अनकही-अनसुनी: डंडा करना, फबती कसना लखनऊ ने शुरू किया था

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  • Saturday | 10th February, 2018
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संक्षेप:

लखनऊ की नज़ाकत और नफासत की कहानी

यहां लोगों ने फबती, तुकबंदी की नयी विधायें विकसित की

ग़ज़ल से आगे बनायीं थी हजल

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः आज से चालीस-पचास साल पहले कहा जाता था कि लखनऊ के तांगे और रिक्शा वाले भी जो ज़ुबान बोलते है उसको सुनकर बाहर से आने वालों को लगता है जैसे कांनों में शहद घुल रहा है। इनकी जुबान में भी नफासत ऐसी थी कि कायल हुए बिना नहीं रहा जा सकता था। अक्सर पूछा जाता था कि क्या लखनऊ का हर बाशिंदा शायर है?

हर बाशिंदा शायर तो नहीं था पर उसमें उर्दू अदब और तहज़ीब ऐसी घर कर गयी थी क़ि उसके बोलने चलने और उठने-बैठने का तौर तरीका नजाकत, नफासत और एहतिराम से लबालब था। वो नाज़ुक मिजाज था और सलीकेदार भी था। उसका मानना था कि जुबान ही सलीके की पहली ड्योढ़ी है और अगर आप उसको लांघ नहीं पाये तो अदब दार कहलाने लायक आप नहीं है।

लखनवी अदब उनीसवीं शताब्दी के शुरुवात में ही अपने रंग में आ गया था और जल्दी ही अपने पूरे शबाब पर था। उसका असर नवाबों और रईसों से शुरू हो कर अनपढ़ और गरीब-गुर्बो तक जाता था। वास्तव में, लखनऊ के अलावा दुनिया में शायद ही कोई शहर ऐसा हो जहां उस्तादों ने कायदे और जुबान के लिए जो किया वो किया पर रिक्शे-तांगे वालों और गली-कूचों में रहने वालों ने भी साहित्य की दर्जन भर नयी विधाये गढ़ी थी। यह एक ऐसी कामयाबी थी जो आज भी बेमिसाल है। लखनऊ का ही कमाल था कि नवाबी काल में उसने अदब-कायदे को किताबी दायरे से निकाल कर अपनी शख्सियत में ही नहीं बल्कि अपनी रूह में भी उतार लिया था।

उनीसवीं शताब्दी शुरू होते ही लखनऊ साहित्यिक घराने की नींव मजबूत होने लगी थी। दिल्ली में मुग़ल सल्तनत के हाल खस्ता हो चुके थे जिसकी वजह से अदबी बाशिंदों ने अवध की तरफ कूच कर दिया था। अवध के नवाब बुलंद हो रहे थे और साथ ही उनका कला और संस्कृति से लगाव भी था। आसफ उद दौला, ग़ाज़ी उद् दीन हैदर, नसीर उद् दीन हैदर और वाजिद अली शाह जैसे नवाब रोशन ख्याल और तरक्की पसंद नवाब थे। वाजिद अली शाह के दरबार में ही सात सौ से ज्यादा वजीफदार लेखक और शायर थे।

नवाबी दौर के चलते लखनऊ का माहौल और मिज़ाज़ शायराना हो गया था। एक तरफ मुहर्रम के दिनों में मजलिसे लगती थी जिसमें मर्सिया पढ़ा जाता था, जो खुद में लखनऊ की ख़ास सौगात है, तो दूसरी तरफ हर मौके पर महफिले सजा करती थी जिसमें कोई भी अपना कलाम पढ़ सकता था और शहरों में महफिले रईसों के यहां अमूमन होती थी पर लखनऊ में कोठों से ले कर सराय तक में होती थी। मुशायरा किसी भी मेले या जमावड़े में होना ज़रूरी सा हो गया था। आम लोग सारी रात वहां जमे रहते थे।

लखनऊ के कोठे तो जैसे उर्दू अदब के क्लब हो गए थे। हर तपके का आदमी वहां ग़ज़ल, हजल, नज़्म, नग्मे, रेख्ता-रेख्ती सुनने या सुनाने जाता था। कई तवायफें ऐसी थी जो खुद माहिर शायर या नगमा निगार थी और उन्होंने दीवान तक लिखे थे। एक तरह से हर तबके के लोगों ने उर्दू अदब और कायदे को अपनी ज़िंदगी में पूरी तरह से अपना लिया था और हर रिक्शे-तांगे वाला भी उतना ही ज़हीन बनाने की कोशिश करता था जितना कि कोई अदबी उस्ताद या राईस जादा करता था। अदब के मामले में आम और खास में कोई फर्क नहीं रहा था।

फ़र्क़ न होने की सबसे बड़ी मिसाल आम लोगों के बीच से नयी विधाओं का निकलना था। उस्तादों ने अगर लखनऊ को उर्दू-फ़ारसी का कड़ा कायदा और मर्सिया और मसनवी जैसी विधायें दी थी तो आम लोगों ने फबती, तुकबंदी की नयी विधायें विकसित की थी।

दो और विधायें जो उभरी थी उनमें एक ख्याल था तो दुसरे को डंडा कहते थे। ख्याल में लोग एक घेरे में बैठ जाते थे और किसी भी मुद्दे पर फ़ौरन शायरी रचते थे।

डंडा विधा में किसी शख्सियत या घटना पर खुल कर लिखा जाता था। दुसरे शब्दों में डंडे में अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रा थी। इसको किसी की खिल्ली उड़ाने या फिर मुंह बुराई करने के काम में लाया जाता था। जो डंडा लिखते थे उन्हें डंडा वाला कहा जाता था। किसी के डंडा करना या डंडा दे दो जैसे मुहावरे इस विधा से उपजे है।

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