मध्यप्रदेश में सोच से दुगुनी तेजी से बढ़ा बारहसिंगा का कुनबा

संक्षेप:

66 से बढ़कर 800 हुई बारहसिंगा की संख्या

दुगुनी तेजी से बढ़ा बारहसिंगा का कुनबा

बीसवीं शताब्दी में बहुत ही सोचने वाला बड़ा बदलाव

मध्य प्रदेश ने बारहसिंगा संरक्षण में विश्व स्तरीय पहचान बनाने में एक अनोखी सफलता हासिल की है... कान्हा में हार्ड ग्राउण्ड बारासिंघा मात्र 66 की संख्या तक पहुँच गये थे... प्रबंधन के काफी प्रयासों से आज ये संख्या 66 से बढ़कर 800 हो गई है... अवैध शिकार और आवास स्थलों के नष्ट होने से ये प्रजाति विश्व की कुछ अति-संकटग्रस्त वन्य-प्राणी प्रजातियों में शामिल है...

मध्यप्रदेश का ये राज्य पशु अब आपेक्षिक तौर पर सुरक्षित हो गया है लेकिन कान्हा प्रबंधन इसे अभी भी पर्याप्त नहीं मान रहा है और लगातार बारासिंघा संरक्षण के प्रबंधकीय उद्देश्यों की ओर आगे बढ़ रहा है... विश्व में केवल कान्हा टाइगर रिजर्व में बचे हार्ड ग्राउण्ड बारासिंघा को अन्य स्थानों पर भी बढ़ाने के उद्देश्य से हाल के सालों में 7 बारासिंघा भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान और 46 को सतपुड़ा टाइगर रिजर्व भेजा गया है.. वहाँ भी इनकी संख्या पहले के मुकाबले बढ़ी है....

भारत में बीसवीं शताब्दी में बारहसिंगा की आबादी में एक बहुत ही सोचने वाला बड़ा बदलाव देखा गया है... इस दौरान नर्मदा, महानदी, गोदावरी और सहायक नदियों की घाटियों में खेती की जा रही थी... बारहसिंगा के समूह जैविक दबाव के कारण बिखर गये थे और शिकारियों के डर से ये काफी अलग-थलग हो गये थे.... जिसके चलते इनकी संख्या में तेजी से कमी आती चली गई... गौरतलब है कि पूरे विश्व में बारहसिंगा की कुल तीन उप-प्रजातियाँ भारत और नेपाल में पाई जाती हैं... भारत में तीनों उप-प्रजातियां रूसर्वस ड्यूवाउसेली, रूसर्वस ड्यूवाउसेली रंजीतसिन्ही और रूसर्वस ड्यूवाउसेली ब्रेंडरी ज्यादातर दुधवा और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, मनास राष्ट्रीय उद्यान और कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में पाई जाती हैं... साल 1938 में वन विभाग ने एक सर्वेक्षण किया जिसमें पता चला कान्हा राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र और आसपास लगभग 3 हजार बारहसिंगा थे... इसके बाद से बारहसिंगा की संख्या में लगातार गिरावट आती गई और साल 1953 में हुए आंकलन में ये संख्या 551 और साल 1970 में मात्र 66 पर सिमट गई.....

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