गोरखपुर: मुन्जेश्वर नाथ के दर्शन करने से होती है मुरादें पूरी

संक्षेप:

  • गोरखपुर से 19 किमी है भौवापार बाबा मुन्जेश्वर नाथ की नगरी
  • बाबा मुन्जेश्वरनाथ मंदिर पर नहीं है कोई छत
  • सतासी राजवंश ने छत लगाने का किया था प्रयास, हुआ नुकसान

गोरखपुर- यूपी के गोरखपुर से 19 किमी दूर भौवापार बाबा मुन्जेश्वर नाथ की नगरी है। बाबा मुन्जेश्वरनाथ ने अपने ऊपर आज तक किसी भी प्रकार की छत को नहीं लगने दिया। सतासी राजवंश के कुछ राजाओं ने इस बाबा के सिर पर छत रखने का प्रयास किया, लेकिन वह रात में ही अपने आप गिर जाता था।

कूड़ाघाट क्षेत्र के इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि राप्ती और रोहिन नदियों के प्रकोप से जमींदोज हुए रामग्राम (वर्तमान में रामगढ़ ताल इलाका )के आसपास जंगल था। एक लकड़हारा झाड़ियों के बीच मौजूद पेड़ की जड़ को कुल्हाड़ी से काट रहा था। अचानक कुल्हाड़ी किसी पत्थर से टकराई। उसने दूसरी बार चलाया तो उसमें खून दिखाई दिया और वहां मौजूद गड्ढा खून से भर गया। उसने बस्ती में रहने वाले लोगों को जाकर घटना की जानकारी दी। गांव के लोग पहुंचे और सफाई के बाद यहां उन्हें काले रंग का एक शिवलिंग दिखा। जो धीरे-धीरे नीचे होता चला गया।

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स्थानीय वृद्धों के अनुसार उस समय के ग्रामीणों ने कहा कि वे गड्ढे में दूध भरते हैं। असली शिवलिंग होगा तो ऊपर आएगा और नकली होगा तो डूब जाएगा। लोगों ने दूध भरना शुरू किया और शिवलिंग से खून की धारा निकलने के साथ ही वह गड्ढे में से ऊपर आता गया। इसी के बाद यहां पूजा होने लगी। शिवलिंग पर कुल्हाड़ी के निशान आज भी हैं।

वर्तमान में पीपल के पेड़ के नीचे शिवलिंग मौजूद है। पेड़ में पंचमुखी शेषनाथ की आकृति फन के रूप में उकेरी हुई है। कहा जाता है कि पेड़ की जड़ों में नागदेव, बिच्छू, गोजर, मधुमक्खियां रहते हैं। कभी-कभी तो नागदेव शिवलिंग पर आकर लिपट जाते हैं और कुछ देर बाद अदृश्य हो जाते हैं। मान्यता के अनुसार, कुशीनगर जाते समय भगवान बुद्ध यहां दो दिनों तक रुके थे। रामग्राम में उनकी पत्नी यशोधरा का मायका था इसलिए वे वहां नहीं गए। क्योंकि वह अब तक सांसारिक मोह त्याग चुके थे।

इसी क्रम में आज भक्तों ने महानगर के अन्य शिव मंदिरों बाबा मुन्जेश्वर नाथ, मुक्तेश्वर नाथ शिव मंदिर राजघाट मान सरोवर शिव मंदिर रामलीला मैदान गोरखनाथ सहित गोरखनाथ मंदिर में मानसरोवर स्थित शिव मंदिर में शिवभक्तों ने जलाभिषेक किया।

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