चुनावी बयार, लोकलुभावन वायदे और संकीर्ण राजनीति

संक्षेप:

  • मोदी सरकार के पास कोर्स करेक्शन के लिये समय बहुत कम
  • पूरी तरह से इलेक्शन मोड पर है मोदी सरकार
  • 50 वर्ष पहले कांग्रेस ने गरीबी हटाने का दिया था नारा ?

By: मदन मोहन शुक्ला

लोक सभा चुनाव में कुछ ही महीने ही बचे हैं इसीलिए मोदी सरकार के पास कोर्स करेक्शन के लिये समय बहुत कम है । सियासी शतरंज में सीधी टक्कर भले कुछ दिनों बाद चुनावी मैदान में दिखाई देगी मगर अन्तरिम बजट के दौरान सरकार ने लोक सभा में चुनावी दांव की बिसात बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । अन्तरिम बजट में चुनाव पर निशाना लगाने वाले सौगातों की घोषणा जैसे-जैसे तेज हो रही थी कुछ इसी अंदाज में सत्ता पक्ष इसकी सिायसी गॅंज को सदन से सीधे चुनावी अखाड़े तक पहुंचाने का दांव चलता नजर आया। चुनावी सौगात वाले प्यादों की इस तेज चाल पर सत्ता पक्ष एक बारगी इतना झूमा कि मेजों की गूंज के बीच कुछ क्षणों के लिये तो ऐसा लगा कि मानो लोक सभा चुनावी रैली का मैदान बन गया हो।

अन्तरिम बजट फौरी तौर पर देखने में तो बड़ा आकर्षक है लेकिन इसमें कहीं-कहीं पर झोल भी नजर आता है। और ऐसा लगता है कि मोदी सरकार पूरी तरह से इलेक्शन मोड पर है जिसकी शुरूआत अभी कुछ दिन पहले मोदी सरकार ने 10 प्रतिशत आर्थिक तौर से पिछड़े सवर्णों का आरक्षण का संविधान संशोधन विधेयक पारित करके किया था और आज फिर इस कारवाई को आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन अगर देखा जाये तो बजट ने कही कही पर ना उम्मीद किया है। मसलन उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं कई हफ्ते से देश में इस बात पर चर्चा हो रही थी कि बजट में कृषि क्षेत्र के लिये क्या और किस तरह की घोषणायें की जायेंगी। कई विकल्पों पर चर्चा की जा रही थी और पूरी उम्मीद थी की किसानों के लिये कुछ
बड़ी घोषणायें की जायेगी लेकिन यह बात समझ में नहीं आ रही है कि दो हेक्टेअर से कम जमीन वाले किसानों को रू 6000.00 सालाना या रू 500.00 प्रतिमाह सालाना मदद से 12 करोड़ लघु व सीमान्त किसानों को कैसे फायदा होगा और वह वर्तमान संकट से कैसे बाहर आ पायेंगे। ना ही मुझे यह समझ आ रहा है कि इस बेहद मामूली सी मदद से किसानों की आत्म हत्याओं की घटनाओं में कमी लाने में मदद कैसे मिलेगी।

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देश भर के किसान इस सीधी मदद को बहुत कम बता रहे हैं और शायद इसकी घोषणा भी काफी देर से की गई। इसके लिये सरकार को बहुत
पहले ही कदम उठाने चाहिये थे अभी जो कुछ किया गया वह प्र्याप्त नहीं है। इस बात का कोई कारण समझ नहीं आता कि जितनी रकम की मदद देने की घोषण की गई है उसे दुगना क्यों नहीं किया गया । अगर ऐसा होता तो किसानों की आय बढ़ाने का सार्थक प्रयास होता। चालू वित्त वर्ष के लिये बीस हजार करोड़ के बजट आवंटन को दुगना करना पड़ता इसके लिये पैसे कहां से आता ? इसका आसान रास्ता है कि साल 2008-09 में वैश्विक आर्थिक मंदी के समय से उद्योग जगत को दिये जा रहे 1.86 लाख करोड़ के सालाना पैकेज को खत्म कर दिया जाये। इस पैकेज का अब कोई आर्थिक आधार नहीं है। और इस पैकेज को देते हुए 10 साल हो चुके हैं। आसान शब्दों में कहें तो साल 2008-09 से उद्योग जगत को रू 18.60 लाख करोड़ दिये जा चुके हैं और कभी भी बढ़ा रहे राजकोषीय असंतुलन पर कोई सवाल नहीं उठाया गया । इस पैकेज को अब खत्म कर देना चाहिये और इस राशि को किसानों केखातों में स्थानांतरित कर देना चाहिये जिससे उनको लाभ पहुंचे।

इसी तरह रक्षा बजट के मामले में रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार इस साल का रक्षा बजट पिछले साल की तुलना में रूपये बीस हजार करोड़ ही बढ़ाया गया है। इस साल रक्षा के लिये तीन लाख करोड रूपये से ज्यादा का प्राविधान किया गया है जबकि 2018 और 19 के दौरान रक्षा बजट रू0 2.85 लाख करोड़ का था इससे पिछले साल 2017 और 18 के दौरान रक्षा बजट रू 2.74 लाख करोड़ का था । पिछले साल के बजट से ही तीनों सेनायें निराश थीं सामरिक हल्कों में इसे भारत की रक्षा जरूरतों के मुकाबले काफी कम बताया जा रहा है। इसी लिये इस साल के रक्षा बजट में मात्र रू 20 हजार करोड़ के प्राविधान से यह कैसे कहा जा सकता है कि इससे तीनों सेनाओं की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। बजट भाषण के अन्त में वित्त मंत्री पूरी तरह चुनावी मोड में दिखे उन्होने मोदी सरकार के विजन 2030 की घोषणा कर डाली इस विजन के तहत मोदी सरकार ने एक भारतीय को 2022 तक अंतरिक्ष में भेजने की बात तो की है इसके अलावा देश को प्रदूषण मुक्त करने, पीने का साफ पानी उपलब्ध कराने, डिजिटल इंडिया पर जोर देने, भौतिक और सामाजिक ढ़ाचे को मजबूत करने और मेक इन इंडिया कार्यक्रम के जरिये रोजगार निर्माण पर जोर ।

दरअसल विजन 2030 कें माध्यम से नये सिरे से अच्छे दिन का लालीपाप को जनता आगे आने वाले लोक सभा चुनाव में कितनी वरीयता देती है क्योंकि 2014 के चुनावी वादे मात्र खोखले साबित हुए हैं। मसलन न मंदिर बना और न ही धारा 370 खत्म हुई, न काला धन आया, न सौ स्मार्ट सिटी बनी, न एक करोड़ रोजगार सृजित हुए और नही किसानों की फसल की लागत के दो गुना दाम मिले। बार्डर पर आतंकी हमले और नक्सली अटैक में मरने वाले जवानों का आंकड़ा भी पिछली मनमोहन सरकार से बहुत ज्यादा है। यह कैसा हिन्दुत्व है जो आगरा की दलित बिटिया को जिन्दा जलाने से खतरे में नहीं आता ? यह कैसा राष्ट्रवाद है जो देश व्यापी दंगों की योजना को फेल करने वाले इन्स्पेक्टर सुबोध सिंह की शहादत को सामान्य घटना मान लेता है। यह कौन सी गो भक्ति है जो आधुनिक स्लाटर हाउस खोलने पर सरकार द्वारा सब्सिडी देने पर, गोवा , असम, मेघालय समेत देश के 29 राज्यों में से 15 में खुले आम बाजारों में गोमांस बिकने पर चुप्पी साध लेती है। वह कैसे गो भक्त है जो देश की प्रमुख बीफ एक्सपोर्ट कम्पनियों के मालिकों हिन्दू और जैन होने पर मोदी राज में बीफ एक्सपोर्ट में विश्व में भारत के नम्बर वन होने पर आंखे बंद कर लेते हैं। यह मोदी सरकार की सकीर्ण राजनीति का एक हिस्सा है जो अगड़ी जाति के मूल जनाधार को पकड़ के रखने का चुनावी हथकंडा है। यह क्या है समाज को जातिवादी बनाने की हर जाति को आरक्षण का लाली पाप देकर हम किस तरह का समाज देना चाहते है। क्या हम संविधान की मूल भावना का अनादर ता नहीं कर रहे हैं कि हम समाज को आर्थिक तौर से बांट रहे हैं मात्र वोट की राजनीति के लिये। चुनाव करीब है वादों की बारिश से जनता को सरोबार किया जा रहा हैॆ मानों कोई जादुई छड़ी कांगेस व भाजपा के हाथ लग गई हो । बस जनता के दुख दर्द खत्म ही होने वाला ही है।

ऐसा ही एक वादा मोदी ने 2014 के चुनाव से पहले किया था जिसका दंश जनता आज तक झेल रही है तभी तो नितिन गडकरी को कहना पड़ा था कि ‘‘जो लोग चुनावी वादे करते हैं उसे पूरा नहीं करते उसे जनता पीटती है’’ । लेकिन पार्टी एवं नेताओ को क्या कहें लगता है कि लोकतंत्र नेताओं के लिये नहीं जनता कजे लिये महापर्व समान है । लेकिन अफसोस यह क्षणिक ही होता है। जनता प्यासी ही रह जाती है। यह खोखले वादे पिछले 70 वर्षों से जनता को लुभा रहे हैं और राजनीतिक पार्टियों के लिये सिर्फ जीत का महत्व है। वायदो से कुछ भी लेना देना नही सिर्फ यह जनता को भरमाने का चुनावी जुमला है। कुछ सवाल अनुत्तरित हैं। क्या भाजपा की चार साल की योजनाएं अधूरी रह गई । क्या इन योजनाओं पर सवाल नहीं उठेगा जिनका भाजपा देश भर में बखान करती घूम रही है। इसके साथ ही क्या उसकी अब तक की सोंच और उपलब्धियों पर प्रशन चिन्ह नहीं लगेगा। वास्तव में यही सवाल विपक्ष कांग्रेस से भी होगा। एक महीने में राहुल गांधी तीन बड़ी घोषणायें कर चुके हैं। किसान कर्ज माफी, न्यूनतम आमदनी की गारंटी और महिला आरक्षण बिल क्या वह यह बतायेंगे कि इसमें ऐसा क्या है कि जो कांग्रेस की ओर से पहली बार कहा जा रहा है? क्या यह सच नहीं है कि 50 वर्ष पहले कांग्रेस ने गरीबी हटाने का नारा दिया था? कांग्रेस के आखिरी कार्यकाल यानि संप्रग सरकार-2 के वक्त तक भारत में गरीबी का आंकड़ा लगभग 30 फीसदी था अगर न्यूनतम आमदनी गरीबी खत्म करने की गारंटी है तो इतने वर्षों तक उसे
लागू क्यों नहीं किया गया ? किसान कर्ज माफी तो 2009 में भी आयी थी लेकिन वह सफल न हो सकी। राहुल गांधी को इसका जबाब देना होगा कि महिला आरक्षण बिल के बारे में राज्य सभा से विधेयक पारित कराने के बाद जब कांग्रेस केन्द्र में सत्ता में रही तो वह इस पर आगे क्यों नहीं
बढ़ सकी।

किसानों का कर्ज लगभग चार लाख करोड़ रूपये है अगर न्यूनतम आमदनी गारंटी योजना लागू की जाये तो उस पर भी लगभग सात लाख करोड़ का खर्च जायेगा । क्या भारत फिलहाल इस स्थिति में है कि बाकी जनकल्याणी योजनाओं के साथ इतनी बड़ी योजना शुरू की जा सके। विपक्ष में रहकर कुछ भी घोषणायें विपक्षी पार्टियां कर सकती है लेकिन जब वे सरकार में रहती हैं तो धरातल पर योजनायें सकार नहीं हो पाती हैं क्योकि सरकार के हाथ बंधे होते है संसाधन सीमित होते है। इसी लिये विपक्षी नेताओं को वायदे और घोषणाये करने से पहले उसके क्रियान्वयन पर मनन करना चाहिये अन्यथा जनता उसका जबाब देती है।

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