अनकही-अनसुनीः जब लखनऊ में एक पल में बदल गया था सब कुछ

  • Sonu
  • Saturday | 19th August, 2017
  • politics
संक्षेप:

  • ऐसा क्या हुआ कि झटके से बदल गई नारायण दत्त तिवारी की जिंदगी
  • राजीव गांधी को क्यों आया इतना गुस्सा कि खुद जहाज उड़ा कर चले गए
  • राजीव गांधी की मौत, नारायण दत्त तिवारी की दावेदारी और नरसिम्हा राव

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः इक्कीस मई से ही गहमागहमी शुरू हो गयी थी। उस दिन शाम को पूर्व प्रधान मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी बम धमाके में चेन्नई के पास मारे गये थे। 1991 के लोकसभा चुनाव का पहला चरण एक दिन पहले ही ख़त्म हुआ था। राजीव गांधी का अचानक चला जाना सबको स्तब्ध कर गया था। पूरे देश में मौत का सन्नाटा फ़ैल गया था।

दो दिन पहले ही राजीव गांधी लखनऊ आये थे। शहर में उनकी दो रैलीयां हुई थी। दोनों ही ख़राब गयी थी। कांग्रेस के प्रति वोटरों का उत्साह बहुत कम दिख रहा था। बेगम हज़रत महल पार्क और चौक में हुई रैली से राजीव गांधी बहुत गुस्से में थे। वो पूर्वांचल का दौरा कर के आ रहे थे वहां पर भी हाल ऐसा ही था। रैली ख़त्म कर के राजीव गांधी लखनऊ एअरपोर्ट पर पहुंचे और उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को जमकर फटकारा था। उन्होंने साफ़ कह दिया था कि प्रदेश में पार्टी मेहनत नहीं कर रही है, बस उम्मीद कर रही है की ‘कुछ’ हो जायेगा और वो जीत कर सत्ता में आ जायेगी।

उस रात राजीव गांधी खुद प्लेन पायलट कर रहे थे। गुस्से में जब वो हवाई जहाज़ की सीड़िया चढ़ रहे थे तो मैंने और साथी पत्रकार शरद प्रधान ने उनको पुकारा। उन्होंने आवाज़ पहचान ली और प्लेन से उतर आये।

“व्हाई आर यू एंग्री ? एवरीथिंग विल बी फाइन,” हाथ मिलाते हुए हमने मुस्करा के कहा।

“नथिंग विल बी फाइन इफ दिज्ज गईज वर्क लाइक दिस। कुछ नहीं कर रहे है यह लोग। मिरेकल (चमत्कार) होगा क्या ?

“यूपी में कही-कही कांग्रेस कमजोर है...” शरद प्रधान ने कहा।

“नहीं, बहुत जगह कमजोर है। राजीव ने तपाक से उनको काट दिया। “वोटिंग के अगले फेज के लिये हमे बड़ी मेहनत करनी होगी। आई ऍम गोइंग टू साउथ नाऊ, वी विल डू बेटर देयर। वी विल फॉर्म द गवर्नमेंट। इन थ्री वीक्स आई विल बी बैक (एज प्राइम मिनिस्टर)...” राजीव गांधी ने कॉफिडेंट स्माइल दी और प्लेन पर चढ़ गए। कॉकपिट में बैठते ही उन्होंने हाथ हिला कर बाय किया और उड़ गये हमारे असमान से हमेशा के लिये। दो दिन बाद मई 21 को वो शहीद हो गये। एक पल में ही सब कुछ बदल गया था।     

पर चुनाव प्रक्रिया तो शुरू हो चुकी थी। चुनाव का दूसरा चरण उनकी मौत के बाईसवें दिन, जून 12 और तीसरा जून 15 को हुआ था। इन दोनों चरणों में सिमपैथी वेव चली और कांग्रेस को उसका फ़ायदा हुआ था। वोटिंग ख़त्म होते ही साफ़ हो गया था कि कांग्रेस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनेगी और कुछ जोड़-तोड़ से सरकार बनाने में सफल होगी।

राजीव गांधी के बाद कौन को ले कर कांग्रेस में गहमागहमी शुरू हो गयी थी। तीसरे चरण हने तक कांग्रेसी नेता नए नेता के मुद्दे पर पूरी तरह से संजीदा हो गये थे। राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने कमान सभालने से इंकार कर दिया था। अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, शरद पवार के नाम खूब चल रहे थे। उधर पूर्व विदेश मंत्री पीवी नरसिम्हा राव, जो राजीव गांधी का विश्वास खो चुके थे, दिल्ली में अपना समान बांधने में लगे थे। दोपहर जब मैं उनसे मिलने गया तो वो घर की पैकिंग प्रक्रिया लगभग पूरी कर के कॉफ़ी पीने बैठ रहे थे। हैदराबाद जा कर बसना चाहते थे। अन्य दावेदारों के चलते उनको कोई उम्मीद नहीं थी। पर एक पल में ही सब कुछ बदलने वाला था।

1989 से ही नारायण दत्त तिवारी का नाम कांग्रेस के वैकल्पिक नेता के रूप में चल रहा था। राजीव गांधी को शक था कि तिवारी और विश्वनाथ प्रताप सिंह में साठ गाठ हो गयी है और वो उनका तख्ता पलट देंगे। इसी वजह से 1989 में उन्होंने समय से पहले लोक सभा भंग करा कर चुनाव करवाए थे जिसमें पहले सिंह की और फिर चन्द्र शेखर की अल्प कालीन सरकारे बनी थी।

राजीव गांधी की मौत के बाद नारायण दत्त तिवारी का नाम फिर चल निकला था। नैनीताल लोक सभा क्षेत्र से वो चुनाव भी लड़ रहे थे। तिवारी जी भरी जोश में थे। देश भर से कांग्रेसी नेता उनको फ़ोन कर के या फिर व्यक्तिगत रूप से दिल्ली और लखनऊ में मिल कर अपना समर्थन दे रहे थे। सब कुछ सेट था।

चुनाव परिणाम की सुबह से ही तिवारी जी के लखनऊ में मॉल एवेनु वाले बंगले में भारी भीड़ जुटने लगी थी। लोग फूल की मालाए, मिठाई और बैनर ले कर उनके घर पहुंच रहे थे। देश का प्रधानमंत्री कैसा हो, नारायण दत्त तिवारी जैसा हो के नारे पूरे जोर शोर से गूंज रहे थे। भीड़ को काटते हुए मैं किसी तरह से तिवारी जी के पीए के ऑफिस तक पहुंच गया था। उन्होंने मुझे और साथी पत्रकार सुनीता ऐरन को इशारा किया और हम पीछे हट गये। दो मिनट बाद, पीए आये और बोले “तिवारी जी ने आपको अंदर बुलाया हैं। अकेले बैठे टेलीविज़न देख रहे हैं। चलिए पीछे से चलते है।”

तिवारी जी बड़े शांत भाव से टेलीविज़न देख रहे थे। देख कर मुस्कराये। “रिजल्ट का दिन आ ही गया भटनागर जी! देखते है क्या लिखा है आगे ?” हम बैठ गये और स्क्रीन पर कांग्रेस की बढ़त देखने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने इंटरकॉम पर अपने स्टाफ को नैनीताल के जिलाधिकारी को फ़ोन लगाने को कहा। लगभग उसी समय टेलीविज़न पर कैप्शन आया। नैनीताल से नारायण दत्त तिवारी चुनाव जीते।

खबर बाहर भी फ़ैल गयी और समर्थक अपना आपा खोने पर आमादा होने लगे। जय जयकार बाहर सड़क से उठता हुआ, लॉन और घर को लपेटता हुआ, कमरे में घुसने के लिये खिड़की दरवाजों पर सर पटकने लगा था। हमारे सामने चाय की ट्रे आ चुकी थी। तिवारी जी ने उसको अपनी तरफ खीचा और चाय बनाने लगे। एक प्याला उन्होंने हमारी तरफ बढाया और दूसरा खुद उठाया ही था की फ़ोन बजा।

नारायण दत्त तिवारी फ़ोन सुन रहे थे और उनका चेहरा सफ़ेद होता जा रहा था। सिर्फ “अच्छा” कहा और फ़ोन रख दिया। एक पल में सब कुछ बदल गया था। वो अपने घर यानी नैनीताल से ही चुनाव हार गये थे। हम लोग सन्न रह गये। तिवारीजी ने मेहनत कर के अपनी चाय उठाई। उनके हाथ काप रहे थे। प्याला और प्लेट आपस में बज रहे थे। तिवारी जी प्याले को अपने होटो तक ले गये, हल्का सा मुस्कराये और फिर बोले “’मेनी आ स्लिप बिटवीन द कप एंड द लिप’।”

टेलीविज़न पर भी नई खबर चलने लगी थी। नारायण दत्त तिवारी नैनीताल से चुनाव हार गये हैं। इक्कीस जून को नरसिम्हा राव ने भारत के नए प्रधानमंत्री ने शपथ ली थी। नारायण दत्त तिवारी की हार ने एक पल में उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया था।

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