अनकही-अनसुनीः नाजुक लखनऊ के करारे पान

  • Sonu
  • Saturday | 12th August, 2017
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संक्षेप:

  • लखनवी पानदानी तहज़ीब बनारसी रवायत से है अलग
  • लखनवी तहज़ीब का अहम हिस्सा है पान
  • नाजुक लखनऊ के पलंग तोड़ पान

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः कभी करौंदे का पान खाया है? मुश्क़ दाने का? या फिर मुरब्बे, पेठे का? वाजिद अली शाह की शाही गिलौरी खायी है? नहीं? तो फिर लखनऊ के अकबरी दरवाजे की तरफ हमकदम हो जाये और शौक पूरा करिए।

वैसे आजकल पान की गिलौरी मुह में दबा कर दिनभर घुमने का चलन तो लगभग न के बराबर है पर शाम को किसी रेस्तरा में खाना खा कर बढ़िया पान खाने की तलब खत्म नहीं हुई है। वास्तव में लखनवी मीठा, सादा या तंबाकू का पान खा कर ही कबाब पराठे का लुफ्त उस मुकाम पर पहुंचता है कि जुबा से उतरता ही नहीं है।

पान का चलन पुराना है। आयुर्वेद में इसका विस्तार से जिक्र है। धन्वन्तरि ऋषि ने सबसे पहले इस पत्ते के गुणों को चूहों पर प्रयोग कर के आयुर्वेद में दर्ज किया था। पावन उत्सवों, यज्ञ, अनुष्ठान आदि में पान-सुपारी का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इनमें एंटी सेप्टिक गुण होते है। कुछ पुराणिक ग्रंथों में श्री कृष्ण का पान प्रेम का जिक्र है।

पर पान को शाही तहजीब से नूरजहां ने जोड़ा था। इतिहासकारों के अनुसार, नूरजहां ने पान बनाने और पेश करने की कला को वो आयाम दिया जिसकी फसल हम आज तक खा रहे है। तिकोनी गिलोरी बनाना, उसको चांदी के बर्क में लपेटना, पानदान वगेहरा उन्हीं की नायब नजाकत ने बक्शा है। लखनऊ में पान खाने का शौक़ मुग़लों की वजह से शुरू हुआ था और नवाबी दौर में अपने चरम पर पहुंचा था। चौक में बास वाली गली में राम आसरे हलवाई ने पान के शौक को मलाई गिलौरी में तब्दील किया था। यह मिठाई उन लोगों के लिये इज़ात की गयी थी जो पान के पत्ते से परहेज़ करते थे पर मीठे पान का मज़ा लेना चाहते थे।       

        

पान खाने का शौक़ लखनऊ में धीरे-धीरे घट गया है। पर अभी दो दशक पहले तक पान लखनवी तहज़ीब का अहम हिस्सा था। पुराने लखनऊ में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसमें ख़ूबसूरत पानदान, नगरदान (जिसमें पान के पत्ते रखे जाते थे) और खासदान (पान पेश करने की तश्तरी) न हो। सुबह से ही तरह-तरह की गिलौरिया बना कर पानदान में रखी जाती थी। ज्यादातर घरों में और दुकानों में फर्श पर ही गद्दे और मसनद लगे होते थे और उन्हीं पर बैठ पर गुफ्तुगू होती थी। इस इंतिज़ाम का सबसे ज़रूरी हिस्सा पानदान था और मेहमान के तशरीफ़ फरमा होते ही पानदान पेश किया जाता था। वाजिब है कि पान और पानदान के साथ उगलदान भी होता था। पान खा कर इधर-उधर थूकना तहज़ीब के खिलाफ था।

लखनवी पानदानी तहज़ीब बनारसी रवायत से एकदम अलग है। हलांकि बनारसी पान का पत्ता लखनऊ में बड़े शौक़ से इस्तेमाल किया जाता है पर लखनवी तौर तरीके एकदम अलग है। लखनऊ में किमाम और उसके साथ लोंग, इलाची का इस्तमाल ज्यादा होता था। यहां खुशबू पर ज्यादा जोर दिया जाता था। मज़े की बात यह है कि हलांकि पान नवाबी तहज़ीब का हिस्सा माना जाता है पर पनवाड़ी ज्यादातर मिश्रा या चौरसिया है।

लखनऊ के हजरतगंज में ही कई पान वाले ऐसे हैं जो अपने हुनर से मशहूर हुए है। कैपिटल सिनेमा के बगल में छोटा सा खोखा है, मेफेयर सिनेमा के पास की दुकान, या फिर आगे चल कर मल्होत्रा पान भंडार और उसके सामने कमलेश पान वाला सभी की अपनी अलग पहचान है जिससे पान के शौक़ीन सालों से जुड़े हुए हैं।

पर लखनऊ में पान की सल्तनत का ताज अजहर भाई की दुकान है। चौक के अकबरी गेट इलाके में यह पुरानी दुकान खैल भाई और बशीर भाई ने 90 साल पहले शुरू की थी। अजहर भाई ने बारह साल की उम्र से यहां पान बनाना शुरू किया था और आज 45 साल से यही कर रहे हैं।

अजहर के यहां जितने तरह के पान मिलते है शायद कही नहीं मिलते होंगे। देसी पत्ता हो, मघई, दिसौरी, महोबा हो या बनारसी सब यहां पर मौजूद है। अजहर अपने पानों में बहुत ही कम मिलने वाली चीजे डालते हैं जैसे खुशबू के लिये मुश्क दाना या फिर तंबाखू की शाही गोली। पान बनाते वक़्त वो देसी कत्था, जहेज़ी डली, देसी इलाची, देसी गुलुकंद डालते है। उनका अनोखा प्रयोग पान में मुरब्बा और करौंदे का है।

अजहर भाई के यहां तरह-तरह के पान मिलते है। पलंग तोड़ पान सबसे मशहूर है। इसके अलावा पिश्ता पान, बादामी पान, जाफरानी पान, सौफिया पान, पेठा पान, आवला पान, बेगम पसंद पान, वाजिद अली शाह की शाही गिल्लौरी, हाजमे का पान, सीने में दर्द का पान, खट्टा मीठा पान, शाही मीठा पान वगैहरा रंगीन तबीयत वालों को इनकी दुकान पर शाम दर शाम खीच लाते है। 

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