बसंत पंचमी : जानिए सबसे पहले किसने उड़ाई थी पतंग

संक्षेप:

  • सतरंगी रंग में रंगी धर्मनगरी
  • कुछ इस अंदाज में हुआ वसंत ऋतु का स्वागत
  • जानिए बसंत पंचमी पर क्या है पतंगबाजी का महत्व?

 

हरिद्वार: वसंत ऋतु के आगमन को लेकर चारों ओर उत्साह का माहौल है। हर कोई वसंत ऋतु का अपने तरीके से स्वागत करने में लगा है। वहीं हरिद्वार में पतगंबाजी का क्रेज देखने को मिला। धर्मनगरी में जिधर देखो उधर पतंगें ही नजर आईं। या यूं कहें कि पूरी धर्मनगरी सतरंगी रंग में रंग गई है।

वसंत ऋतु  पर हरिद्वार हड़ की पौड़ी पर लाखों लोगों ने गंगा स्नान किया। पंडित प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार माघ अमावस्या के दिन मां सरस्वती का जन्मदिन होता है और हमारे जीवन में जो चार सिद्धांत हैं, धर्म, अर्थ, काम मोक्ष इनकी प्राप्ति इस दिन गंगा स्नान से होती है।

आज के दिन का हरिद्वार के लोगों को काफी इंतजार रहता है। बच्चे सुबह से ही अपने घरों की छतों पर चढ़ कर पतंगबाजी करते नजर आए। कहा जाता है की इस ऋतु के आगमन पर सर्दी धीरे धीरे कम होने लगती है और पतझड़ भी शुरू हो हो जाता है। आज के दिन को हिन्दू धर्म में काफी श्रेष्ठ मना जाता है, पंडितों कि मानें तो आज का दिन विद्या की देवी सरश्वती का पूजन करना चाहिए।  

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बसंत पंचमी पर गंगा स्नान करने का विशेष महत्त्व है। इस दिन स्नान करने से लक्ष्मी ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इस दिन लक्ष्मी और श्री सूक्त का पाठ गंगा किनारे बैठकर करना चाहिए।

जानिए बसंत पंचमी त्योहार पर क्या है पतंगबाजी का महत्व और सबसे पहले किसने उड़ाई थी पतंग...

हिंदू कैलेंडर के अनुसार माघ मास में शुक्ल पक्ष के पांचवे दिन मनाया जाता है। इस वर्ष देशभर में बसंत पंचमी का त्योहार 22 जनवरी 2018 को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। लोहड़ी और मकर संक्रांति के बाद बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। बसंत पंचमी को मां सरस्वती के प्रगट होने का दिन भी माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन के बारे में मान्यता है कि इस दिन ज्ञान-विज्ञान, संगीत, कला और बुद्धि की देवी माता सरस्वती का जन्म हुआ था। इसलिए बसंत पंचमी के दिन खास तौर पर देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। साथ ही बसंत पंचमी के दिन पूजा के साथ पतंगबाजी का लुत्फ भी उठाया जाता है। इस दिन लोग प्राकृतिक जल स्रोतों, बाबलियों और झरनों में स्नान कर पीले वस्त्र धारण कर मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और युवा पतंग उड़ाते हैं।

पतंग उड़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कभी रीति-रिवाज, परंपरा और त्योहार के रूप में उड़ाए जाने वाली पतंग आज मनोरंजन का पर्याय बन चुकी है। युवा वर्ग सुबह से ही पतंगें उड़ानें में व्यस्त हो जाते हैं। पिछले कुछ सालों से स्थानीय बाजारों में पतंग के लिए इस्तेमाल होने वाला चाइनीज मांझे का दबदबा है।

बसंत पंचमी के त्योहार पर पहले मुख्य रूप से पंजाब और गुजरात के लोग इस दिन ‘पतंग महोत्सव’ मनाते थे, लेकिन अब देशभर में इस दिन पतंगबाजी होती है। जहां कुछ लोग बाजार से पतंग और डोर खरीदते हैं तो कुछ लोग खुद पतंग बनाकर उड़ाते हैं। वहीं पाकिस्तान के पंजाबी मुस्लिम इस ऋतु के दौरान घर की छतों से पतंग उड़ाने का आनंद लेते हैं। आपको याद होगा कि पतंग त्योहार कई बॉलीवुड फिल्मों में भी दिखाया जाता है।

भारत के कई त्योहारों और पर्वों पर पतंग उड़ाई जाती है, लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि भारत के अलावा कई देशों में भी पतंग उड़ाई जाती है। पतंग के इतिहास के बारे में अगर हम बात करें तो यह तकरीबन 2,300 वर्ष पुराना है। माना जाता है कि पतंग का आविष्कार ईसा पूर्व तीसरी सदी में चीन में हुआ था। दुनिया की पहली पतंग एक चीनी दार्शनिक मो दी ने बनाई थी। उस काल में पतंग टिशू पेपर और बांस की बनी होती थी। चीन के बाद पतंगों का फैलाव जापान, कोरिया, थाईलैंड, बर्मा, भारत, अरब और उत्तरी अफ्रीका तक हुआ।

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