'मां तरकुलहा देवी' मंदिर की कहानी, जहां से चलता था अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का अभियान

संक्षेप:

  • आज से नवरत्रि की शुरुआत
  • मंदिरों में उमड़ी भारी भीड़
  • जानिए `मां तरकुलहा देवी` के मंदिर में

गोरखपुर: 9 दिनों तक चलने वाली नवरत्रि  की आज से शुरुआत हो गई है. इस मौके पर मंदिरों में भारी भीड़ देखी जा रही है. ये भीड़ दुर्गा मां की सिद्ध पीठ और प्रतिष्ठित मंदिरों में दर्शन के लिए उमड़ रही है.

वहीं गोरखपुर स्थित `मां तरकुलहा देवी` के मंदिर में भी भारी संख्या में भक्त पहुंच रहे हैं. जिला मुख्यालय से करीब 23 किलोमीटर दूर यह स्थान आजादी की लड़ाई के दौरान वीरान जंगल था, जहां मां का पिंडी रूप में क्रन्तिकारी बंधु सिंह साधना करते थे और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का अभियान भी चलाते थे.

वह जंगल से गुजरने वाले कई अंग्रेज सिपाहियों की हत्या भी कर देते थे, जिसके बाद एक गद्दार की  सूचना पर अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी की. उनको सात बार फांसी पर लटकाया गया, लेकिन हर बार फंदा टूट गया और उनको कुछ भी नहीं हुआ.

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इस मंदिर का नाम तरकुलहा इसलिए पड़ा क्योंकि जिस स्थान पर यह मां भगवती का पूजा करते थे, वहां तरकुल का पेड़ था और बंधु सिंह को फांसी लगते ही वह पेड़ टूट गया और रक्त बहने लगा. आस्था और आजादी के दीवानों की श्रद्धा और साधना की प्रमुख देवी दुर्गा पीठ तरकुलहा मंदिर का प्रसाद भी अद्भुत होता है. भक्त जो भी चढ़ाए पर इस स्थान पर मीट और बाटी प्रमुख प्रसाद का अंश है.

कभी घने जंगलों में विराजमान सुप्रसिद्ध मां तरकुलहा देवी मंदिर आज तीर्थ के रूप में विकसित हो चुका है जो देवीपुर गांव में स्थित है. इस मंदिर के महत्व के बारे में लोग बताते हैं कि मन से जो भी मुराद मांगी जाए वह पूरी होती है. मन्नत पूरी होने पर माता के मंदिर में घंटी बांधी जाती है. यहां पर मंदिर परिसर में चारों ओर घंटियां देखने को मिल जाएंगी. मन्नतें पूरी होने पर लोग अपनी क्षमता के अनुसार घंटी बांधते हैं, चैत्र नवरात्रि में भी यहां बड़ा मेला लगता है.

तरकुलहा देवी मंदिर में बकरा चढ़ाने की परम्परा है. भक्तगढ़ लोग मन्नतें मांगने आते हैं और पूरी होने के बाद यहां बकरे की बलि चढ़ाते हैं. उसके बाद मिट्टी के बर्तन में उसे बनाते हैं और प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं. 

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