गोरखपुर : टूट गया 'पक्षी विहार' का सपना

संक्षेप:

  • बखिरा पक्षी अभयारण्य का नहीं हो पाया विकास
  • जाड़े के मौसम में आते हैं बड़ी संख्या में विदेशी पक्षी
  • पढ़िए बखिरा झील से जुड़ी अनसुनी कहानी

गोरखपुर। बखिरा पक्षी अभयारण्य उत्तर प्रदेश राज्य के संत कबीर नगर जि़ला मुख्यालय खलीलाबाद से लगभग 20 किमी की दूरी पर मेंहदावल-खलीलाबाद मार्ग पर है। आजादी के पहले यह इलाका अविभाजित गोरखपुर जिले का ही हिस्सा था। उस समय यह झील बड़ी संख्या में मछली उत्पादन और जाड़े के समय विदेशी पक्षियों का सबसे बड़ा बसेरा होने के कारण लोगों के आकर्षण का केन्द्र होने के साथ ही इस क्षेत्र का बहुत ही प्रसिद्ध `शिकारगाह` था।

मौजूदा समय में इसका क्षेत्रफल 28.94 किमी में फैला हुआ है। इतिहास के पन्नों में मोतीझील के नाम से अंकित बखिरा झील को 14 मई 1990 को उत्तर प्रदेश सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए बखिरा पक्षी विहार का दर्जा प्रदान किया था। तभी से झील में पक्षियों का शिकार प्रतिबंधित कर दिया गया है। ज्ञात रहे यहां जाड़े के मौसम में बड़ी संख्या में विदेशी पक्षी आते हैं। विदेश से आने वाले इन सैलानियों के प्राणों की रक्षा व पर्यटकीय दृष्टि से इस स्थान को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करवाना और इस झील को (गोरखपुर जिले के ही एक पुराने हिस्से) मौजूदा महाराजगंज जिले के सोहगी बरवां क्षेत्र से जोड़ते हुए वर्ष 1997 में यहां रेंज कार्यालय की स्थापना की गई। झील की रखवाली के लिए गनर और नाविक की तो नियुक्ति की गई है, मगर राज्य सरकार की बृहद योजना के बावजूद इसका अब तक न तो विकास हो पाया है और न ही सुन्दरीकरण।

सरकार ने बखिरा झील में ही नौका विहार की भी योजना तैयार की थी, जो अब तक जमीन पर नहीं उतर पाई है। सुंदरीकरण के लिए किसानों के खेतों को अधिगृहीत किये जाने का भी मामला अभी तक लटका हुआ है और अदालत में विचाराधीन है। बखिरा अपने जमाने में बर्तन उद्योग का भी बड़ा केन्द्र रहा है।

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भौगोलिक विशेषता : संत कबीर नगर जिले मुख्यालय खलीलाबाद से 16.20 किमी दूर उत्तरी हिस्से में स्थित, मेहदावल मार्ग पर बसे बखिरा कस्बे के पूर्वी भाग में अवस्थित है. इस पक्षी बिहार के विस्तृत भूभाग में विचरते पक्षियों को देखने के लिए सैलानी यहां आ सकें, इसके लिए बखिरा से 3 किमी दूर, बखिरा-सहजनवां मार्ग पर जसवल के पास उत्तर की ओर आधा किमी लम्बी सडक़ बनी है. जहां वाच टावर के अलावा वन विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों के लिए आवास बने हुए हैं. गोन, पटेरा, पोंटे, मोगटान, जेनीचेला, कटिया, लियोफाईटान, काई शैवाल, फीताधारी, कुमुदनी, कमलिनी एवं सफेद कमल आदि तथा जलचरों में विभिन्न प्रकार की मछलियां, कछुए, केकड़े, भाकुर, पतासी, टेंगन एवं सर्प आदि की विविध प्रजातियां इस झील में पाई जाती हैं। झील का पानी जमीन की आद्र्रता बनाए रखने में काफी फायदेमंद भी है।

बखिरा झील से जुड़ी कहानी : गोरखपुर मंडल की यह ऐतिहासिक बखिरा झील गर्मी के दिनों में सैलानियों के लिये आकर्षण का विशेष केन्द्र बनी रहती है। यहां आने वाले बच्चों में विशेषकर झील की उत्पत्ति को लेकर अच्छी खासी जिज्ञासा बनी रहती है। एक प्रचलित किंवदंती के अनुसार किसी समय में बखिरा झील एक ख़ूबसूरत नगर हुआ करता था। लेकिन प्राकृतिक व भौगोलिक कारणों से यह कस्बा झील में परिवर्तित हो गया। बखिरा झील की ऐतिहासिक महत्ता इन दिनों मासूमों के लिए पिकनिक स्पाट बनी हुई है।

बखिरा पक्षी विहार के पक्षी : यहां पर पूरे वर्ष पानी भरा रहता है जिसके चलते जलीय वनस्पतियां, छोटे छोटे कीड़े, घोंघे व सीप आदि के चलते यूरोप, साईबेरिया, तिब्बत एवं चीन आदि देशों से पक्षी आते हैं। बखिरा पक्षी विहार में दीवाली से होली तक प्रवासी और अप्रवासी पक्षियों की किलकारियां पर्यटकों को खूब लुभाती हैं। सर्दी का मौसम बिताने के बाद प्रवासी पक्षी अपने वतन को लौट जाते हैं। वन विभाग की मानें तो यहां 113 प्रजाति के पक्षी आते रहे हैं। खास बात यह है कि इन प्रवासी पक्षियों में अधिकांशत: शाकाहारी होते हैं। ये पक्षी रोज भोर से स्वतंत्र विचरण करते हुए जल के किनारे उगे झाड़ झुरमुटों से अपना भोजन तलाशते हैं। इनके साथ ही वर्ष भर इस झील में विहार करने वाले स्थानीय पक्षी भी हैं, जो इनके साथ मिलकर सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

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