लखनऊ अनकही-अनसुनी: बर्मा से मंगाई `टीक की लकड़ी` से बना है एमबी क्लब का बॉलरूम

  • Abhijit
  • Saturday | 17th February, 2018
  • local
संक्षेप:

  • देश के 64 ए-कैटेगरी क्लबों में शामिल लखनऊ के `मोहम्मबाद क्लब` की पूरी दास्तान
  • बर्मा से मंगाई `टीक की लकड़ी` से बना है एमबी क्लब का बॉलरूम
  • नवाबों, ईस्ट इंडिया कंपनी के रेजीडेंसी एजेंटों के हाथों से `एमबी क्लब` के जनता को सुपूर्द होने की कहानी

- अश्विनी भटनागर
लखनऊ में शाम बिताने के लिये अगर कोई शान–बान वाली जगह है तो वो छावनी ने स्थित मोहम्मबाद क्लब है जो एमबी क्लब के नाम से बेहद मशहूर है। यहां का लाउन्ज एरिया हो बार या फिर ताश खेलने के लिये बने कमरे, हर तरफ पुराने बीते हुए ज़माने की खुशबू आज तक पसरी हुयी है। अंग्रेजों के राज का यह बेहतरीन तोहफ़ा है।

1857 के गदर के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता अपने हाथों में ले ली थी। उसने लखनऊ में बड़ी छावनी बनाने के लिये दिलकुशा पैलेस से लगे हुये इलाके का अधिग्रहण कर लिया था। नवाब सआदत अली खां का बनाया हुआ दिलकुशा, 1857 में स्वतंत्रता सेनानियों का बड़ा गढ़ भी रहा था और इसलिये अंग्रेजों ने छावनी भी इसी जगह डालने का फैसला किया था।

इससे पहले कंपनी के एजेंट रेजीडेंसी में रहा करते थें और उनके पास सीमित फ़ौज हुआ करती थी, जोकि रेजीडेंसी के पीछे रहती थी। लखनऊ मध्य के इलाके में बेली गारद और बारूद खाना जैसे मोहल्ले और जगहें आज भी मौजूद है।

छावनी के आते ही ब्रिटिश अफसरों के लिये क्लब की ज़रूरत महसूस की गयी थी। दिलकुशा पैलेस से कुछ पहले मोहम्मद बाग था जोकि एक ज़माने में दिलकुशा का ही हिस्सा था। 1899 में बाग की ज़मीन पर क्लब बन कर तैयार हुआ था और उसको अपनी पुरानी पहचान से ही जाने जाना लगा। मोहम्मद बाग क्लब लिमिटेड के नाम से यह शुरू हुआ था।

1947 तक क्लब सिर्फ फ़ौज के अफसरों के लिये था। आम लोगो का इसमे प्रवेश वर्जित था। आज़ादी के बाद इस की सदस्यता तालुकदार, जमींदार और शहर के नामचीन लोगो के लिये खोल दी गयी थी। उस वक़्त आई.सी .एस और आई .पी एस के अफसरों को सिर्फ टेम्पररी मेम्बरशिप मिलती थी।

1947 में ही पहली बार क्लब की मैनेजिंग कमेटी में तीन भारतीय अफसरों को शामिल किया गया था। उनके नाम लेफ्टिनेंट कर्नल तारा सिंह , लेफ्टिनेंट करना हरकीरत सिंह और कैप्टिन पी जे एस बल थे। समिति के पहले सिविलियन जो 1947 में ही मैनेजिंग कमेटी मेम्बर बने थे वो एस एन दत्त और ए एन झा थे । पर 1951 तक मैनेजिंग कमेटी के अध्यक्ष अंग्रेज़ ही हुआ करते थे। 1951 में लेफ्टिनेंट कर्नल जी आर ओबेरॉय पहले अध्यक्ष बने थे ।

1947 में एम बी क्लब शायद हिंदुस्तान का पहला क्लब बना जिसमे भारत के वाइसराय लार्ड माउंटबैटन और उनकी पत्नी शाम बिताने के लिये आये थे। सत्ता के हस्तारण के बाद वो भारत छोड़ कर जा रहे थे और लखनऊ के इस क्लब में उनकी फेयरवेल विजिट हुयी थी।

क्लब में सबसे शानदार जगह उसका बॉलरूम है जो की बर्मा से मंगायी गयी टीक की लकड़ी से बना है। यहाँ एक छोटा स्टेज ही है जहा बैंड बैठा करता था। डांस अक्सर यहां आयोजित किये जाते थे और नाचने वालो की सुविधा के डांस से पहले फ्रेंच चाक डाली जाती थी जिससे बॉल डांस करते वक़्त वो अपने पैरो को ठीक से फिसला सके।

धीरे-धीरे फ़ौज और सिविल के बीच में साझा रूप से क्लब चलाने का समझोता हो गया। जी. ओ. सी. –इन –सी , सेंट्रल कमांड, लखनऊ क्लब के संग्रक्षक होते है और चेयरमैन शिप चीफ ऑफ़ स्टाफ, सेंट्रल कमांड, और मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार, के बीच सालाना तौर पर बदलती रहती है।

क्लब में रहने के लिए सात बंगले है और पांच ट्रांजिट कॉटेज है। इसके इलावा शादी बयाह के लिये लॉन और हॉल है। देश के 64 ‘ए केटेगरी’ क्लबो से एम. बी. क्लब संबध है। लगभग 2500 क्लब मेम्बेर्स है और कहा जाता है कि मेम्बरशिप पाने के लिये कतार अगले पचास सालो तक लगी हुयी है।

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