Lok Sabha Election 2019: किशनगंज जहां हिंदू हैं अल्पसंख्यक, 1952 के बाद अभी तक सिर्फ एक बार हिंदू बने सांसद

संक्षेप:

  • बिहार का किशनगंज लोकसभा सीट देश की उन चुनिंदा सीटों में से है जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं
  • 1952 से यहां सिर्फ एक बार ही कोई हिंदू उम्मीदवार चुनाव जीत सका है
  • 2014 में मोदी लहर के बावजूद यहां कमल नहीं खिल पाया था

किशनगंज: बिहार का किशनगंज लोकसभा सीट देश की उन चुनिंदा सीटों में से है जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं. साल 1952 से यहां सिर्फ एक बार ही कोई हिंदू उम्मीदवार चुनाव जीत सका है. लोकसभा चुनाव 2019 के दूसरे चरण में बिहार की 5 सीटों किशनगंज, भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया और बांका में मतदान होना है. ये सभी सीटें सीमांचल इलाके में आती हैं और 2014 में मोदी लहर के बावजूद यहां कमल नहीं खिल पाया था. सिर्फ एक पूर्णिया सीट से ही जेडीयू उम्मीदवार जीता था, हालांकि तब जेडीयू गठबंधन का हिस्सा नहीं थी.

किशनगंज को पूर्वोत्तर का गेटवे कहा जाता है

किशनगंज सीट की करीब 68% आबादी मुस्लिम है जिसके चलते यहां कौन जीतेगा ये मुसलमान ही तय करते हैं. इस सीट पर हिंदुओं की आबादी 31% के आस-पास है. पूर्वोत्तर राज्यों का गेटवे कहे जाने वाले किशनगंज को बिहार का चेरापूंजी भी कहा जाता है. इतिहास पर नज़र डालें तो सूर्यवंशियों का शासन होने के कारण इस इलाके को सुरजापुर भी कहा जाता है. पश्चिम बंगाल से सटा होने के कारण किशनगंज काफी हरा-भरा इलाका है और बिहार के अन्य इलाकों के मुकाबले प्राकृतिक तौर पर खूबसूरत भी माना जाता है.

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1952 से सिर्फ एक बार जीता है यहां से हिंदू उम्मीदवार

किशनगंज के चुनावी इतिहास पर नज़र डालें तो ये सीट 1957 में अस्तित्व में आई और सिर्फ एक बार 1967 के लोकसभा चुनावों में यहां से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP)के हिंदू कैंडिडेट एलएल कपूर ने जीत दर्ज की थी. इसके अलावा यहां हर चुनाव में किसी मुस्लिम कैंडिडेट को ही जीत हासिल होती है. ये सीट हमेशा से कांग्रेस या फिर समाजवादियों की ही रही है. सिर्फ एक बार साल 1999 में यहां से बीजेपी के टिकट पर शाहनवाज़ हुसैन ने जीत दर्ज की है.

किशनगंज सीट का समीकरण

मुस्लिम- 68 प्रतिशत
हिंदू- 31 प्रतिशत

किशनगंज लोकसभा सीट पर 1952 से 16 बार हुए चुनाव में कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी रही जिसने दो बार हैट्रिक लगाई. इसमें साल 1957, 1962 , 1980 और 1984, 1989 में कांग्रेस को हैट्रिक लगाने का मौका मिला. वहीं साल 1991, 1996 में लगातार दो बार जनता दल को जीत का मौका मिला. इस सीट पर कांग्रेस के जमीलुर रहमान, सीमांचल के गांधी मो. तस्लीमुद्दीन को तीन बार सांसद बनने का मौका मिला था. तस्लीमुद्दीन को दो बार राजद और एक बार जनता दल से जीत मिली. वे 1996 में जनता दल और 1998 व 2004 में राजद से सांसद बने थे.

जेडीयू के लिए प्रतिष्ठा का सवाल

यहां इस बार कांग्रेस को जहां सीट बचाने की चुनौती है तो वहीं जदयू काफी मजबूती से मुकाबले में है. इन दोनों के अलावा एमआईएम भी मजबूती से मैदान में है. पिछले चुनाव में इस चुनाव के एमआईएम उम्मीदवार अख्तरुल ईमान ने जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ा था हालांकि लेकिन सिंबल मिलने के बाद वे बीच में ही चुनाव मैदान छोड़ कर हट गए थे. फिर भी उन्हें 55822 वोट मिले थे. जानकारों का मानना है कि इस लोकसभा सीट की जनता का मिजाज अन्य से बिल्कुल अलग है. यहां चुनाव से एक दिन पहले मुस्लिम वोटों की गोलबंदी होती है. जिस तरफ इनका झुकाव हुआ उस प्रत्याशी की जीत होती है. हालांकि इस लोकसभा क्षेत्र में पूर्व में हुए अधिकांश चुनाव में दिल्ली की सत्ता से उलट ही प्रत्याशी को जीत मिली है.

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