अनकही-अनसुनी लखनऊः यहां भीड़ में भी मिलती है खुशी

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  • Saturday | 28th October, 2017
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संक्षेप:

  • 28000 रुपए में बेचा था अमीनाबाद को
  • लखनऊ वासियों का जहां बसता है दिल
  • महात्मा गांधी का क्या है लखनऊ कनेक्शन

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः मशहूर शायर जोश मलीहाबादी ने लखनऊ के कैसरबाग के बारे में कहा है “आज भी आती है वहां से हाए अख्तर की सदा” तो उससे लगे हुए अमीनाबाद के बारे में कहा जाता है कि “जो आये, न जाये”। यानी एक बार जो अमीनाबाद की माताबदल की दुकान में घुस गया, गाढ़ा भंडार में जिसने झांक लिया या फिर लाल खंबे वाली दूकान पर बैठ गया और साथ ही वहां की चाट-पकोड़ी, खस्ता-कचोरी, कबाब–बिरयानी, कुल्फी का लुफ्त उठा लिया वो फिर अमीनाबाद का हो जायेगा, वहां से नहीं जायेगा।

बाजारों में बाज़ार है अमीनाबाद। बाहर से जब लोग आते हैं तो उसकी तुलना दिल्ली के चांदनी चौक से करते हैं पर यह मिसाल ठीक नहीं है। हा, अमीनाबाद लगभग 165 साल पुराना बाज़ार ज़रूर है और चांदनी चौक की ही तरह आज बहुत भीड़ भाड़ वाला इलाका है जिसमें सुबह से ले कर शाम तक ट्रैफिक जाम लगा रहता है और जिसमें थोक से लेकर फूटकर माल वाजिब दाम पर मिल जाता है। पर अंततः अमीनाबाद की अपने आप में एक नायाब शख्सियत है। भव्य मॉलों और वातानुकूलित शॉपिंग एक्सपीरियंस के ज़माने में भी लखनऊ में कहा जाता है कि टहलने और केजुअल शॉपिंग के लिये मॉल जाइये पर सीरियस शॉपिंग के लिये अमीनाबाद का रुख करिये।

मसर्रत गंज नाम था आज के अमीनाबाद का 19वीं शताब्दी के मध्य तक। कुछ लोग इसको सिकंदराबाद भी कहते थे क्योंकि इसका नाम मुग़ल शाह आलम के बेटे सिकंदर शिकोह के नाम पर पड़ा था। 1772 में मुग़ल बादशाह ने सआदत खान बुरहान उल मुल्क को आगरा और अवध का सुबेदार बनाया था। उनका असली नाम मीर सैय्यद मोहम्मद अमीन था। सिकंदर शिकोह के मरने के बाद उनकी बेगम ने मसर्रत गंज को 28000 रुपए में नवाब इमदाद हुसैन खान अमीनुद्दौला, जो की नवाब वाजिद अली शाह के वजीर थे, को बेच दिया था। कैसरबाग के उस पार हजरतगंज अंग्रेजों का सैर गाह और शॉपिंग प्लाजा के रूप में विकसित हो रहा था और इधर अमीनुद्दौला ने लखनऊ वासियों के लिये अमीनाबाद खड़ा करना शुरू कर दिया था।   

बीसवीं शताब्दी की शुरुवात में ही अमीनाबाद चहल-पहल वाला इलाका हो गया था। दुकानें और रिहाशी इमारतें बन चुकी थी। लखनऊ में रहने के बाद भी हममें से बहुत से लोग है जो नहीं जानते कि अमीनाबाद में आने और जाने के लिये चार दरवाज़े बनाये गये थे जिनमें सबसे बड़ा कलन फाटक था जो की अमीनाबाद के मुख्य चौक पर था। इससे लगी एक मस्जिद थी जिसको कलन फाटक मस्जिद कहा जाता है। पश्चिम की ओर एक इससे छोटा दरवाजा था, मेहरा सिनेमा के पास गुइन रोड पर, जिसे खुर्द गेट कहते थे। यह दरवाजा गिर चुका है पर इसी नाम की मस्जिद अभी भी है। नवाब अमीनुद्दौला ने एक बड़ा बगीचा दुकानों के बीच में बनवाया था जो की ब्रिटिश हुकूमत के 1912 मास्टर प्लान के तहत आ गया था और उसके चारों ओर सड़क बन गयी थी। इस बगीचे को अमीनुद्दौला पार्क या आज का झंडेवाला पार्क कहते है।

अमीनाबाद में ऐतिहासिक इमारतों में पार्क के पास इमामबाड़ा सिकंदर शिकोह की बारादरी, वज़ीर मंजिल और गूंगे नवाब पार्क है जो की मुमताज़ डिग्री कॉलेज के सामने है और प्रताप मार्किट के बगल में है। शाही कोठी, जो अमीनुद्दौला के ज़माने की है, जिसका उपयोग 1864 में कैनिंग कॉलेज स्थापित करने के लिये किया गया था। यह  बाद में लखनऊ यूनिवर्सिटी में तब्दील हो गया था।

वैसे 1905 में गवर्नर जेडी लाटूश अमीनाबाद आये थे और उन्होंने इसके पुनः निर्माण का काम शुरू किया था। नए अमीनाबाद का उद्घाटन उन्होंने 1911 में किया था। लाटूश रोड उन्हीं के नाम पर है।     

अमीनाबाद लखनऊ का दिल था और है। अमीनाबाद ही वो केंद्र था जिससे आज़ादी की लड़ाई में महतवपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1928 में तिरंगा पहली बार यही पर लहराया गया था और महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सत्याग्रह का ऐलान किया था। जवाहरलाल नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस ने यहां जन सभाए की थी। जवाहरलाल नेहरु के सभा पर पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया था जिसमें नेहरु को भी चोट आई थी। गुलाब सिंह लोधी ने पेड़ पर चढ़ कर तिरंगा लहराया था पर पुलिस ने उन्हें मार गिराया था। उनकी मूर्ति अभी भी झंडेवाला पार्क में लगी है।                

पार्क के ठीक सामने छेदी लाल धर्मशाला है जहां पर आज़ादी की लड़ाई के नेता ठहरा करते थे। पास ही में अब्दुल्लाह रेस्तरां है जो की मुस्लिम लीग के नेताओं के मिलने की जगह थी। कांग्रेसी नेताओं का पसंदीदा समारोह स्थल गंगा प्रसाद वर्मा मेमोरियल हॉल था। लेखक, कवि और बुद्धिजीवी पार्क के सामने दानिश मंजिल, जो कि सेंट्रल होटल के भूतल पर है, में बैठक किया करते थे। गुलमर्ग होटल एक और अड्डा था। पास ही में सिद्दीक बुक डिपो और अनवर बुक डिपो विशेष आकर्षण का केंद्र थे। बड़े से बड़े रचनाकार अमीनाबाद में अपना नाम रोशन करने के लिये उत्सुक रहते थे।

अमीनाबाद को एक और गौरव प्राप्त है। इस इलाके की गुइन रोड में शहर का पहला कायदे का हेयर कटिंग सलून खुला था। उसका नाम पेरिस सलून था। साथ ही 1930 के अंत में अलीम एंड संस लांड्री भी खुली थी जो कि अपनी तरह की पहली आधुनिक लांड्री थी।

आज अमीनाबाद अपनी भीड़ के लिये जाना जाता है पर उसका लखनऊ वालों के जीवन में महत्व कम नहीं हुआ है। प्रकाश की कुल्फी, नेत राम और कब्र वाली दुकान की कचोरी, अरोरा का अचार, वाहिद की बिरयानी, बर्मा बिस्कुट, जहागीर होटल का रोगन जोश, टुंडे के कबाब, नईम के पान, मक्खन मलाई आदि अमीनाबाद की जुबान का जयका है। वास्तव में अमीनाबाद खरीद दार के हर मर्ज़ की दावा है।

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