अनकही-अनसुनी लखनऊः मार्टिन पुरवा के क्लाउड साहब

  • Sonu
  • Saturday | 16th December, 2017
  • local
संक्षेप:

  • लखनऊ को नवाबी रूप देने में किसका योगदान
  • लॉ मार्टिनियर को क्यों मिला था फौजी मेडल
  • एक छोटे से गांव के जमींदार थे क्लाउड साहब

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः हज़रतगंज से पार्क रोड कॉलोनी पार करते ही बनारसी बाग़ शुरू हो जाता है जिसमें लखनऊ का मशहूर चिड़िया घर है। यही से शुरू होता था मार्टिन पुरवा का छोटा सा गांव जिसके "जमींदार" थे क्लाउड साहब यानी फ़्रांसिसी साहसी और सैनिक क्लाउड मार्टिन। मार्टिन पुरवा मुख्यमंत्री आवास और गोल्फ क्लब से लगा हुआ गोमती की तरफ का इलाका है और आज भी मार्टिन पुरवा के नाम से ही जाना जाता है। मेजर जनरल क्लाउड मार्टिन (1735-1800) की मिल्कियत बनारसी बाग़ से लेकर दिलकुशा तक फैली हुई थी जिसके बीचो-बीच उनका कोठी कॉन्सटैंतिया (Constantia) है। इसी को लॉ मार्टिनियर कॉलेज के नाम से जाना जाता है।

लखनऊ को गढ़ने और उसको उसका विशेष नवाबी रूप देने में मार्टिन साहब का अहम योगदान था। वो मात्र पच्चीस साल (1776 से 1800) के बीच लखनऊ में रहे। आज हम जिसको भी शहर की पहचान मानते है, जैसे आज का राज भवन या फिर छत्तर मंज़िल, वो सब इन्हीं की देन है।

वैसे मार्टिन का लखनऊ से कोई लेना देना नहीं था। वो फ्रांस में लीयोंस में पैदा हुए थे और उनका परिवार स्थानीय स्तर पर व्यापार करता था। मार्टिन को रेशम का व्यापार करने का शौक चर्याया और वो भारत आ गये जहां पर उन्होंने पॉन्डिचेरी में फ़्रांसिसी सेना में भर्ती ले ली। फ्रांस की इस क्षेत्र में हार के बाद मार्टिन अंग्रेज़ों के साथ जुड़ गये और कलकत्ता पहुंच गये। फ़्रांसिसी नागरिक होने के बावजूद वो ब्रिटिश सेना में तरक्की करते गये और मेजर जनरल के पद तक पहुंचे। टीपू सुल्तान के खिलाफ सेरिंगीपात्नम में हुई निर्णायक लड़ाई में मार्टिन ने बड़ी भूमिका निभायी थी।

मार्टिन सिर्फ एक कुशल सैनिक ही नहीं थे बल्कि अपने प्रशासनिक काम के लिए भी जाने जाते थे। अवध के नवाब शुजाउद्द दौला ने उन्हें अवध की देख-रेख के लिये ईस्ट इंडिया कंपनी से मांग लिया और मार्टिन लखनऊ आ गये।

नवाब आसफ-उद-दौला और सआदत अली खान के साथ मिलकर उन्होंने लखनऊ की शान शौकत को नया रंग रूप दिया था। मार्टिन ने गोमती के किनारे अपने लिए छोटी छत्तर मंज़िल बनवाई थी जिसको बाद में नवाब सआदत अली ने खरीद लिया था और उसी स्टाइल में आज की छत्तर मंज़िल का विकास किया था।  

फरहत बख्श कोठी यानी राज भवन भी मार्टिन ने ही डिजाईन किया था और बिबियापुर कोठी, आसफी कोठी भी। उनका वस्तु शिल्प के प्रति अनूठा दृष्टिकोण था जिसमें उन्होंने अवधी, मुग़ल, ब्रिटिश, फ्रेंच और राजपुताना स्टाइल्स का नायाब घालमेल किया था। आगे चल कर लखनऊ के नवाबों ने इस पर और काम किया और शहर के आर्किटेक्चर को उसकी विशिष्ट पहचान दी। वास्तव में लखनऊ में इतनी सारी शैलीयो का प्रयोग हुआ था कि उन्नीसवीं सदी के अंत होते-होते उसके वास्तु शिल्प को बास्टर्ड आर्किटेक्चर कहा जाने लगा था।

मार्टिन की कॉन्सटैंतिया कोठी अपने में विस्मयकारी है। वो फ्रेंच भी है और इंग्लिश भी। पर जगह-जगह उसमें लोकल और रीजनल एलिमेंट्स है। उनके पास पेंटिंग्स का बड़ा संग्रह था। रोचक बात यह है कि ज्यादातर चित्र पक्षियों के थे।

मार्टिन लगभग अशिक्षित थे और इस कमी को पूरा करने में जीवन भर लगे रहे थे। शिक्षा के प्रति उनका समर्पण ही था कि उन्होंने अपनी दौलत स्कूल और कॉलेज खोलने के लिये दान कर दी थी। लखनऊ और कलकत्ता में दो-दो स्कूल और फ्रांस में तीन स्कूल उनके नाम (लॉ मार्टिनियर) के नाम से चलते है और विश्व विख्यात है। सब उनकी मृत्यु के बाद स्थापित हुए थे। लखनऊ का लॉ मार्टिनियर बॉयज स्कूल दुनिया का इकलौता स्कूल है जिसे जंग में लड़ने के लिए फौजी मेडल मिला था। यह उसे 1857 की लड़ाई में विद्यार्थियों द्वारा की गयी बहादुरी के एवज में मिला था। यह किस्सा भी रोचक है पर इस पर चर्चा कभी और करेंगे।

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