अनकही-अनसुनीः लखनऊ की शान रूमी दरवाज़े की दास्तान

  • Sonu
  • Saturday | 23rd September, 2017
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संक्षेप:

  • खूबसूरत बनावट के लिए फेमस है रूमी दरवाज़ा
  • रूमी दरवाजे को तुर्की दरवाजा भी कहते है
  • इसे बनाने में लगे दो साल का समय

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः रोम, पेरिस, लंदन और इस्तांबुल से भी अगर कोई ख़ूबसूरत नज़ारा है तो वो है लखनऊ में रूमी दरवाज़े से दाखिल हो कर छत्तर मंज़िल तक का इलाका। मैंने इससे सुन्दर किसी भी शहर को नहीं देखा है।

1858 में टाइम्स लंदन के पत्रकार डब्लू एच रसल्ल ने यह शब्द लिखे थे। 1857 की आज़ादी की पहली लड़ाई को कवर करने रसल्ल लंदन से हिंदुस्तान आये थे और अंग्रेजी फ़ौज के साथ लखनऊ में दाखिल हुए थे। रसल्ल तुड़िया घाट की तरफ से आये थे जहां पर लखनऊ शहर का मुख्य प्रवेश द्वार रूमी दरवाज़ा अपनी पूरी बुलंदी से कायम था। 

रूमी दरवाज़ा लखनऊ की पहचान है। वो उसका लोगो है, उसके वजूद की सबसे खूबसूरत निशानी। इस दरवाज़े की शायद कोई और मिसाल नहीं है और उसका होना यह साबित करता है कि दूरदराज होने के बावजूद लखनऊ के निर्माता ईरान, तुरान और यूरोप के तमाम उन डिजाईन से परिचित थे जिनपे वहां काम करने की कोशिश तो हुई पर उन पर सफलता लखनऊ में मिली थी।

रूमी दरवाज़ा नवाब आसफ उद दौला ने 1784 में बनवाया था। वे 1775 में 26 साल की उम्र में अपने पिता शुजा उद दौला की मौत के बाद फैज़ाबाद में गद्दीनशीन हुए थे। अवध के नवाब बनते ही उन्होंने अपने राज्य की राजधानी फैज़ाबाद से लखनऊ शिफ्ट कर दी थी।

लखनऊ आ कर आसफ उद दौला ने निर्माण का काम व्यापक तौर पर शुरू किया था। वास्तव में वो नवाबी लखनऊ के संस्थापक थे जिन्होंने शहर के दामन में वो सलमे सितारे जड़े थे जिनपर हमे आज भी नाज़ है।

नवाब साहब ने सबसे पहले लखनऊ को एक नायाब प्रवेश द्वार देने की ठानी। इस्तानबुल में बाब ए हुमायूं हुआ करता था। इस तुर्की प्रभाव को उन्होंने मुग़ल और अवधी स्टाइल से जोड़ा और रूमी दरवाज़े का निर्माण कराया था। 

रूमी दरवाजे को तुर्की दरवाजा भी कहते है। मजे की बात यह है कि इसका नाम इटली के रोम शहर पर रूमी पड़ा था जबकि इसकी वास्तुकला पूरी तरह से तुर्की स्टाइल से प्रभावित है।

रूमी दरवाजे की ऊंचाई  60 फ़ीट है। इतने ऊंचे दरवाजे भारत में बहुत थोड़े से है। दरवाजे के ऊपर एक बेहतरीन नक्काशी वाली छतरी बनी हुई है जिस तक एक सीढ़ी से पहुंचा जा सकता है। दरवाजे के शिखर पर एक बहुत बड़ा लालटैन रखा जाता था जोकि शाम होते ही रोशन कर दिया जाता था। इसकी रौशनी दूर से ही दिखाई पड़ जाती थी। यह वही काम करता था जो की आज कल के नीयन साइन करते है। 

दरवाजे के आर्च के साथ खूबसूरती से तराशे हुए फूलों के गुछे है जिन में से फवारे छूटते थे। कुलमिलाकर रूमी दरवाजा अपने दिनों में रूमानी और रूहानी तौर से बेमिसाल था और आज भी है।

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