाग की पहचान बोलती है, तो `लीडर प्रेस` जैसा ऐतिहासिक आजादी की लड़ाई लडऩे वालों के लोकप्रिय समाचार पत्र `लीडर``भारत` और बाद में `आज` की पहचान से जुड़ा मिल जाता है। और इससे लगा पुल, जिसके निर्माण में इलाहाबाद शहर के जन सेवक और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के साथ रहकर काम करने वाले जन सेवकों में से एक `शम्भूनाथ अग्रवाल` द्वारा शहर को दिया अपना योगदान बोलता दिखाई पड़ता है, क्योंकि उन्हीं के प्रयास से जो पुल बना है, वो शहर को भारतीय सेनाओं की पहचान से जोड़ता है और आगे उसे पार करके मशहूर `मैकफर्सन लेक` जैसे आरण्यक और `बर्ड सेंचुरी` के रूप में उस छोटी सी झील तक भी पहुंचा जा सकता है। जिसका सौंदर्यीकरण भी जरूरी है।

हम ये कह सकते हैं कि इलाहाबाद शहर अब ठहरा हुआ या रुका हुआ और बोझिल शहर नहीं, बल्कि सजता-संवरता अपनी पहचान को जग-प्रसिद्ध बनाने में कामयाबी की ओर निरन्तर सक्रिय शहर है। जाहिर है, तमाम व्यवस्थायें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के `सबका साथ, सबका विकास` की परिकल्पना को साकार कर आगे बढ़ा रही है। जिसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आध्यात्मिक और समाजिक सरोकार से जुड़ी विचार धारा फलीभूत कर दिखाने का ये प्रयास भरा माध्यम है। और भी बहुत कुछ है यहां, किन्तु...

(आज की यात्रा यहीं तक। अगले अंक में फिर भेंट होगी। इन्तजार कीजिए...)

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