इलाहाबाद में बच्चों की जिंदगी को ऐसे संवार रहे हैं इंजीनियर नरेंद्र सिंह

संक्षेप:

  • बच्चों के बदरंग बचपन में रंग भर रहे इंजीनियर नरेंद्र सिंह
  • अपने घर व गाड़ी को बनाया पाठशाला
  • जिस गांव में गए वहीं लग गई दो घंटे की पाठशाला

इलाहाबाद: इलाहाबाद में इंजीनियर नरेंद्र सिंह व उनकी पत्‍‌नी प्रमिला सिंह हजारों बच्चों के बदरंग बचपन में रंग भरने का काम कर रहे हैं। नरेंद्र ने अपने घर व गाड़ी को पाठशाला बना लिया है। उनकी गाड़ी में बोर्ड, मार्कर, पाठ्यसामग्री हर समय रहती है। जिस गांव में गए वहीं लग गई दो घंटे की पाठशाला। बच्चों में देश सेवा का जज्बा भरना व नियमित पढ़ाना उनका शगल है। बिना किसी स्वार्थ व मदद के शिवानी, अंकित, अर्पण, रवी कुमार, सुभाष जैसे हजारों बच्चों की नरेंद्र जिंदगियां संवारने में जुटे हए हैं।

जार्ज टाउन में रहने वाले नरेंद्र बताते हैं कि सन 1985 में उनका चयन इंजीनियरिंग सेवा में हो गया। उनके कई गरीब दोस्त रह गए। इसके बाद अपने दोस्तों को अपने साथ रखकर पढ़ाना शुरू किया। बाद में उनका भी चयन हो गया। दोस्तों के चयन के बाद उन्हें काफी सुकून मिला। बस, यहीं से गांवों के ऐसे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया जो किसी भी कारण से पढ़ाई से वंचित रह गए। चित्रकूट में पोस्टिंग के दौरान नशे के लिए बदनाम पनाड़ी गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शुरू में तो गांव वालों ने विरोध किया पर धीरे धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। जब चित्रकूट से पोस्टिंग इलाहाबाद हुई तो वहां के घर को मेधावी बच्चों को रहने व पढ़ने के लिए सौंप दिया। अब इस घर में एक दर्जन बच्चे रहकर पढ़ते हैं।

हर शनिवार व रविवार को नरेंद्र चित्रकूट जाते हैं और बच्चों को पढ़ाते हैं। इलाहाबाद में रहने के दौरान नैनी रेलवे स्टेशन के पास रोज शाम को पाठशाला लगती है। नरेंद्र के चित्रकूट में न रहने पर सीनियर बच्चे आसपास के गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं। पाठशाला जारी रहती है। गर्मियों की छुट्टियों में इनमें से कुछ बच्चे इलाहाबाद चले आते हैं। पत्‍‌नी प्रमिला सिंह इन बच्चों को रहन-सहन, बोलने, बैठने व संस्कार की बातें सिखाती हैं। गर्मियों के अवकाश में इन बच्चों को एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज की भी शिक्षा दी जाती है। अगले साल दूसरे बच्चों की टीम आती है। यह सिलसिला जारी रहता है।

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चित्रकूट के बनाड़ी की रहने वाली शिवानी कहती है कि मेरे पिता की कैंसर से मौत हो चुकी है। मां किसी तरह खेतों में काम कर गुजर-बसर करती हैं। मेरी मां और मैं जीवन से निराश और हताश हो चुके थे पर नरेंद्र सर व प्रमिला मैम ने हमें जीने का हौसला दिया। देश के लिए कुछ करने का सपना व जज्बा दिया। अब मैं अधिकारी बनकर देश की सेवा करना चाहती हूं।

प्रांशू के पिता शराब के आदी हैं। घर में मां ही काम करती है। आए दिन होने वाली घर में मारपीट व माहौल के बारे में बताते हुए वह भावुक हो जाता है। कहता है कि नरेंद्र सर ने मुझे नया जीवन दिया है। मैं भी बड़ा होकर देश की सेवा करूंगा।

नरेंद्र सिंह का मानना है कि सभी अपने अपने तरीके से देश की सेवा करते हैं पर मेरा मानना है कि यदि हर सक्षम व्यक्ति जीवन में अगर 10 गरीब व मजबूर बच्चों को पढ़ा दे। उनमें जीवन में आगे बढ़ने की ललक पैदा कर दे तो यह सबसे बड़ी देश सेवा होगी। इसी ध्येय के साथ मैं गरीब बच्चों को पढ़ाता हूं। इसमें कई बार बहुत परेशानियां भी आती हैं पर उससे मैं विचलित नहीं होता।

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