2019 के लोकसभा चुनाव के अक्स हैं 2018 के चुनावी नतीजे

संक्षेप:

  • तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस आत्मविश्वास से लबरेज
  • इन तीन जीतों ने राहुल गांधी को विपक्षी नेता के रूप में किया स्थापित
  • अगले पांच महीने भा.ज.पा. और कांग्रेस दोनों के लिये बहुत अहम

By: मदन मोहन शुक्ला

जीत और हार जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। आज के नतीजे देश के विकास और लोगों की सेवा करने के लिये कठिन कार्य
करने के हमारे संकल्प को आगे बढ़ाएंगे। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 11 दिसम्बर 2018 को आये चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया है। नरेन्द्र मोदी जी पिछले साढ़े चार सालों का अपनी सरकार का विश्लेषण करें तो 2014 से अब तक लोक सभा चुनाव से पहले जो वायदे किये क्या यह सब जुमला साबित नहीं हुए?

इसी का नतीजा है कि हिन्दी बेल्ट के तीन प्रदेश मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ जहां आपकी सरकार थी वह कांग्रेस की झोली में चली गयी। जहां 2017 में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगियों के पास 19 राज्य आ गये थे तथा देश की 68 फीसदी आबादी और 75
फीसदी रकबे पर भा.ज.पा. काबिज हो गई थी आज 2018 में पांच राज्यों के चुनाव के परिणामों के बाद भा.ज.पा. 49.9 फीसदी आबादी 40.2 फीसदी क्षेत्रफल पर सिमट गई हैं और भा.ज.पा. का कांग्रेस मुक्त भारत नारा कमजोर हुआ तथा निजी तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को बहु आयामी लाभ मिला है।

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बेशक तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस आत्म विश्वास से लबरेज है। जो जीता वही सिकन्दर बनकर निकली कांग्रेस विपक्षी एकता
की धुरी साबित हो सकती है। हिन्दी बेल्ट के तीन प्रदेशों में कांग्रेस के जीत के परचम को नरेन्द्र मोदी विरोधी क्षेत्रीय दल बखूबी महसूस करते हैं। लेकिन साथ साथ एक डर भी क्षेत्रीय दलों के मन में हैं। अगर कांग्रेस आने वाले लोकसभा चुनावों में भा.ज.पा. के विजय रथ को रोकने में सफल होती है तो क्षेत्रीय दलों की चिन्ताओं को बढ़ाती है जिनके जनाधार में सेध लगाकर वह खुद को मजबूत करेगी। हालांकि यह बहुत कुछ क्षेत्रीय दलों के प्रति कांग्रेस की संवेदनशीलता और लचीले पन पर निर्भर करेगा। कांग्रेस को दिखाना होगा कि वह सबको साथ लेकर भा.ज.पा. को हराने के लक्ष्य से आगे बढ़ रही है। बहरहाल हाल ही में दिल्ली में विपक्षीय नेताओं की बैठक में राजद के तेजस्वी यादव की इस आशय की एक आशंका पर राहुल अपनी पार्टी के रूख को लचीला बता चुके हैं।

लेकिन राहुल बार बार चुनावी गठबंधन को लेकर लचीलेपन के रूख पर अमल कर रहे हैं लेकिन इसका असर उ0प्र0 में मायावती व अखिलेश यादव एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर होता नहीं दिख रहा है। उ0प्र0 में तो सपा-बसपा में गठबंधन में सीटों का फार्मूला तय कर लिया गया है जिसमें बसापा को 38 व सपा को 37 और रालोद के हिस्से में 03 सीटें लेकिन कांग्रेस तीन प्रदेशों में जीत के बाद गठबंधन में कही भी खड़ी होती नहीं दिखती।  इसके पीछे मुख्य चिन्ता लोक सभा चुनाव में सीट बॅंटवारे को लेकर दिख रही है।

पांच राज्यों के विधान सभा के चुनाव से पहले सपा और बसपा कांग्रेस के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही थी पर इन राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद परिदृश्य काफी बदल गया है। अब यह तय है कि बाकी राज्यों की तरह उ0प्र0 में भी भा.ज.पा. विरोधी गठबंधन कांग्रेस की शर्तों पर होगा। यही बात दोनो पार्टियों को चिन्तित कर रही है।

यह तो मानना पड़ेगा कि तीन राज्यों में जीत ने राहुल गांधी को नरेन्द्र मोदी के मुकाबले मजबूत विपक्षी नेता के रूप में स्थापित किया है। विपक्ष में कोई नेता अभी इस स्थिति में नहीं है। राजनैतिक परिदृश्य धीरे धीरे राहुल के पक्ष में होता दिख रहा है, भा.ज.पाईयों नें जो राहुल को पप्पू कहकर मजाक उड़ाया था वही राहुल की जीत पर चिंतित है तथा आम जनता अब उन्हें नये चश्मे से देख रही है कि वह हर चीज को नये तरीके से करते हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि हिन्दू राहुल गांधी के मंदिर जाने और हिन्दू होने का प्रमाण पत्र देने के विरोध में नहीं है यही बजह है जिसने राहुल के अभियान को तेज धार दी है। उन्होने नब्ज पकड़ी और किसानों की समस्या, बेरोजगारी, जी.एस.टी., नोट बंदी जैसे मुददे उठाकर आम आदमी के दिल में जगह बना ली जिसकी गूंज बेशक अगले साल होने वाले लोक सभा चुनाव में होगी।

लेकिन कांग्रेेस के लिये लोक सभा चुनाव की राह आसान नहीं है क्योकि विपक्ष में बिखराव है। राहुल के अलावा कांग्रेस के पास कोई
बड़ो चेहरा नहीं है और अभी तक केन्द्र में सरकार को घेरने में सफल नहीं रही है। इन सबसे इतर कांग्रेस को इन तीन राज्यों में जीत को लोक
सभा चुनाव तक बहुत सभाल कर रखना होगा । लापरवाही, बेपरवाही, गफलत इन सबसे ऊपर अंदरूनी द्वंद बना-बनाया काम बिगाड़ सकता है। जनादेश आसानी से जाया हो सकता है। अगर कांगेस अगले पाॅच महीनों तक जनता को यह दिखाती है कि वह राहुल गांधी की प्राथमिकताओं के अनुसार बेरोजगारी, कृषि संकट और भ्रष्टाचार का मुकाबला ईमानदारी से कर रही है तो फिर 2019 के लोक सभा चुनाव में जीत की उम्मीद रख सकती है।

अगर इस पर खरे नहीं उतरते तो अन्य प्रदेशों में यह धारणा बनेगी कि इन तीनों प्रदेशों में मतदाता के विश्वास के साथ नाइंसाफी की है तो दूसरे प्रदेशों में मतदाता मायूस होगा जो कांग्रेस के लिये आत्मघाती हो सकता है। जनता को, मतदाता को अपना समझना सपना देखना है, मतदाता स्वाभिमानी है, स्वतंत्र, स्वायत्त है। वह बहलाया जा सकता है कुछ समय के लिये, बहकाया नहीं जा सकता ।

कांग्रेस को अपने वचनों को गोस्वामी जी के वचनों में तोलना होगा ‘‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाई पर वचन न जाई’’। आदिवासी प्रश्नों के लिये नई सरकारों को नये उपाय निकालने होगे। जाहिर है कि भा.ज.पा. सरकारों की नीतियों से आदिवासी वर्ग असंतुष्ट था क्यों? केैसे? क्या खामियां थी उन नीतियों में ? इस पर नई सरकारों को गहरा विचार विमर्श करना होगा, गैर राजनीतिक तबकों से, आदिवासी
विचारकों के साथ । उग्रवाद को कैस रोल बैक किया जाये इस पर गैर राजनीतिक विचार महत्वपूर्ण होगे। यदि मनरेगा योजना पर तीनों सरकारें कायदे और ईमानदारी से अमल करें तो समझिये कि आधा युद्ध जीत गये ।

अगले पांच महीने भा.ज.पा. और कांग्रेस दोनों के लिये बहुत अहम हैं। तीनों नई सरकारों को कसौटी पर खरा उतरना होगा, उन प्रान्तों की भलाई के लिये और देश में लोकतन्त्र के बचाव के लिये। अच्छे दिन का नारा अपना काम कर गया है। अब सच्चेे दिनो की बारी है। दूसरी तरफ भा.ज.प. की डगर विधान सभा के नतीजों से काफी कठिन हो गई है सात प्रतिशत की विकास दर से जनता संतुष्ट नहीं है, भले ही दुनिया में सबसे तेज क्यो न हो। यह एक तथ्य है कि 2014 में भा.ज.प. और प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार मोदी विकास के नारे के दम पर सत्ता में आये थे। मोदी ने जनता से अच्छे दिन का वायदा किया था जो महज एक नारा बन कर रह गया। इससे गुस्साई जनता ने अब अपने वोट से इसका जबाब दे दिया।

मोदी के नोट बंदी जैसे मुददे पर जो समर्थन मिला है उस ऐवज में आम जनता को वह लाभ नहीं मिला । देश के प्रमुख  संस्थानों को लेकर मोदी के रवैये ने भी उनकी छवि को प्रभावित किया था । इन संस्थानों की साख पर प्रहार करने की कोशिश की गई। इन संस्थानों की नियुक्तियों में पेशवर योग्यता पर वैचारिक प्रतिबद्वता को तरजीह दी गई। बीते एक वर्ष के दौरान न्यायपालिका और भारतीय रिजर्व बैंक में हुए अप्रत्याशित घटनाक्रम इसके उदाहरण हैं।

इन सबका सार यह है कि लोकसभा चुनाव में कुछ महीने ही बचे हैं इसीलिये मोदी सरकार के पास ‘‘कोर्स करेक्शन’’ के लिये समय बहुत कम है। भा.ज.पा. की हार में केन्द्र में आर्थिक मुददे ज्यादा रहे । किसानों की बदहाली और बेरोजगारी की मार ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। इसका जबाब अयोध्या में मंदिर बनाने की कोशिश से नहीं दिया जा सकता।

उ0प्र0 मे 15 साल और केन्द्र में 10 साल तक सत्ता से बाहर रखकर मतदाताओं ने संदेश दे दिया था कि इस मुददे पर अब वह भा.ज.
प. पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। किसानों के अलावा अनुसूचित जाति/जन जाति कानून में संशोधन के कदम से दलित, आदिवासी खुश तो नहीं हुए परंतु सवर्ण जरूर नाराज हो गया पार्टी का परम्परागत मतदाता, व्यापारी और मध्य वर्ग पहले से ही नाखुश हैं।

किसानों की कर्जमाफी का मुददा अब यक्ष प्रश्न की तरह मोदी सरकार के सामने खड़ा है । कर्ज माफी एक ऐसा उपाय है कि जिसमें
किसान की आमदनी या जीवन में कोई बदलाव तो आता नहीं परंतु अर्थव्यवस्था खासतौर से बैंकिग व्यवस्था के विनाश का आधार तैयार हो जाता है। प्रधान मंत्री मोदी इस नीति के खिलाफ रहे हैं जो उनकी हार का एक कारण बना है। भा.ज.प. को इन मुददों को समझना होगा।

साथ-साथ यह भी देखना है कि जब कर्ज माफी से किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं है तो राहुल गांधी क्यों  इसे हिट फार्मूले के आइने से देखते हैं तथा लोकसभा चुनाव भी कर्ज माफी के मुददे पर लड़ने का एलान कर रहे हैं। साथ ही मोदी सरकार पर कर्ज माफी की घोषणा का दबाब भी बना रहे हैं। अगर मोदी सरकार किसानों का कर्जा माफ नहीं करती तो 2019 में सत्ता में आने पर कांग्रेस सरकार सौ फीसदी
गारंटी के साथ पूरे देश के किसानों का कर्जा माफ कर देगी।

यह भारतीय अर्थ व्यवस्था के लिये कितना घातक होगा इसकी चेतावनी पूर्व रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन तथा अन्य अर्थ -शास्त्री दे चुके हैं । मनमोहन सरकार द्वारा वर्ष 2008-09 में घोषित 70.00 हजार करोड़ रूपये से अधिक की कर्ज माफी भले ही सम्प्रग को
दो बार सत्ता दिलाई लेकिन इसका दंश आज भी बैंक भुगत रहे हैं। अर्थ व्यवस्था चरमरा रही है आज बैंको में फंसा कर्जे, (एनपीए) का स्तर 2012 के 24800 करोड़ रूपये से बढ़कर 2017 में 60000 करोड़ रूपये तक पहुंच गया है लेकिन किसान की स्थिति वैसी दयनीय बनी हुई है। किसान आज भी आत्म हत्या कर रहा है। लेकिन यह 26.3 करोड़ किसानों और उन पर आश्रित करोड़ों लोगों के वोट हासिल करने का कारगर हथियार बन चुका है।

राहुल गांधी कर्ज माफी चुनाव जीत के हिट फार्मूले को दर किनार करते हुए अगर केन्द्र व राज्य सरकारें मिलकर बीज, खाद,
उर्वरक, सिचाई अन्न भण्डारण और विपणन में सुधार करें । फसल की बीमा को व्यापक बनाकर उसे किसान परिवार की बीमारी, शिक्षा आदि को भी शामिल किया जाये ताकि किसान आकस्मिक झटकों से बच सके। सबसे बढ़कर खेती किसानों को उद्योग का दर्जा दिया जाये ताकि निजी क्षेत्र निवेश करने को आगे आये। कांग्रेस और भा.ज.पा. दोनों को कर्ज माफी के नजरियें में बदलाव लाना होगा और ठोस धरातल पर जाकर किसानों की समस्याओं का जड़ से उन्मूलन करना होगा तभी लोकसभा चुनाव में जीत की बयार अपने पक्ष में लाने में सफल हो सकेगे।

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