टप्पल का आंदोलन : चार मौतें, नौ साल, लेकिन किसान आज भी बेहाल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और ताजनगरी आगरा को जोड़ने के लिए यमुना पट्टी पर विकसित हुए यमुना एक्सप्रेस वे पर बसे टप्पल क्षेत्र के किसानों की क्रांति गाथा एक इतिहास बन गई है।

करीब नौ बरस पहले यह इलाका देश की राजनीति का केंद्र बन गया था।

14 अगस्त 2010 की शाम गांव जिकरपुर पर चल रहे किसानों के धरने पर हुए बवाल में बंदूकें गरजने पर तीन किसानों और एक पीएसीकर्मी की मौत के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार के मुख्य किरदार राहुल गांधी तक यहां पहुंचे। .ad-600 {width: 600px;text-align: center;} .ad-600 .vigyapan{background:none} विज्ञापन if(typeof is_mobile !='undefined' && !is_mobile()){ googletag.cmd.push(function() { googletag.display('div-gpt-ad-1544182959779-0'); });} विज्ञापन उन्होंने किसानों की मांगों के अनुरूप आजादी काल से पुराने देश के भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का वायदा किया और कानून बदला भी गया।

उस समय विपक्ष में मौजूद भाजपा सरकार ने भी किसानों के समर्थन में खूब आवाज बुलंद की।

मगर यहां के किसानों की आवाज आज तक नक्कारखाने में तूती की मानिंद बनी हुई है।

चार मौतों और नौ साल बीतने के बाद भी किसान लगातार जिकरपुर के उसी स्थान पर धरने पर हैं। उनकी वही मांगें हैं।

जिकरपुर के अंडरपास से लेकर दिल्ली की संसद तक खूब हायतौबा किसान मचा रहे हैं, मगर कोई सुनने वाला नहीं है।

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