अनकही-अनसुनीः लखनऊ की छतर मंजिल की अनूठी कहानी

  • Sonu
  • Saturday | 29th July, 2017
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संक्षेप:

  • अनूठी, ऐतिहासिक इमारत है छतर मंजिल
  • इसकी ख़ासियत उस के ऊपर बनी छत्तरी से है
  • पहले दो छत्तर मंजिल हुआ करती थी

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः हजरतगंज से चौक जाने वाली सड़क पर, क्लार्क्स अवध होटल के ठीक बगल में ख़ूबसूरत और विशाल छत्तर मंजिल यानी सीडीआरआई (सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट) है। इसके सामने से लखनऊ वालों का रोज़ का आना जाना है पर 1951 से आज तक इसमें आम लोगों का प्रवेश निषेध है। 2007 में सीडीआरआई के दफ्तर और लैब शिफ्ट तो हो गये पर नवाबी ज़माने की बिल्डिंग के संगरक्षण पर अभी काम चल रहा है और फिलहाल उसे दूर से ही निहारा जा सकता है। जल्दी ही यहां एक सिटी म्यूजियम होगा जिसमें लखनऊ का इतिहास प्रदर्शित किया जायेगा।

सीडीआरआई ने छत्तर मंजिल का नाम कई स्तर पर रोशन किया है। ड्रग रिसर्च में उसके विज्ञानिकों ने अन्तराष्ट्रीय ख्यति प्राप्त की। डाक्टर नित्या नन्द, एमएम धर, और डाक्टर बीएन धवन उनमें सबसे प्रमुख है। दूसरी तरफ संगीत-नाटक के क्षेत्र में भी यहां के विज्ञानिक आगे रहे हैं। डॉ. अनिल रस्तोगी ने लखनऊ की विशिष्ट नाटक मंडली दर्पण की शुरुआत छत्तर मंजिल से ही की थी और दर्पण के कई सुपर हिट नाटकों का बीज यही बोया गया था। अनिल रस्तोगी ने आगे चल कर कई टेलीविज़न सीरियल और फिल्मे भी की। इशक्जादे और मुक्ति भवन उनकी हाल की फिल्मे है। टेलीविज़न और फिल्म अभिनेता दद्दी पांडे, जिन्होंने दबंग जैसी फिल्मों में काम किया है भी छत्तर मंजिल की उपज है।

गोमती नदी के दाये तट पर बने इस महल के साथ कई और रोचक किस्से भी लखनऊ वालों के जहन में बसे है और यह किस्से अपने ज़माने में खौफनाक थे। एक किस्सा तो भूतों से जुड़ा है। कहा जाता था कि यहां से रेजीडेंसी तक के इलाके में आने जाने वाले लोगों को रात में भूत रोक लेते थे। इन किस्सों के चलते लोगों ने शाम के बाद यहां आना-जाना ही बंद कर दिया था। रेजीडेंसी के पास कई लाशें भी मिली थी जिनके बारे में कहा जाता था कि उनको भूतों ने मारा था। छत्तर मंजिल और रेजीडेंसी का 1857 का खूनी इतिहास इन भूतों की कहानियों को बल देता था। 1974 में पुलिस ने इन किस्सों की व्यापक पड़ताल की और इनको लूट की वारदातों से जोड़ा। इस पड़ताल के बाद भूत गायब हो गये।

दूसरी कहानी भी मौत से जुड़ी है। छत्तर मंजिल के बगल में, क्लार्क्स अवध के पीछे, गोमती तट पर नौरात्र के बाद देवी विसर्जन स्थल हुआ करता था। लगभग हर साल विसर्जन के दौरान, भारी भीड़-भाड़ में मूर्ती विसर्जन के दौरान गहरे पानी में नाव पलट जाती थी और कुछ मौते हो जाती थी।

गर्मी के मौसम में छत्तर मंजिल के सामने वाले तट पर कुछ उस्ताद कैंप लगाते थे जिनमें लड़के स्विमिंग सीखने आते थे। यूनिवर्सिटी छोर से छतर मंजिल तक गोमती नदी को पार करना अपने में एक बड़ा चैलेंज होता था जो लगभग हर साल कोई न कोई उत्साही युवक पूरा करते-करते अपनी जान गवा देता था। छत्तर मंजिल का एक सम्मोहन था जो लोगों को उस तक खीच लेता था। शायद नवाब भी इसी सम्मोहन से गोमती नदी के इस हिस्से पर खीचे चले आये थे।

वास्तव में सबसे पहले 1781 में फ्रेंच साहसी क्लौड मार्टिन ने गोमती के नज़ारे का लुफ्त लेने के लिये कोठी फरहत बक्श बनवाई थी। इसके पश्चात नवाब गाजी उद्दीन हैदर ने इस कोठी को 5000 रुपये में उनसे खरीद लिया और नया निर्माण कार्य 1798 में शुरू किया था। उनकी मौत के बाद इसे उनके उत्‍तराधिकारी नवाब नसीर उद्दीन हैदर ने 1827 में पूरा किया था। इस मंजिल की ख़ासियत उस के ऊपर बनी छत्तरी है जिसकी वजह से इसका नाम छत्तर मंजिल पड़ा था। वैसे दो छत्तर मंजिल हुआ करती थी। बड़ी मंजिल और छोटी मंजिल, पर छोटी मंजिल गद्दर के दौरान नष्ट हो गयी थी।

यह पैलेस पहले अवध के नवाब और उनकी बेगमों का निवास स्‍थान हुआ करता था और बाद में 1857 की क्रांति, भारत की आजादी के प्रथम युद्ध में स्‍वतंत्रता सेनानियों की बैठक का एक केन्‍द्र बिन्‍दु भी बन गया था। इस दिलचस्‍प और अनूठी, ऐतिहासिक इमारत के भूमिगत हिस्‍से को तह़खाना कहा जाता है।

इन तह़खानों को गोमती नदी के पानी में बनाया गया है जिसके कारण यह भंयकर गर्मियों के दौरान भी ठंडे रहते हैं। यह पैलेस कई प्रमुख फोटोग्राफर जैसे- सैमुअल बॉर्न, डारोगाह उब्‍बास अली, फेलिस बीओट और थॉमस रस्‍ट द्वारा की गई इसकी फोटोग्राफी के लिए ही प्रसिद्ध हुए थे।

1857 के बाद अंग्रेजों ने छत्तर मंजिल को अपने कब्जे में ले कर इसमें यूनाइटेड सर्विसेज क्लब खोल दिया था। यह क्लब 1950 तक चला और इसके बाद केंद्र सरकार ने सीडीआरआई को इसे दे दिया था।

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