इलाहाबाद कल आज और...‘दूरदर्शन इलाहाबाद’ होकर भी नहीं, आखिर क्यों?

  • Hasnain
  • Monday | 1st January, 2018
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संक्षेप:

  • इलाहाबाद के यमुना ब्रिज बनवाने वाले का नहीं लगा कोई सिलापट्ट।
  • इन्दिरा गांधी ने अपनी माता कमला नेहरू के जन्मदिन पर इलाहाबाद को दिया ‘दूरदर्शन केन्द्र’।
  • महाकुम्भ नगरी की अद्भुत लीला देखने को उमड़ती है दुनियाभर के लोगों की भीड़।

--वीरेन्द्र मिश्र

इलाहाबाद की मिट्टी की अपनी कहानी है और इलाहाबाद के विकासक्रमों की अपनी फेहरिश्त भी है, जिसमें इलाहाबाद के लोगों की अपनी मशक्कत और अपने पहचान की कवायद भी जुड़ती रही है। आध्यात्मिक जगत के ऐतिहासिक कालखण्डों की बात हो अथवा शिक्षा के विविध आयामों के सिंचन पल्लवन की बात हो। यहां धर्म-संस्कृति का तो बोलबाला रहा ही है, इन दोनों से परे आपसी सौहार्द के कथानक के सवाल के साथ यहां के लोगों ने आगे ही आगे रहना और बढ़ना सीखा है।

वैदिक ज्ञान भण्डारों की बात की जाये, तो यहां महर्षि भरद्वाज के उस आश्रम की व्यवस्थाओं का वर्णन मिलता है, जहां हजारों हजार विद्यार्थी दूर-दूर से पढ़ने आया करते थे, जो यहां अध्यात्म और विज्ञान की पाठशाला को समर्पित होकर प्रकृति के नानाविध कालछन्दों से स्वयं को जोड़ते थे। वास्तव में यह धरती यज्ञ भूमि रही है। न जाने कितने ही यज्ञ इस धरती पर सम्पन्न हो चुके हैं, जिसकी कोई गणना किसी के पास भी नहीं मिल सकती है।

अब यही देखिये न यहां आज ‘हाईटेक’ हो जाने का जो चलन बढ़ा है, उसमें यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों (छात्र-छात्राओं) का योगदान कहीं अधिक है। इलाहाबाद की पहचान ‘अनकही-अनसुनी’ के साथ नई पीढ़ी की उपलब्धियों के साथ ही आगे बढ़ेगी।

अनकही-अनसुनी

कितनी अजीब बात मानी जायेगी, जिनके नामों की गणना के साथ इतिहास यहां लिखा जाना चाहिए था, उनके नामों को यहां राजनीतिक कारणों से बिसराया ही नहीं जाता रहा, अपितु उनका नाम मिटा देने का सिलसिला भी चलता रहा। शायद ही किसी पुरातन वैदिक अथवा आधुनिक किसी विद्वान, मनीषी वैज्ञानिक कालजयी रचनाकार संस्कृति वाहक का नाम जुड़ा अथवा स्थापित हुआ दिखलाई पड़ता हो। 
धर्म और मजहब से जुड़ी स्थितियां यहां जरुर भिन्न रही है। सच तो ये है कि यहां एक ही परिवार के लोगों के नामों से जुडक़र शहर नामांकित जाता रहा है।

आज हम आपको ऐसी कहानी और उस माध्यम का जिक्र करेंगे, जिसे नेहरू परिवार की परम्परा ने स्थापित कर आगे बढ़ाने का यत्न जरुर किया, परन्तु तीन दशक बीत जाने के बाद भी उसकी सम्पूर्ण स्थापना नहीं हो सकी। ठीक उसी प्रकार से जैसे कि इलाहाबाद के यमुना नदी के ऊपर बना ‘यमुना ब्रिज’ है। जो आधुनिकतम और ‘हाईटेक’ है, जिसको बनवाने वाले हेमवती नन्दन बहुगुणा, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, अमिताभ बच्चन, डॉ. मुरली मनोहर जोशी और न जाने किनका योगदान माना जाये। किसी प्रकार यह बन कर आमजन को मिल सका है। परन्तु किसने इसे बनवाया, कोई सिलापट्ट लगा यहां नहीं मिलता है।

यमुना ब्रिज

यहां ‘दूरदर्शन’ जिसकी स्थापना में तीन-तीन प्रधानमंत्रियों ने अपनी पहल का दबाव बनाया, परन्तु आज तक न तो वह ‘पूर्णत्व’ के रुप में स्थापित हो सका है और उसका कोई महत्व नहीं है और न ही उस केन्द्र की कोई पहचान है। सड़क, अस्पताल, शिक्षा केन्द्र अथवा अन्य पहचानों को आजादी के बाद कही जगह मिली हो। सारा जहां केवल और सिर्फ एक परिवार की पहचान को ही कुरेदता मिलता है। कैसी हास्यापद बात है! परन्तु अब ‘हाईटेक’ हो रहा अपना इलाहाबाद तो यहां विकास सबके साथ मिलकर आगे बढ़ रहा है।

यहां का प्रसारण माध्यम दूरदर्शन होकर भी नहीं है। क्या दूरदर्शन के इस केन्द्र में यहां की मिट्टी और यहां की संस्कृति के साथ युवा पीढ़ी के हित में कुछ हुआ है? नहीं!  कैसे?

वर्ष 1983 में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने दूरदर्शन में ट्रान्समीटर की शुरूआत कराकर देशभर में उसका संजाल फैलाने का प्रयास किया, जिसे उनके पुत्र ने पूरा किया। परन्तु इन्दिरा गांधी ने अपनी माता कमला नेहरू के नाम पर उनके जन्मदिन पर इलाहाबाद को तोहफे के रुप में ‘दूरदर्शन केन्द्र’ का ताना बाना बुना। जो रातों रात दिल्ली के मेट्रो स्ट्रेशन का 1 किलावाट का ट्रांसमीटर उखड़वाकर उसे अविलम्ब इलाहाबाद में खुलवाने की तब पहल की गई, जिसे आनन-फानन में आकाशवाणी इलाहाबाद के मुख्य अभियन्ता डी. रस्तोगी की देखरेख में स्थापित कराने में दिन-रात एक कर दिया। 1 अगस्त 1983 को यह स्थापित भी हो गया सिलापट्ट भी लग गया, किन्तु बाद में उसका कोई नाम लेवा नहीं मिला। वक्त के साथ प्रयास के सोपान आगे बढ़ने आरम्भ हुए, किन्तु तब तक राजनेताओं का इलाहाबाद से मोह भंग हो गया, क्योंकि वहां से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। उन्होंने अपने मंत्री पी. उपेन्द्र के माध्यम से यहां दूरदर्शन केन्द्र खुलवाने की पहल फिर से आरम्भ की और नया कटरा और मम्फोर्ड गंज की ढाल पर खाली पड़े ‘कार्पेण्टरी स्कूल’ को खत्म कर वहां दूरदर्शन केन्द्र प्रोड्क्शन सेण्टर बनाने की पहल हुई, उसका भी उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया। दूरदर्शन इलाहाबाद में खुल भी गया। देखिये यह सारी प्रक्रिया किस गति से होती रही और कितनी दयनीय और सोचनीय रही। इलाहाबाद को दूरदर्शन की सौगात इलाहाबाद वासियों को मिलकर भी आज तक नहीं मिली है।

इन्दिरा गांधी

कहने को कुम्भ नगरी है इलाहाबाद। करोड़ों-करोड़ सांसों का मेला यहां हर 12 वर्षों में जुटता है। दुनियाभर के लोगों की भीड़ महाकुम्भ नगरी की अद्भुत लीला देखने को उमड़ती है। किन्तु पिछले 27 सालों में यहां इलाहाबाद का अपना न तो पूरी तरह से दूरदर्शन चैनल का प्रोड्क्शन होता है। और न ही इलाहाबाद के युवा पीढ़ी की प्रतिनिधित्व देखने को मिलती है। कारण स्पष्ट है यहां का दूरदर्शन केन्द्र बनकर भी इस लायक नहीं है कि वो पूरे जिले की संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम का प्रसारण कर सके। तभी तो यह लखनऊ-बनारस और राजधानी दिल्ली की ओर मुंह ताकता रहता है।

कुम्भ मेला

लखनऊ दूरदर्शन केन्द्र के सहारे इलाहाबाद केन्द्र बेचारगी की आड़ में बस चला जा रहा है। कैसे यहां के कर्मचारियों की ढुलमुल व्यवस्था से देखा और जाना जा सकता है। न उसकी सुध लेने वाला कोई है और न ही दूरदर्शन महानिदेशालय में बैठे अलम्बरदारों को वहां के बारे में सोचने की फुर्सत है।

अतीत में झांकते हुये जो अनकही-अनसुनी उभरकर सामने आती है। उसमें ये बात खुलकर पता चलती है कि आठवें दशक में 24-25 जुलाई सन् 1983 को अचानक जब तत्कालीन प्रधानमंत्री को अपने शहर इलाहाबाद की याद आई, तो उनको अपनी मां कमला नेहरू की भी याद आई। उन्होंने तत्परता दिखाते हुये तब कमला नेहरू अस्पताल को हाईटेक बनाने का उनके जन्मदिन 1 अगस्त को निर्णय लिया और उसी दिन इलाहाबाद को दूरदर्शन देने का निर्णय भी किया था। आनन-फानन में राजधानी दिल्ली में संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन के परिसर में लगे मेट्रो चैनल के 1 किलोवाट का ट्रांसमीटर अविलम्ब आकाशवाणी इलाहाबाद के परिसर में लगवा दिया था। जिसे तब के वरिष्ठ इंजीनियर एन.एन. अग्रवाल सहित युवा इंजीनियर्स  के.के. वाष्र्णेय, रत्नाकर सिंह, राजेन्द्र खरे और सैकिया ने दिन-रात एक कर उसे अंजाम दिया। दूरदर्शन का अपना कोई भवन तो था नहीं, लिहाजा अशोक नगर स्थित दूरदर्शन टॉवर के साथ ही दूरदर्शन का शिलान्यास भी किया गया। तब श्रीमती गांधी के साथ विश्वनाथ प्रताप सिंह, राजेन्द्र कुमारी वाजपेयी, एल.एच. भगत जैसे नेता भी गवाह के रुप में शामिल हुये थे। वक्त बदला जब देश के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह बने, तो 7 जुलाई 1990 को उसका पुन: शिलान्यास किया गया। तो वहीं डी.डी. मेट्रो का 10 किलोवाट का दूसरा ट्रांसमीटर भी लगाया गया। प्रयास-दर-प्रयास चलते रहे। जतन-दर-जतन कोशिशे जारी रही। यहां तक की तत्कालीन सांसद जनेश्वर मिश्रा ने लोकसभा में भी ये मुद्दा उठाया था। तत्कालीन उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी ने भी प्रयास किये थे, परन्तु आधे घण्टे प्रसारण के अलावा उस दूरदर्शन केन्द्र से आज तक कोई विशेष प्रसारण नहीं हो सका। सारी व्यवस्थायें त्वरित और तत्काल प्रभाव के सहारे चलती रही है, परन्तु दूरदर्शन इलाहाबाद से डी.डी. न्यूज़ की तत्परता के अलावा कुछ नहीं दिखता है। 27 वर्षों के बीत जाने के बाद अब जबकि कुम्भ नगरी को सजाने के प्रयास में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्या निरन्तर प्रयास में सक्रिय है।

कमला नेहरू

आगामी वर्ष कुम्भ लगेगा, दुनिया का मेला जुटेगा। तब बहुत कुछ उम्मीद की जा सकती है। इलाहाबाद को हाईटेक होने की श्रेणी में ऐसी सम्भावना बनती जान पड़ रही है कि इलाहाबाद शहर से डीजिटल ट्रांसमीटर (डीटीटी) के 6 चैनल तक प्रसारण के लिए तैयार हो सकेंगे। जिसमें दूरदर्शन के तीन और तीन स्वतंत्र चैनल हो सकते है।

अनकही-अनसुनी में ये बातें भी उभरकर सामने आई है कि बहुत सम्भव हैं यहां से डी.डी. न्यूज़ चैनल के प्रसारण की नई व्यवस्था को अंजाम दिया जा सके, परन्तु यह सवाल जानकारों के बीच उठता ही रहेगा कि बीते 27 वर्षों में आखिर इलाहाबाद की मिट्टी से जुड़े प्रसारण माध्यम दूरदर्शन को अलग क्यों रखा गया।

सच तो यह है कि इलाहाबाद की पीढियां आज हाईटेक होकर कहीं आगे बढ़ रही है, तो अब उम्मीदों की नई खेप प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसारण को अविलम्ब जोड़कर आगे बढ़ायी जा सकती है। जो निश्चित ही इलाहाबाद वासियों की पहचान और संस्कारधानी की अनूठी व्यवस्था से जुड़ सकेगी। देखिये क्या होता है...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

(आज यहीं तक अगले अंक में फिर भेंट होगी किसी खास ‘अनकही-अनसुनी’ कहानी के साथ)

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