अनकही-अनसुनीः लखनऊ के “मजाज़” का मिज़ाज कुछ किस्से, कुछ ख्वाब

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  • Saturday | 20th January, 2018
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संक्षेप:

  • जावेद अख्तर के मामा और लखनऊ के मजाज़ की कहानी
  • 44 साल की उम्र में जीता था उर्दू के ‘जॉन कीट्स’ का ख़िताब
  • जानिए लोगों ने क्यूं कहा- मजाज़ शराब नहीं, शराब मजाज़ को पी रही है

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः पहले लखनऊ के बारे में इन लफ्ज़ों पर गौर फरमाइये:

फिरदौसे हुस्नो-इश्क है दामाने लखनऊ

आंखों में बस रहे हैं गजालाने लखनऊ

एक जौबहारे नाज को ताके है फिर निगाह

वह नौबहारे नाज कि है जाने लखनऊ।

और फिर इन पर:

अब इसके बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़’।

हम पर है ख़त्म शामे ग़रीबाने लखनऊ।

असरारुल हक़ उर्फ़ मजाज लखनवी ने ये दोनों ही शेर कहे थे और इन दोनों के बीच ही सिमटी थी मजाज़ की जिंदगी। एक मजाज़ का मिज़ाज तब बयां करता है जब वो अपनी बुलंदी पर थे और दूसरा जब वो अपने हालात से हार चुके थे। पर इन हालात से परे, मजाज़ लखनऊ के ऐसे तरक्की पसंद तहरीक और इंक़लाबी अज़ीम शायर थे जिन्होंने महज 44 साल की उम्र में उर्दू के जॉन कीट्स’ का ख़िताब हासिल कर लिया था। वास्तव में, उनके पास एहसास-ए-इश्क को जुबान देने का बेहतरीन लहजा़ था। इन लफ्ज़ों पर गौर फरमाइये:

बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा

हाँ मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़ियादा

रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे

होना है अभी मुझ को ख़राब और ज़ियादा

आवारा ओ मजनूँ ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ

मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़ियादा

उट्ठेंगे अभी और भी तूफ़ाँ मिरे दिल से

देखूँगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़ियादा

टपकेगा लहू और मिरे दीदा-ए-तर से

धड़केगा दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा

होगी मिरी बातों से उन्हें और भी हैरत

आएगा उन्हें मुझ से हिजाब और ज़ियादा

उसे मुतरिब-ए-बेबाक कोई और भी नग़्मा

ऐ साक़ी-ए-फ़य्याज़ शराब और ज़ियादा

या फिर बंबई की सड़कों पर घूमते हुए मजाज़ का यह ज़बर्दस्त ख्याल (जो बाद में फ़िल्मी गाना भी बना:

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ

जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ

ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी

रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी

मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल

जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल

आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

साथ ही क्रांति के स्वर मज़ाज़ में भी पूरी तरह से समाये थे। उन्होंने आवाहन किया था:

बोल! अरी, ओ धरती बोल!

राज सिंहासन डांवाडोल!

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी

कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेज़ारी

कब तक सरमाए के धंधे, कब तक यह सरमायादारी

बोल! अरी, ओ धरती बोल!

राज सिंहासन डांवाडोल!

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम

धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मजबूर नहीं हम

मंज़िल अपने पांव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम

बोल! अरी, ओ धरती बोल!

राज सिंहासन डांवाडोल! 

पर मजाज़ की शायरी को समझने से पहले उनके जीवन को समझना होगा। मजाज़ की पैदाइश 19 अक्तूबर, 1911 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रूदौली गांव में हुई थी। उनके वालिद का नाम चौधरी सिराज उल हक था चौधरी सिराज उल हक अपने इलाके में पहले आदमी थे जिन्होंने वकालत की डिग्री हासिल की थी। वे रजिस्ट्री विभाग में सरकारी मुलाजिम थे। उनकी खवाइश थी कि उनका बेटा इन्जीनियर बने और इसीलिये उन्होंने उसका दाखिला में आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में इंटर साइंस में कराया था। पर आगरा में उन्हें फानी, जज्बी, मैकश अकबराबादी जैसे लोगों की सोहबत मिल गयी और उनका रूझान गज़ल लिखने की तरफ हो गया। ‘असरार’ नाम के साथ ‘शहीद’ तख़ल्लुस भी जुड़ गया था। इस दौरान उनमें दार्शनिकता 1929 का पुट भी आया था जो की ताउम्र निखरता ही गया था।

वैसे मजाज़ उर्दू शायरी के मशहूर उस्ताद मुज़्तर खैराबादी और उस्मान हारूनी के वंशज थे, उर्दू अदब उनके खून में था। उनकी बहन की शादी शायर जां निसार अख्तर से हुई थी यानी रिश्ते में वो आज के फ़िल्मी शायर जावेद अख्तर के मामा थे।

1931 में बीए करने वो अलीगढ़ चले गए जहां उनका राब्ता मंटो, इस्मत चुगताई, अली सरदार ज़ाफरी, सिब्ते हसन, जां निसार अख़्तर जैसे नामचीन शायरों से हुआ था। इनकी सोहबत ने मजाज़ के कलाम को और भी कशिश बख्शी थी। यहां पर ही उन्होंने अपना तखल्लुस ‘मजाज़’ अपनाया था। इसके बाद मजाज़ गज़ल की दुनिया में बड़ा सितारा बनकर उभरे और उर्दू अदब के फलक पर छा गये थे।

अलीगढ़ में मजाज़ की आत्मा बसती थी। एक दूसरे के लिए बने थे। हॉस्टल की लड़कियां मजाज़ के गीत गाया करती थीं और उनके साथ अपने सपने बुना करती थीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का तराना उन्हीं का लिखा हुआ है:

सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरगिस हूं, पा बस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूं।

ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं।

हर आन यहां सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।

कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है।

जो ताक़-ए-हरम में रौशन है, वो शम यहां भी जलती है।

इस दत के गोशे-गोशे से, इक जू-ऐ-हयात उबलती है।

मजाज़ की शायरी के दो रंग है- पहले रंग में वे इश्किया गज़लकार नजर आते हैं वहीं दूसरा रंग उनके इन्कलाब़ी शायर होने का मुज़ाहिरा करता है। वे प्रगतिशील लेखक समुदाय से भी जुड़ गये थे और ‘मजदूरों का गीत’ हो या ‘इंकलाब जिंदाबाद’, मजाज़ ने अपनी बात बहुत प्रभावशाली तरीके से कही थी।

इश्क में नाकामी की वजह से मजाज़ ने शराब पीना शुरू कर दिया था। शराब की लत इस कदर बढ़ गयी थी कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मजाज़ शराब को नहीं, शराब मजाज़ को पी रही है। मजाज़ दिल्ली और बम्बई होते हुए आखिरकार लखनऊ आ गये थे। उन्हें लखनऊ बेहद पसंद था पर लखनऊ आकर वे बहुत ज्यादा शराब पीने लगे थे जिससे उनकी हालात लगातार खराब होते गये। उनकी घुटन और अकेलापन ऐसा था कि वे ज्यादातर खामोश रहते थे।

1940 से पहले नर्वस ब्रेकडाउन से लेकर 1952 के तीसरे ब्रेकडाउन तक आते-आते वे शारीरिक रूप से काफी अक्षम हो चुके थे पर लत नहीं गयी थी। पांच दिसम्बर की बेहद सर्द शाम को वो लखनऊ की बेलदारी लेन के एक शराबखाने में पीते-पीते अकेले रह गये थे और रात की ठंड में समां गये थे। मजाज़ के दर्द ने उन्हीं को जकड़ लिया था। 

 

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