अनकही-अनसुनीः लखनऊ की काकोरी जिसमें हुआ था सनसनीखेज कांड

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  • Saturday | 30th December, 2017
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संक्षेप:

  • पंडित पठान की अनोखी जोड़ी ने दिया अंजाम
  • भाई-चारे और जुनून की अद्भुत मिसाल काकोरी कांड
  • काकोरी कबाब लखनऊ की जान तो चिकनकारी शान

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः दिल्ली से आते समय लखनऊ की पहली आहट काकोरी से होती है। काकोरी पहुंच गये तो समझिये आप लखनऊ पहुंच गये है। काकोरी क़स्बा लखनऊ से सिर्फ बीस मील है, पर उसकी छाप शहर पर ऐसी है कि उसका नाम लिये बगैर लखनऊ पूरा नहीं हो सकता है। काकोरी कबाब लखनऊ की जान है और चिकनकारी का काम उसकी शान है। असल में चिकन का बहुत सारा काम काकोरी में ही होता है और बीते समय में यहां के बेहतरीन कारीगरों ने नवाबों और रईसों के जामों को अपने हुनर की शान बक्शी थी।

पर इतिहास में, खासकर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, काकोरी का विशेष स्थान है। नौ अगस्त 1925 को आज़ादी के मतवालों ने 8 डाउन सहारनपुर–लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को लूट लिया था। मतवालों की इस टोली के नायक थे पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान। इनके साथ थे राजेंद्र लहरी, सचिंद्र नाथ बख्शी, चन्द्र शेखर आजाद, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल और मुरारी लाल। अंग्रेज हुकूमत इस सनसनीखेज कारनामे से इतनी हिल गयी थी कि उसने स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस से इसकी जांच करवाई थी। एक महीने में ही सभी क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गये थे और उन पर जो मुकदमा चला था उसको काकोरी कांस्पीरेसी केस के नाम से जाना गया है। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लहरी और ठाकुर रोशन सिंह को मौत की सजा सुनाई गयी थी जबकि बाकी को कारावास में डाल दिया गया था। पंडित और खान को एक ही दिन, एक ही वक़्त पर, दिसम्बर 19, 1927 को अलग-अलग जेलों में फांसी दी गयी थी।

काकोरी कांड भाई-चारे और देश के लिये जुनून की अद्भुत मिसाल है। बिस्मिल पंडित आर्य समाजी थे, राष्ट्रवादी और हिंदु धर्म की भव्यता के अथक प्रतिपादक थे। उनके जिगरी दोस्त अशफाक उल्ला खान पठान थे, नमाज़ी, राष्ट्रवादी, पक्के मुसलमान थे। पर इन दो सीने में एक ही दिल धड़कता था। फांसी से पहले अशफाक उल्लाह ने लिखा था: 

“जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा, जाने किस दिन हिंदुस्तान आज़ाद वतन कहलाएगा”?

बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं "फिर आऊंगा, फिर आऊंगा, फिर आकर के ऐ भारत मां तुझको आज़ाद कराऊंगा”।

जी करता है मैं भी कह दूं पर मजहब से बंध जाता हूं, मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूं।

हां खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूंगा और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही मांग लूंगा”।     

उधर फंदे को चूमने से कुछ दिन पहले बिस्मिल ने अपनी मां को यह ख़त लिखा था:

“इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक तृष्णा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किन्तु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु का दुःख-सम्वाद सुनाया जायेगा। मां! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता, ‘भारत माता’ की सेवा में अपने जीवन को बलि-वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कुक्ष को कलंकित न किया, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जायेगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्जवल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जायेगा। गुरु गोविन्द सिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु का सम्वाद सुना था, तो बहुत हर्षित हुई थी और गुरु के नाम पर धर्म रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बांटी थी। जन्मदात्री! वर दो कि अन्तिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूं”।

शहीद होने से एक दिन पहले राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने एक मित्र को लिखा था:

"19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूं।

आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है।"

यदि देश के हित में मरना पड़े, मुझको सहस्रो बार भी।

तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी।।

हे ईश! भारतवर्ष में, शतवार मेरा जन्म हो।

कारण सदा ही मृत्यु का, देशीय कारक कर्म हो।।

मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से।

होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से।।

उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का।

तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लव लेश का।।

सब से मेरा नमस्कार कहिए,

तुम्हारा

बिस्मिल"

बिस्मिल और असफाक उल्ला लखनऊ ने नहीं बल्कि शाहजहांपुर के थे पर उनकी आज़ादी के लिए मतवालापन काकोरी में परवान चढ़ा था। ट्रेन की पटरी से लगा हुआ काकोरी समारक जिसको 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्र को सम्पर्पित किया था। इस बात को याद दिलाता है कि राष्ट्रवाद और स्वभूमि पर निछावर हो जाने की आग पंडित और पठान में बराबर से लगी हुई थी। काकोरी को आज फिर याद करना इसीलिये बहुत ज़रूरी है।

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