83 खरीदी केंद्रों में 20.04 लाख क्विंटल धान डंप, अब तक नहीं हो सका उठाव, खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ

संक्षेप:

धान उठाव की समस्या से जूझ रहे हैं 83 खरीदी केंद्र, इस साल 4.51 लाख क्विंटल अधिक खरीदी

धान खरीदी केंद्रों में हर बार की तरह इस बार भी परिवहन की बड़ी समस्या है। पिछले साल की अपेक्षा 4.51 लाख क्विंटल धान की अधिक खरीदी हुई है। इसके चलते परिवहन की समस्या पैदा हो गया है। वर्तमान में केंद्रों से धान का उठाव धीमा है।

केवल 7 खरीदी केंद्रों में ही 70 प्रतिशत धान का उठाव हो पाया है। बाकी 83 केंद्रों में धान क्षमता से ज्यादा डंप है, जिसका उठाव नहीं हो पाया है। जिले के पूरे 90 खरीदी केंद्रों में 20.4 लाख क्विंटल धान डंप है, जो खरीदी का 49 प्रतिशत है। इस बार जिले में कुल 91576 किसानों से 40 लाख 72 हजार 544 क्विंटल धान खरीदी हुई है।

धान उठाव के लिए सरकार ने खरीदी के बाद 72 घंटे का समय तय किया है। इस नियम का पालन कभी भी नहीं हो पाया है। इसके पालन को लेकर समितियों से लेकर मार्कफेड गंभीर नहीं है। आशंका है कि हर बार की तरह इस बार भी 10 प्रतिशत से अधिक धान संग्रहण केंद्रों में खराब होगा।

उठाव में हर बार होती है देरी, प्रशासन गंभीर नहीं

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मार्कफेड ने मिलरों से धान उठाव करने का परिवहन किया है। जिले के 133 मिलरों से अनुबंध हुआ है कि वे धान का उठाव करे और मिलिंग करके चावल नाॅन और एफसीआई के गोदाम में जमा करे। मिलरों ने धान उठाव का ठेका ट्रकर्स को दिया है। धान खरीदी जितनी भी मात्रा में हो डीओ परमिट कटने के बाद भी उठाव में देरी होती है।

233 करोड़ 54 लाख के कर्ज की वसूली भी हो गई

धान बेचते ही किसानों से कर्ज की वसूली भी सरकार ने कर ली। जिला केंद्रीय सहकारी बैंक की शाखाओं से जिले के किसानों ने कर्ज 272 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था जिसमें से 233.54 लाख रुपए की वसूली कर ली गई है।

49 प्रतिशत तक धान अब भी केंद्रों में खुले में पड़ा है

जिले में धान की खरीदी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। बावजूद इसके 49 प्रतिशत तक धान खरीदी केंद्रों में ही डंप है। इसमें भी कई केंद्र ऐसे हैं, जहां तय बफर लिमिट से अधिक धान डंप है। डीओ कटने के बाद उठाव नहीं हो पाया है।

20 दिनों से अधिक पुराना धान केंद्रों में अब भी पड़ा हुआ

केंद्रों में 15 से 20 दिनों तक खरीदा धान डंप पड़ा है। डंप धान की सुरक्षा सहकारी समितियों को दी गई है। देरी से धान उठाव हुआ तो धान की मात्रा कम हो जाएगी और इसे सूखत दर्ज करेंगे। इस हालात में सूखत का नुकसान समितियों से भरपाई की जाएगी।

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