आखिर क्यों है इनका नाम रबड़ी वाले बाबा

संक्षेप:

  • रोजाना सुबह 20 लीटर और शाम को 20  लीटर दूध की रबड़ी बनाते हैं
  • बड़ी-सी कढ़ाई में सिर्फ रबड़ी बनाते रहते हैं
  • कम उम्र में सांसारिक सुखों का त्याग कर वे चारधाम की यात्रा का संकल्प लिए उत्तराखंड से निकले थे

कुम्भ मेले में इस बार देश-विदेश से साधु-संत आए हैं, और हर कोई अपने अनोखे अंदाज से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। ऐसे ही हैं श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के अमर गिरी महाराज (नाग बाबा) जो इन दिनों लोगों के बीच `रबड़ी वाले बाबा` (रबड़ी बाबा) नाम से प्रसिद्ध हैं। दिन हो या रात, आंखों पर चश्मा लगाए ये बाबा भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में रबड़ी मेले में आए लोगों में बांट देते हैं। बाबा के मुताबिक, वे रोजाना सुबह 20 लीटर और शाम को 20  लीटर दूध की रबड़ी बनाते हैं। यहां वे बड़ी-सी कढ़ाई में सिर्फ रबड़ी बनाते रहते हैं। रोजाना एक ही काम करते देख लोग इन्हें अब `रबड़ी वाले बाबा`  नाम से बुलाने लगे हैं।

बाबा का कहना है कुंभ में रबड़ी खिलाकर वे लोगों के साथ खुशियां बांटने का काम कर रहे हैं। इसके लिए वे महाकाल को अपना प्रेरणास्रोत बताते हैं। बाबा का दावा है कि इस रबड़ी से असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं। हालांकि, उनकी इस बात में कितना दम है यह तो नहीं पता लेकिन श्रद्धालुओं व देश-विदेश में रबड़ी बाबा प्रसिद्ध हो गए हैं। श्री अमर गिरी महाराज नागा साधु हैं।

कम उम्र में सांसारिक सुखों का त्याग कर वे चारधाम की यात्रा का संकल्प लिए उत्तराखंड से निकले थे। वे खुद को उत्तर गुजरात के सिद्धपुर पाटन स्थित महाकाली बीड़ शक्तिपीठ से बताते हैं। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सबसे बड़े बाबा देव गिरि बाबा अब रबड़ी वाले बाबा के नाम से कुम्भ में धूम मचा रहे हैं और श्री अमर गिरी बाबा (रबड़ी बाबा) के अनुसार वह इस समय महाकाल गये हुए हैं।

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