इस गांव में इंटरनेट नहीं होने की वजह से एक महीने से गांव के लोग हैं भूखे

संक्षेप:

  • जानकार हैरानी होगी कि अगर इंटरनेट सर्विस ठप हो, तो कस्बे के लोगों को कई हफ्तों बिना राशन के रहना पड़ता है
  • पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोआमंडी कस्बे के कोटघर गांव में कुछ ऐसे ही हालात हैं
  • पके चावल में पानी मिलाया और थोड़ा नमक. बस बच्चों के दो वक्त का खाना तैयार. सुबह-शाम यही हमारा भोजन है

सिंहभूम: झारखंड सरकार ने बीते पांच फरवरी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत राशन लेने के लिए राशन कार्ड में दर्ज सभी सदस्यों का आधार लिंक करवाना अनिवार्य कर दिया. जिसके बाद राशन लेने के लिए गरीबों को दिनोंदिन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. आपको जानकार हैरानी होगी कि अगर इंटरनेट सर्विस ठप हो, तो कस्बे के लोगों को कई हफ्तों बिना राशन के रहना पड़ता है. पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोआमंडी कस्बे के कोटघर गांव में कुछ ऐसे ही हालात हैं.

दो महीने बाद आता है राशन

गांव में बने पीडीएस की दुकान में करीब दो महीने बाद जब राशन आया, तो गांव की महिलाओं को उम्मीद जगी कि अब जाकर शायद उनके बच्चों के पेट में अन्न का दाना जाएगा. कड़ी धूप और लू के थपेड़ों के बीच महिलाएं घर का काम छोड़कर राशन की दुकान पर पहुंच जाती हैं. तब तक राशन की दुकान खुली भी नहीं थी. ज्यादातर महिलाएं नंगे पैर ही चली आई थीं. इनमें से एक महिला दुकान की खिड़की से झांककर अंदर देखती हैं. अंदर जमीन पर चावल की बोरियां रखी हैं. इन महिलाओं के लिए राशन का मतलब बस चावल भर है.

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करीब एक घंटे बाद लोकल पीडीएस डीलर भोला आकर दुकान खोलता है. इस बीच महिलाएं राशन कार्ड और आधार कार्ड हाथ में लेकर लाइन बना चुकी होती हैं. बता दें कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अनुसार योग्य परिवारों को प्रति माह कार्ड पर दर्ज प्रत्येक सदस्य के लिए सस्ते दरों पर पांच किलो अनाज का अधिकार है (अन्त्योदय कार्डधारियों को 35 किलो प्रति परिवार).

कोटघर गांव की रहने वाली सुकरू बताती हैं, `दो दिन पहले घर का राशन खत्म हो गया था. ऐसे में पड़ोसी के घर से राशन मांगकर बच्चों को खिलाया. सुकरू के लिए भी राशन का मतलब चावल ही है.` वह कहती हैं, `हम बस चावल ही खरीद सकते हैं. पके चावल में पानी मिलाया और थोड़ा नमक. बस बच्चों के दो वक्त का खाना तैयार. सुबह-शाम यही हमारा भोजन है.`

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