सिटी स्टार: लखनऊ के 'सौमित्र त्रिपाठी' की कोशिश ने लगाया शहीदों के सम्मान में चार चांद

संक्षेप:

-शांतनु त्रिपाठी
लखनऊ: अगर कोई व्यक्ति सरकारों पर निर्भर हुए बिना शहीदों के लिए कुछ करने की कोशिश करता है तो एक काबिले तारीफ काम है। कुछ ऐसा ही करके राजधानी के सौमित्र त्रिपाठी शहीदों के लिए ये खास काम किया है।

पेश है बातचीत के कुछ अंश-
NYOOOZ- आप शहीदों के लिए क्या कार्य कर रहे हैं ?

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सौमित्र त्रिपाठी- कुछ समय पहले मैंने सोचा था कि शहीद परिवारों को भी सम्मान मिलना चाहिए। तो उनके सम्मान के लिए मैं हर साल कार्यक्रम करता हूं। जिसमें सेना के अधिकारियों द्वारा शहीदों के परिवारों को सम्मानित किया जाता है। वहीं मैंने एक और कार्य शुरू किया है वो ये है कि रक्षाबंधन वाले दिन लड़कियां देश के जवानों को राखी बांधे। इसके अलावा शहीद परिवारों को किसी भी परेशानी में मदद करता हूं। जैसे पेंशन को लेकर अगर कोई परेशानी है या आरटीआई और किसी ऑफिसर से बात करनी है तो इसमें भी मैं शहीद परिवारों की सहायता करता हूं।

NYOOOZ- शहीदों के लिए इन खास कार्यों को करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली ?
सौमित्र त्रिपाठी- बात 1998 की है। जब मैं बहुत छोटा था और अपने परिवार के साथ बनिहाल जाता था। ननिहाल जाते समय मुझे चारबाग रेलवे स्टेशन पर एक सेना के अधिकारी मिले जिनका नाम था कैप्टन मनोज पांडे। मैं बहुत छोटा था तो मैं चल कर गया और कैप्टन मनोज पांडे से कहा कि मैं भी बड़े होकर एक आर्मी ऑफिसर बनूंगा, तो उन्होंने कहा कि आर्मी ऑफिसर बन कर क्या करोगे हम देश के लिए शहीद तक हो जाते हैं और हमको इतनी इज्जत नहीं मिलती।

जितनी समाज में मिलनी चाहिए। उसी समय उन्होंने अपने एक और जांबाज आर्मी ऑफिसर की कहानी बताई। जिसने मुझे एकदम झकझोर दिया। उस समय मेरी उम्र केवल 10 साल थी। मैं जैसे-जैसे बड़ा होता गया वैसे ही वैसे मनोज पांडे को भूलता भी गया लेकिन एक बार 3 जुलाई को अखबार में गोरखा रेजीमेंट द्वारा एक विज्ञापन निकाला गया जो मनोज पांडे के शहीद दिवस पर था। मैंने विज्ञापन देखा और मुझे याद आया कि मैं इनसे मिल चुका हूं।

बस इसके बाद साल 2001 में मैंने सबसे पहला काम किया वह यह था कि अखबारों में शहीदों से जुड़ी जितनी भी खबरें निकलती थी। उन सबको मैं अपने पास रख लेता था। फिर साल 2004 में एक अखबार में मैंने खबर पढ़ी कि हमारा देश शहीदों को भूल गया है। इस खबर ने मुझे अंदर से झकझोरा और मैंने कुछ करने का फैसला किया। तो 26 जुलाई को मैंने कारगिल दिवस का आयोजन किया और इस कार्यक्रम में मैंने मनोज पांडे के पिताजी और कैप्टन सी.बी सिंह को बुलाया कार्यक्रम में कैप्टन सी.बी सिंह ने हमें बहुत मोटिवेट किया और उन्होंने कहा कि तुम शहीदों के लिए कुछ और करो। वहीं मुझे भी कुछ करना था तो मैं कैप्टन साहब से मिला और उन्होंने मुझे 52 शहीदों की एक लिस्ट दी जो लखनऊ के निवासी थे। लिस्ट देने के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि तुम इन शहीदों पर एक किताब लिखो। तो कैप्टन की इस बात को सुनने के बाद मैं अपने कार्य पर निकल पड़ा और 3 साल के अंदर मैंने करीब 40 परिवारों से मुलाकात की और डाटा कलेक्ट किया और एक किताब निकाली जिसका नाम था जरा याद उन्हें भी कर लो।

NYOOOZ- अभी तक आपने क्या-क्या उपलब्धियां हासिल की है ?

सौमित्र त्रिपाठी- अगर उपलब्धियों की बात करें तो मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि मैंने जो किताब लिखी थी। शहीदों पर आधारित वह किताब पूरे देश में पहली किताब थी जो शहीदों पर आधारित थी। उसके बाद मेरे लिए एक और बड़ी उपलब्धि यह है कि साल 2014 में मेरी मुलाकात देश के जांबाज एम .एस बिट्टा से हुई। उन्होंने मुझे ऑल इंडिया एंटी टेररिस्ट फ्रंट का यूपी जनरल सेक्रेटरी बनाया इसके अलावा और भी कई कार्यक्रमों में मुझे सम्मान मिलते रहते हैं।

NYOOOZ- आपको घर का सहयोग मिलता है!

सौमित्र त्रिपाठी- घर से अगर सहयोग मिलने की बात की जाए तो मैं आपको बता दूं कि मेरे घर वालों को तो यह भी नहीं पता था कि मैं क्या कर रहा हूं। सहयोग तो बहुत दूर की बात है। मैंने जब अपना पहला कार्यक्रम किया तो मेरे पापा को पता भी नहीं था कि मैं कुछ करने जा रहा हूं।

मैंने जितने भी कार्यक्रम किए हैं। उन सब में जो भी पैसा लगा है, सब खुद ही अरेंज किया। जब मैंने पहला कार्यक्रम किया। उस समय मैं इंटर में पढ़ता था और बिना किसी से सहायता लिए मैंने अपने कार्यक्रम को अच्छे से किया।

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