जानें क्यों सज़ा पूरी होने के बाद भी घर नहीं जाना चाहती महिला क़ैदी

संक्षेप:

  • एक महिला बंदी ऐसी भी हैं, जो केंद्रीय जेल में आजीवन रहकर कंपाउंडर का काम करना चाहती हैं।
  • अपने परिजनों और समाज से नफरत हो गई है।
  • सजा पूरी होने के बाद भी जेल में ही रहना चाहती हैं

अंबिकापुर। जेल से छूटने की छटपटाहट सभी के मन में होती है। लेकिन एक महिला बंदी ऐसी भी हैं, जो केंद्रीय जेल में आजीवन रहकर कंपाउंडर का काम करना चाहती हैं। उसे अपने परिजनों और समाज से नफरत हो गई है। पुस्र्ष प्रधान भारतीय समाज में लड़का अपराध करे तो वह परिजन उसे माफ कर देते हैं लेकिन महिला अगर अपराध कर बैठे तो परिवार, समाज से जुड़े लोगों के साथ आसपास के लोगों का उसके प्रति नज़रिया बदल जाता है।

ऐसी ही एक सजायाफ्ता महिला, जेल में वर्तमान में कंपाउंडर बाई के नाम से जानी जाती है, जो अपने परिजनों के मिलने नहीं आने से खफा होकर सजा पूरी होने के बाद भी जेल में ही रहना चाहती हैं।

अपराध के तह तक पहुंची कुछ महिला बंदी ऐसी हैं, जिन्होंने चार-पांच वर्ष जेल में सजा काटते हुए बीता लिया। लेकिन इनसे मिलने के लिए परिवार का कोई सदस्य नहीं आया। ऐसी महिलाएं जेल को अपना घर मानकर चल रही हैं।

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इनमें कुछ उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं भी हैं। इसके पीछे कारण जेल आने के बाद परिवार के सदस्यों, करीबियों की बेरुख़ी है। बीएससी द्वितीय वर्ष तक शिक्षा हासिल की ऐसी ही एक महिला जेल से छूटने के बाद कहां जाएंगी? इस सवाल से बेचैन हो उठती हैं। सजा अवधि पूरा होने के बाद जेल में मरीजों की सेवा करने की उसकी मंशा है। जेल अस्पताल में बीमार बंदियों के उपचार में सहयोग करते सिलाई, पेंटिंग के अलावा चिकित्सा के क्षेत्र में वह इतनी निपुण हो गई है कि उसे कंपाउंडर बाई के नाम से सभी बंदी ही नहीं,जेल प्रबंधन भी जानता है।
केंद्रीय जेल के अधीक्षक राजेंद्र गायकवाड़ का कहना है कि वर्ष 1998 में 415 बंदी जेल में निस्र्द्ध रहते थे, इनमें महिलाओं की संख्या 15-20 थी। वर्ष 2010-11 में यहां का लॉकअप 13-14 की संख्या का हो गया। 2017 के बाद बंदियों की संख्या 26 सौ तक पहुंच गई।

ऐसे में 2017 के बाद रेट ऑफ क्राइम दोगुना हो गया है। इसी अनुपात में किशोरों द्वारा किए जाने वाले जघन्य अपराधों की संख्या भी बढ़ी है। कंपाउंडर बाई की व्यथा वे समझ सकते हैं। एकाकीपन दूर करने भरसक प्रयास भी होता है।

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