इस परिवर्तनशील संसार में कौन नहीं मरता और कौन जन्म नहीं लेता है , परंतु जन्म तो उसी का सार्थक होता है जिसके जन्म से वंश उन्नति को प्राप्त होता है

जमशेदपुर, जासं।भतृहरि की यह उक्ति अक्षरश: स्वामी विवेकाननंद की जीवनी में प्रतिफलित होती है ।

कोल्हान विश्वविद्यालय चाईबासा के कुलपति प्रोफेसर गंगाधर पंडा ने कहा क‍ि रामकृष्ण परमहंस के महनीय व्यक्तित्व नरेंद्र नाथ को अविभूत किया था जिसके फलस्वरूप उनमें गुरु का शक्तिपात हुआ ।

इसके अतिरिक्त उन पर मां भुवनरेश्वरी देवी का भी प्रभाव पड़ा था जिसके कारण वे बचपन से ही रामायण, महाभारत एवं पुराणों के महनीय चरित्रों के संबंध में ज्ञान प्राप्त कर उनके आदर्श से अनुप्राणित हो चुके थे ।

परिवार में भजन- कीर्तन निरंतर चलते रहने के कारण धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण से उनका जीवन संस्कारयुक्त हो गया था और ईश्वर संबंधी जिज्ञासा उन्हें स्थिर होने नहीं देती थी ।

गुरु के शरण में समर्पित जीवन यापन से एवं उनकी कृपा से उनकी समस्त जिज्ञासाएं शांत हो गई।   ये थी स्‍वामी जी की खास चाहत उन्होंने कहा कि भारत के लिए स्वप्न देखने वाले यह साधु ऐसे समाज का गठन करना चाहते थे जिसमें धर्म और जाति के नाम पर कोई भेदभाव न हो ।

अध्यात्मवाद की उन्होंने भौतिकवाद से उपर उठकर व्याख्या की जो केवल मानवतावादी थी ।

युवा पीढियों से उन्हें बहुत उम्मीद थी ।

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