कुंभ मेला 2019, जानें नागा साधु से जुड़ी ये खास बातें

संक्षेप:

  • नागा साधु का जीवन आम इंसान से सौ गुना ज्यादा कठिन है
  • मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट त्याग देते हैं
  • अखाड़े के आदेशानुसार यह पैदल भ्रमण भी करते हैं

पुराणों में कुंभ की अनेक कथाएं मिलती हैं। जिनमें तीन कथाओं का विशेष महत्व है। लेकिन इस मेले का सबसे रहस्यमयी रंग होते हैं नागा साधु जिनका संबंध शैव परंपरा की स्थापना से होता है। आपको बता दें नागा बाबाओँ का जीवन आम इंसान से सौ गुना ज्यादा कठिन होता है। नागाओं का अभिवादन मंत्र-ॐ नमो नारायण, नागा साधु शिव के अलावा किसी भगवान को नहीं मानते। उनकी वस्तुऐं त्रिशूल, डमरू, रुद्राक्ष, तलवार, शंख, कुंडल, कमंडल, कड़ा, चिमटा, कमरबंध या कोपीन, चिलम, धुनी के अलावा भभूत आदि होता है।

वहीं नागाओँ का कार्य गुरु की सेवा, आश्रम का कार्य, प्रार्थना, तपस्या और योग क्रियाएं करना होता है। उनकी दिनचर्या कुछ इस प्रकार होती है वह सुबह चार बजे उठ कर नित्य क्रिया व स्नान करने के बाद सबसे पहले श्रृंगार करते हैं। फिर हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया व नौली क्रिया पूरी करते हैं और पूरे दिन में सिर्फ एक बार शाम को भोजन करने के बाद ये फिर सो जाते हैं। वहीं यह नागा साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं। तो कुछ तप के लिए हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में रहते हैं। अखाड़े के आदेशानुसार यह पैदल भ्रमण भी करते हैं। नागाओं को उनकी उपाधियों के आधार पर नाम दिया जाता है जैसे उज्जैन में नागा, हरिद्वार में खूनी नागा तथा नासिक में बर्फानी नागा और खिचडिया नागा कहा जाता है।

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इसी के साथ नागा साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर पद दिए जाते हैं। कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव बता दें बड़ा और महत्वपूर्ण पद सचिव का होता है। नागा साधु 12 वर्ष तक कठिन परीक्षा करते हैं और उन्हें नागा पंथ की जानकारी हासिल करने में छह साल लग जाते हैं। इस दौरान नए सदस्य सिर्फ लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूं ही रहते हैं।

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