सरकार के कीटनाशकों पर प्रतिबंध का किसानों ने किया विरोध, बोले - बिना विकल्प के प्रतिबंध लगाना उचित नहीं

संक्षेप:

  • सरकार के कीटनाशकों पर प्रतिबंध का किसानों ने किया विरोध।
  • किसान बोले - बिना विकल्प के प्रतिबंध लगाना उचित नहीं।
  • धान को कीटों से बचाने के लिए रसायनों का उपयोग आवश्यक- किसान।

लखनऊ. मौसम की मार से जूझ रही धान की फसल पर एक और संकट आ गया है। सरकार ने दस कीटनाशकों को प्रतिबंधित कर दिया है। किसानों का कहना है कि बिना इसका विकल्प दिए प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं। प्रतिबंध ऐसे समय पर लगाया गया है, जब इस फसल को कीटनाशकों की बेहद जरूरत है। फसल पर इस समय फुदका रोग, कीट तना छेदक, झोंका रोग का प्रभाव है।

फसलों पर प्रतिबंधित रसायनों का पड़ रहा दुष्प्रभाव - सरकार

सरकार का मानना है कि फसलों पर प्रतिबंधित रसायनों का दुष्प्रभाव पड़ रहा था। इससे बासमती का निर्यात प्रभावित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा न उतरने से इसका निर्यात 15 फीसदी गिर गया है। बासमती उपज को बचाने एवं निर्यात को बाधा मुक्त करने के लिए इन कीटनाशकों पर कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की सिफारिश पर प्रतिबंध लगाया गया है। किसानों का कहना है कि अब जबकि धान पकने लगा है तो कीटनाशकों का हमला फसल को नुकसान पहुंचा रहा है। विकल्प दिया नहीं गया है। हम क्या करें।

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धान को कीटों से बचाने के लिए रसायनों का उपयोग आवश्यक

धान की फसल को लेकर इस बार किसान परेशान ही रहा है। समय से बारिश न होने के कारण वे धान की बुआई करने में लेट हो गए। प्रदेश सरकार ने कुल 90 लाख हेक्टेयर में बोआई का लक्ष्य रखा गया था, पर साठ लाख हेक्टेयर में ही रोपाई हो पाई। इसके बाद कई दिन तक लगातार हुई बारिश ने भी कई जिलों में धान की फसल को नुकसान पहुंचाया। अब पश्चिमी उप्र में धान पक रहा है तो वहीं पूर्वी उप्र में इसे पकने में थोड़ा समय लगेगा। किसानों का कहना है कि इस समय धान में फुदका रोग, कीट तना छेदक, झोंका रोग आदि का प्रभाव है। इनसे बचाने के लिए रसायनों का प्रयोग तो करना ही होगा।

जैविक उपचार का उपयोग सर्वथा सही – अपर निदेशक कृषि रक्षा

कृषि रक्षा विभाग अपर निदेशक त्रिपुरारी प्रसाद चौधरी का कहना है, `रसायनों के अत्यधिक प्रयोग रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। काफी कीटनाशक ऐसे हैं, जो विकल्प के तौर पर मौजूद हैं। दुकानदारों के पास इसकी पूरी जानकारी है। किसान उनका ही प्रयोग करें। वैसे किसान यदि जैविक आधार पर ही फसलों का उपचार करें तो ज्यादा सही है। रसायनों का सबसे ज्यादा असर बासमती में आ रहा है।`

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