मेरठ: दिव्यांग शबाना ने खोला ब्लाइंड स्कूल, फ्री में दे रहीं शिक्षा

  • Pinky
  • Friday | 12th January, 2018
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संक्षेप:

  • 11 साल की उम्र में पोलियो की बीमारी ने बना दिया दिव्यांग
  • कुछ कर दिखाने के जुनून में शबाना ने खोला ब्लाइंड स्कूल
  • करीब 22 बच्चों को दे रहीं मुफ्त में शिक्षा

मेरठ – कहते है कि इच्छा शक्ति मजबूत हो और कोई काम नामुमकिन नहीं होता। इन्हीं पंक्ति को साबित कर दिखाया है मेरठ की दिव्यांग शबाना ने। उन्होंने अपने हौसलों के दम पर दूसरे दिव्यांग बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बिखरने का काम किया है। चुनौतियों से हार न मानने वाली शबाना आज अपना एक स्कूल चला रही है, जिसमें दिव्यांग बच्चों के अलावा गरीब और असहाय बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं।

बचपन में ही शबाना के सिर से पिता का साया उठ गया था। शबाना बताती हैं कि उन्हें 11 महीने की उम्र में ही पोलियो हो गया था। साथ ही, पिता अब्दलु अजीज का भी इंतकाल हो गया। पिता का साया सिर से उठने के बाद ऐसा लगा कि जैसे सब कुछ उजड़ गया हो, मां बिलकुल अकेली हो गई थी। हम सात बहनें थी, उनकी भी चिंता थी।

जिसके बाद, उन्होंने फैसला लिया कि वह खुद अपने आपको साबित कर परिवार का सहारा बनेगी। किसी तरह उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। फिर घर पर ही बच्चों को ट्यूशन देकर परिवार के खर्चा उठाना शुरू किया और अपनी छोटी बहनों को पढ़ाया और साल 2013 में अपना एक छोटा सा स्कूल खोला। शबाना के साथ चार अन्य साथी और हैं, जो शबाना के साथ काम कर रहे हैं।

दिव्यांग होने के बाद भी शबाना खुद को असहाय महसूस नहीं करती हैं। शबाना ने मलाला से प्रेरणा लेकर माधवपुरम में कोशिश ब्लाइंड स्कूल खोला। इसमें कक्षा एक से पांच तक के दिव्यांग और असहाय बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। शबाना ने अपनी पढ़ाई के दौरान स्कूल में होने वाली प्रतियोगिताओं में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया, जिसके चलते शबाना को उत्तर प्रदेश विकलांग एकता परिवार समिति की महिला अध्यक्ष भी चुना गया है।

शबाना ने बताया कि शुरू में लोग उसकी मदद करते थे, इसे देखकर ही उसके मन में प्रेरणा आई कि वह भी असहाय लोगों की मदद करेगी। अब वह अपने आपको को कभी असहाय महसूस नहीं करती हैं। उनके दोनों पैर पोलियो की वजह से खराब थे। वह बिना सहारे के चल नहीं सकती थी। ऐसे में लोग उसे हीन भावना से देखते थे। आज भी हमारे समाज के लिए दिव्यांगों को हीन भावना से ही देखते हैं, जबकि दिव्यांग किसी से कम नहीं होते। समय-समय पर यह उन्होंने साबित करके दिखाया है।

साथ ही बताया कि उनके स्कूल को सरकार से कोई मदद नहीं मिलती है। उन्‍हें और उनके चारों दिव्यांग साथियों को जो पेंशन मिलती है, उसी से स्कूल का खर्च चल रहा है। इस समय स्कूल में 22 बच्चे पढ़ रहे हैं। स्कूल में बच्चों की हर कला को निखारने का प्रयास किया जाता है। शबाना का कहना है कि वह समाज में इस स्कूल के हर बच्चे को बेहतर मुकाम दिलाएंगी।

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