अनकही-अनसुनीः कभी लखनऊ अहदियों के लिये जाना जाता था

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  • Saturday | 2nd December, 2017
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संक्षेप:

  • बहुत सारी चीजों के लिये मशहूर है लखनऊ
  • इनमें से एक ऐसी भी चीज़ है अहदीपन
  • यानि आराम पसंद होते थे लखनऊ के लोग

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः लखनऊ बहुत सारी चीजों के लिये मशहूर है पर इनमें एक ऐसी भी चीज़ है जिसकी चर्चा कम की जाती है पर वो लखनवी जीवन शैली की नस-नस में बसी हुई है। इस खास चीज़ का खास नाम है अहदीपन। आज की भाषा में अहदी होने का मतलब है आराम पसंद होना, यानि सेस्त। अंग्रेजी में लेजी। लखनऊ अपने अहदियों के लिये जाना जाता था और आज भी ऐसा ही है।

1857 की लड़ाई से पहले की बात है। लखनऊ अपने पूरे शबाब पर था। दिल्ली के हालात इतने खस्ता हो गए थे कि व्यापारी से लेकर शायर तक मुग़लिया तख़्त से हट कर लखनऊ के नवाबों के सामने सलाम बजाने लगे थे। इन्हीं दिनों कुछ लोग लखनऊ आ रहे थे और उनको लगा वो रास्ता भटक गये है। कुछ दूरी पर उन्हें एक बेर की बड़ी झाड़ी के नीचे दो आदमी लेटे हुए दिखायी दिये। लपक कर वो जब रास्ता पूछने के लिये उनके पास गये तो देखा दोनों आंखें बंद किये हुए है और पूरा मुंह खोले हुए है।

यात्री अपना मक़सद भूल कर उनकी इस मुद्रा को देख कर विस्मित हो गए। अनायास ही उनके मुंह से निकल गया, भाई जान, आप लोग मुह खोले ऐसे क्यों लेटे हुए है? अमां दिख नहीं रहा कैसे पके बेर लगे है। खाने आये है। उनमें से एक ने जल्दी से कहा और फिर चौड़ा सा मुह खोल दिया। बेर खाने आये हैं तो हाथ बढ़ा कर तोड़ लीजिये। मुंह खोले लेटे क्यों है?

तोड़ने की ज़हमत कौन करे। हम लोग आराम से लेटे है। जब भूचाल आयेगा, बेर का झाड़ हिलेगा और उम्दा सा पका हुआ बेर हमारे मुंह में गिर जायेगा। अब आप लोग आगे बढ़े, हमें गुलाबी धुप का लुफ्त लेने दें। मुसाफिरों ने एक दूसरे को मुस्करा कर देखा। एक ने कहा, हम लखनऊ पहुंच गये है।

अहदीपन लखनऊ की खास पहचान थी और असली लखनऊ वाला ज़हमत उठाने से आज तक बचता है। उसको हाथ पैर हिलाने से उतना ही परहेज है जितना की औरो को आलस से होता है। वो तभी हिलेगे जब हिलना बेहद ज़रूरी हो या फिर आलसी होने की उनपर संगीन तोहमत लगने वाली हो। अमूमन लखनऊ के बाशिन्दें अपने ही में मस्त कही सुस्त से पड़े मिलेंगे।

कहा जाता है कि जिसने भी गोमती नदी का पानी एक बार पी लिया वो स्लो मोशन हो गया। उसमें ज्यादातर हरकत ज़ुबानी होगी, रूहानी होगी, जिस्मानी नहीं। वास्तव में, लखनऊ वालों को अपने नर्म हाथों पर फक्र होता है। हाथों को नर्म रखने के लिये वो श्रम से फासला बनाये रखते है। इसीमें अपनी शान समझते है।

लखनऊ में 100 साल पहले जब ज़मींदारों की औलादों के लिये जब एक विशिष्ट स्कूल कॉल्विन तालुकदार कॉलेज खोला गया था तो लार्ड कॉल्विन, तब के गवर्नर, ने राईस जादो के हाथों की नरमीअत कम करने के लिये उनके पाठ्यक्रम में कॉलेज के खेतों में हाथ से काम करना अनिवार्य कर दिया था। पर यह कुछ दिन ही चला था। नावाबज़ादों ने कॉलेज ले इस पीरियड में नौकरों को भेजना शुरू कर दिया था। यह परंपरा 1975 में भी थी जब हम जैसे आम परिवार के लड़के वहां पढ़ने जाते थे।

कहा जाता है कि जिसने भी गोमती नदी का पानी एक बार पी लिया वो स्लो मोशन हो गया। उसमें ज्यादातर हरकत ज़ुबानी होगी, रूहानी होगी, जिस्मानी नहीं। वैसे अहदी शब्द के कई अर्थ होते है। एक अर्थ है अहदी वो है जो अपने प्रण पर टिका रहता है, दूसरा अर्थ सिपाही है। अकबर बादशाह के शासन काल में सिपाहियों की एक विशिष्ट टुकड़ी होती थी जिसे अहदी कहते थे। इनको जंग में तभी उतारा जाता था जब कोई बहुत ही असाधारण स्तिथि उत्पन हो जाती थी। अमूमन ऐसी ज़रूरत पड़ती ही नहीं थी और यह अहदी सिपाही बिना मशक़त किये तनख्वाह कमाते थे। साथ ही क्योंकि ये विशिष्ट योद्धा थे इसलिये उनकी सूख सुविधा का विशेष ख्याल रखा जाता था। कुछ काम न करने वाले, काहिल किस्म के व्यक्ति को लखनऊ में अहदी कहा जाने लगा था। 

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