निगम की लापरवाही के कारण कबाड़ हो गए 15 लाख के डस्टबिन

संक्षेप:

  • निगम की लापरवाही से हुआ बड़ा नुकसान
  • 15 लाख के डस्टबिन बने कबाड़
  • डस्टबिन खरीद कर जनता में नहीं बांटे

गाजियाबाद- गीले और सूखे कचरे को घरों में ही अलग कराने के लिए नगर निगम ने डस्टबिन तो खरीदे, लेकिन जनता को बांटे नहीं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत मिले फंड को ठिकाने लगाने के लिए करीब 30 लाख की रकम खर्च कर एक लाख डस्टबिन खरीदे गए, लेकिन आधे से ज्यादा बांटे नहीं गए। खानापूर्ति करने के लिए चंद लोगों को डस्टबिन देकर फोटो खिंचवाए गए और फिर इन कूडे़दानों को गैराज में डंप कर दिया गया। स्वच्छता के लिए खरीदे गए करीब 15 लाख से ज्यादा रकम के डस्टबिन अब कबाड़ बन चुके हैं।

स्वच्छ भारत मिशन के तहत घरों में ही गीले और सूखे कचरे को अलग कराने (सेग्रीगेशन एट सोर्स) कराने का निर्णय लिया गया था। गीले कचरे को लैंडफिल साइट पर ले जाकर उसका निस्तारण कराया जाता है, जबकि सूखे कचरे (लोहा, लकड़ी, कांच, प्लास्टिक आदि) को अलग कर उसे रिसाइकिल करा दिया जाता है। नगर निगम ने घरों से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग लेने के लिए वाहनों में भी दो चैंबर बनवाए हुए हैं।

 निगम ने करीब 50 हजार ऐसे लोगों को यह नीले और हरे डस्टबिन बांटने की प्लानिंग की थी, जिनमें जागरूकता की कमी थी। निगम ने करीब 5 हजार परिवारों को डस्टबिन बांटे भी, लेकिन बाद में यह योजना और डस्टबिन दोनों डंप कर दिए गए। सरकार की ओर से मिला फंड ठिकाने लगाकर कागजों में जिम्मेदारी पूरी कर ली गई।

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गीला और सूखा कचरा अलग इकट्ठा करने की योजना सिर्फ घरों के लिए ही नहीं थी। खाने के ठेलों, होटल, रेस्तरां व अन्य दुकानों पर भी दो रंग के (नीले और हरे) रंग के डस्टबिन रखवाए जाने थे। ताकि होटल, रेस्तरां और ठेलों से निकलने वाले कचरे को भी अलग-अलग करके नगर निगम को दिया जाए। यह योजना भी लागू नहीं हो पाई।
नगरायुक्त महेंद्र सिंह तंवर ने कहा कि डस्टबिन खरीदने का मामला मेरे कार्यकाल से पहले का है। मामला संज्ञान में आया है तो इसकी जांच कराई जाएगी कि उन्हें बांटा क्यों नहीं गया। जांच में सरकारी फंड के दुरुपयोग के आरोप सही पाए गए तो संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब कर कार्रवाई की जाएगी।

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