हरियाणा-महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव नतीज़े- झटका बीजेपी के लिए

संक्षेप:

  • मोदी और उनके सिपहसालार के लिए एक सीख है यह चुनाव
  • खट्टर सरकार की नाकामी के खिलाफ़ लोगों ने दिखाया गुस्सा
  • इस चुनाव में जनता खुद विपक्ष और मतदाता की भूमिका में दिखी

By: मदन मोहन शुक्ला

यह चुनाव एक सीख मोदी और उनके सिपहसालार के लिए है। इसके साथ साथ गोदी मीडिया ने एग्जिट पोल के जो आंकड़े एक तरफा पेश किए मानों विपक्ष है ही नहीं, इस पर मंथन करना होगा तथा सत्ता सीनों की चाटुकारिता से परे जाकर जनता को वास्तविकता से रूबरू कराना होगा। फ़िलहाल जो नतीज़े आये उसका सार यही है कि क्षेत्रीय प्रभाव वाले दलों को कमतर नही आकां जा सकता।यह दल बड़े दलों को टक्कर देने की स्थिति में है।बिहार में लालू की आर जे डी, महाराष्ट्र में शरद पवार की रा कं प,उद्धव ठाकरे की शिवसेना, हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की जन नायक जनता पार्टी, जिस पार्टी का गठन हुए ही 11 महीने हुआ है। 10 सीटों के साथ यह किंग मेकर की भूमिका में है तथा बी जे पी के साथ मिलकर सरकार बना चुकी है। दुष्यंत चौटाला जाटों के नेता के रूप में उभरे हैं।इनका बी जे पी से मिलन को जाट समुदाय कैसे लेता है यह देखने वाली बात होगी क्योंकि खट्टर की हार में जाट फैक्टर भी एक कारण था जिसका फायदा भूपिंदर सिंह हुड्डा के नेतृत्व में लड़ने वाली कांग्रेस और जाट नेता दुष्यंत जो देवीलाल के पर पोते को हुआ।

कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस हरियाणा ने लोकसभा चुनाव में महज़ 6 महीने पहले बी जे पी को भारी बहुमत से सारी की सारी 10 सीट दिलाई थी, आज उसी  बी जे पी को सरकार बनाने में पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। पिछ्ली बार 2014  में 47 सीटों की जगह 2019,केवल40 सीटें ही मिली ।राहत की बात रही वोट प्रतिशत 3.3 बढ़ा।हरियाणा के 2014 विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के मतों का अंतर 12.62% था जो 2019 में घटकर 8.27 फीसदी रह गया।

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लोकसभा में चुनाव में लोगों ने मोदी की साफ छवि और राष्ट्रीय मुद्दों पर जम कर भाजपा के पक्ष में वोट दिया लेकिन विधानसभा चुनाव में खट्टर सरकार की नाकामी के खिलाफ़ गुस्सा भी दिखाया।इस चुनाव में विपक्ष तो नकारात्मक भूमिका में था लिहाज़ा बागडोर जनता ने अपने हाथ में ले रखी थी यह एक शुभसन्देश है लोकतन्त्र के लिए।इस बार राष्ट्रवाद,अनुछेद 370,हिन्दू मुस्लिम, पाकिस्तान -एजेंडे से इतर स्थानीय मुद्दे ज़्यादा प्रखर रहें। मसलन राष्ट्रवाद पर बिजली सड़क, पानी और रोज़गार  एवं आर्थिक मंदी जैसे मुद्दें भारी रहें जो भाजपा की हार का कारण बनें।

खट्टर सरकार द्वारा किसानों की अनदेखी चाहे वो फसलों की खरीद का मसला हो या समर्थन मूल्य का या पराली की समस्या , हार का मूल कारण रहे।

सबसे शर्मनाक भाजपा खासतौर से अमित शाह के लिए उनके प्रिय ,  प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला का 50,000 हज़ार मतों से हारना और साथ ही एक और झटका हरियाणा में 10 में 7 मंत्री भी चुनाव हार गए। जनता ने खट्टर सरकार को यह संदेश दिया कि अच्छी सरकार की कसौटी पर आप नाकाम रहे। सीट बंटवारे में जाट समुदाय की उपेक्षा ,भाजपा कार्यकर्ताओं में जमीनी स्तर पर संवाद न स्थापित करना,एवं बागियों को न साध पाना इनकी विफ़लता का कारण रहा।तभी तो सोनीपत से लेकर सिरसा तक जाट बेल्ट में कांग्रेस का परचम फहराया और भाजपा हाशिये पर रही। जबकि बराला ,प्रदेश अध्यक्ष जाटों के कद्दावर नेता थे लेकिन वे अपनी सीट भीं नही बचा पाए। भाजपा का एक और ताकतवर जाट चेहरा वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु नारनौंद विधानसभा सीट से चुनाव हार गए।राहत की बात रही मुख्यमंत्री मनोहरलाल लाल खट्टर अपनी सीट बचा ले गए।

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस जो करीब-करीब न-उम्मीदी के दौर से गुज़र रही थी,पार्टी के लोकसभा सभा चुनाव के बाद राहुल के अध्यक्ष पद छोड़ने से जो शून्यता आ गयी थी उसको इस चुनाव ने ऊर्जा दी।अपनी अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रही कांग्रेस अनुच्छेद 370,तत्काल तीन तलाक ,राष्ट्रवाद और पाकिस्तान जैसे मुद्दों को  भाजपा जिस तरह दम-खम से जनता के बीच जाकर भुना रही थी कांग्रेस उसको काउंटर करने में पूरी तरह असफल रही तथा विकल्प के तौर पर स्थानीय मुद्दों को सही ढंग से प्रचारित नहीं कर पाई बल्कि दूरी बना के रखी।भले ही कांग्रेस भाजपा को दोनों प्रदेशों में दमदार विकल्प देने में असमर्थ रही लेकिन जनता ने नतीजों के जरिये स्पष्ट संदेश दे दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसे केवल एक दलीय सत्ता नही बल्कि मजबूत वैकल्पिक विपक्ष भी चाहिए।

कांग्रेस को अगर ज़ोरदार तरीके से आगे होने वाले विधानसभा चुनाव जो अगले साल झारखंड, दिल्ली और बिहार उसके बाद पश्चिम बंगाल  और 2022 में उत्तरप्रदेश में होना है ,अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है तो उन्हें स्थानीय दिग्गज़ों को ज्यादा महत्व देना होगा ।क्योंकि इसकी झलक हरियाणा में मिल चुकी है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा और अशोक तंवर के बीच चल रही खींचतान को खत्म करने में फैसला देर से लिया और हुड्डा को चुनावी कमान देने में देरी का नुकसान हुआ अन्यथा कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में होती।लेकिन संतोष की बात रही कि 2014 के मुकाबले दुगनी से ज्यादा सीट मिली ।इससे यही संदेश कांग्रेस हाई कमांड को जाता है राहुल फार्मूला युवाओं को आगे लाना उतना कारगर फ़िलहाल नहीं है इसीलिए कांग्रेस को स्थानीय दिग्गज़ों पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह, मध्यप्रदेश में कमलनाथ ,दिग्विजय सिंह ,राजस्थान में अशोक गहलोत को महत्व देना होगा।

यह गौर करने वाली बात है कि राहुल की हठधर्मिता ,लचीलेपन की कमी, निर्णय लेने की क्षमता का न होना ही कारण बना लोक सभा में करारी हार का।यह याद रखना चाहिए 2004 और 2009 कि कांग्रेसनीत संप्रग सरकार बनवाने और दोबारा सत्ता में लाने में संयुक्त आंध्र प्रदेश प्रान्त के वा ई एस राजशेखर रेड्डी का बड़ा हाथ था।अगर वहां राहुल जगन मोहन  रेड्डी और चंद्रशेखर राव को पार्टी में बनाए रखने में सफल होते तो आज कांग्रेस दोनों तेलगु भाषी राज्यों आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में कही ज्यादा मजबूत होती और वहाँ उसकी सरकार होती।
महाराष्ट्र में भी राष्ट्रीय मुद्दें धराशायी हो गए स्थानीय मुद्दें जिनमें आर्थिक मंदी,गरीबी,बेराजगारी,विदर्भ क्षेत्र में किसानों की बदहाली तथा किसानों द्वारा की जा जा रही हत्या को रोकने में सरकार की असफलता को जनता ने खुद सरकार को सबक सिखाया। जिसकी परिणीति भाजपा की यह हुई 122 के लक्ष्य से पिछड़ गए आंकड़ा 105 पर ही रहा। वहीं कमोबेश शिव सेना को 63 की जगह 56 सीट से संतोष करना पड़ा। मोदी- अमित शाह ने जहां जहां रैली की वहां राष्ट्रीय मुद्दों को ही हवा दी जो इन दिग्गज़ों की राजनीतिक चूक रही।

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने महाराष्ट्र में 48 में 23 सीटें जीती थी कुछ महीनों में ही स्थिति यह हो गई कि अपने बल बुते सरकार बनाने की मंशा पर पानी फिर गया।न चाहते हुए भी शिव सेना का दामन थामना पड़ रहा है और शिव सेना फिफ्टी फिफ्टी के फार्मूले के तहत रोटेशन में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी तथा कैबिनेट में मंत्री पद की बराबर की हिस्सेदारी और विधानसभा में अपना उपसभापति।जो भाजपा आलाकमान को डाइजेस्ट नहीं हो रहा है, यहीं सरकार के गठन में पेंच फंसा हुआ है फ़िलहाल शिवसेना और भाजपा के नेता अलग-अलग जाकर गवर्नर से मिल चुके हैं।

इस चुनाव में शुरू से लग रहा था शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का सूर्य अस्त पर है क्योंकि जिस तरह दलबदलू पार्टी छोड़ भाजपा में जा रहे थे और देवेंद्र फडणवीस इसको शुभ संकेत मान रहे थे।साथ साथ हालात यह थे कि सहयोगी पार्टी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने महाराष्ट्र के प्रचार में बहुत ज्यादा उत्साह और दिलचस्पी नहीं दिखाई ।खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों के प्रायोजित छापे और परिवार की अंदरूनी लड़ाई भी पवार के लिए सरदर्द थी इन सभी परिस्थीतियों मे शरद पवार अकेले डटे रहे मराठा क्षत्रप शरद पवार 76 साल के उम्र में जिस जोश के साथ स्थानीय मुद्दों को उठा रहे थे साथ ही पार्टी छोड़ कर गए नेताओं की हार भी सुनिश्चित कर उन्होंने अपना परचम लहराया,  2014 के मुकाबले 13 सीटें अधिक जीत कर 54 सीटों के साथ रा कं प कांग्रेस के 44 सीटों से काफी आगे निकल गयी ।शरद पवार की बढ़ी हुई ताकत का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि उनकी पारिवारिक सीट बारामती से उनके भतीजे अजित पवार भारी बहुमत से जीते ।उन्हें अकेले 85 फीसदी से ज्यादा वोट मिलें।

पवार की पार्टी ने पश्चिम महाराष्ट्र की 66 सीटों पर पिछली बार की तुलना में बढ़िया प्रदर्शन किया।यह क्षेत्र रा कं प का गढ़ माना जाता है लेकिन 2014 में केवल 18 सीटें जीती थी इस बार 27 सीटों के साथ भाजपा का स्कोर करीब आधा ही रह गया।कांग्रेस  अपने पिछले चुनाव के 42 सीटों में 2 सीटों की बढ़ोत्तरी के साथ 44 सीट ही पा सकी तथा चौथे पायदान पर खिसक गई।सबसे खराब स्थिति भाजपा की रही जितने नेता पार्टी से बगावत करके भाजपा में आये सब चुनाव हार गए और भाजपा के 15 बागी, विधायक बन गए।और तो और इनके 8 मंत्री चुनाव हार गए जैसा कि हरियाणा में हुआ था जो पुनः रेखांकित करता है कि ज़मीनी स्तर पर सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में मंत्री कोई रुचि नहीं ले रहे थे।यह उन सारे प्रदेशों पर लागू होता है जहां भजपाइयों की सरकार है उसमें उत्तर प्रदेश भी है।इसमें ढिलाई भारी पड़ सकती है।

भाजपा की आंतरिक कलह विदर्भ में हार का कारण बनी यहां नितिन गडकरी टिकट बंटवारे को लेकर नाराज़ थे।यह नहीं भूलना चाहिये कि गठबंधन के बावजूद शिवसेना और भाजपा ने एक दूसरे को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।संभवतः आर एस एस ने भाजपा के  बागियों की जीत में अहम भूमिका निभाई।नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस का जो क्षेत्र था वहां भाजपा 50 फीसदी सीट पर हार गई।
चुनाव नतीज़े बता रहे हैं कि मुम्बई में कांग्रेस का कहा जाने वाला वोट बैंक इस चुनाव में बिखरा हुआ नजर आया,दलित,ईसाई, मुसलमान ,उत्तरी और दक्षिणी भारतीय मतदातओं में सिर्फ़ मुसलमानों और ईसाइयों के एक छोटे गुट ने कांग्रेस को वोट दिए इसका कारण यहाँ कम वोट पड़े। आरे जंगल मुद्दें और पी एम सी घोटालों के पीड़ितों ने चुनाव का वहिष्कार किया था।इस समय कांग्रेस में कुशल नेतृत्व की आवश्यकता एवं निम्न स्तर से सांगठनिक पुनर्गठन और ज़िम्मेदारी देने के साथ जबाबदेही तय करने की भी ज़रूरत है।अन्यथा कांग्रेस हाशिये पर चली जायेगी।

जहां तक वोट शेयर की बात है तो भाजपा को 25.70फीसदी ,शिवसेना को 16.4फीसदी,रा कं प को 16.70 फीसदी और कांग्रेस को 15.77% वोट मिले।

काफ़ी दिनों से विश्लेषकों और विशेषज्ञों द्वारा कहा जा रहा था कि देश मे विपक्ष खत्म हो चुका है।लेकिन इस चुनाव में जनता खुद विपक्ष और मतदाता की भूमिका में दिखी। क्योंकि विपक्ष खासतौर से कांग्रेस पूरी तरह निष्क्रिय दिखी न उनके पास कोई विकल्प न कोई मुद्दा।स्थानीय मुद्दों को धार देने में नाकाम।लिहाज़ा यह काम जनता ने अपने विवेक से किया ।राष्टीय मुद्दों को पूरी तरह से नकार दिया यहाँ मोदी का करिश्मा कहीं नही दिखा।जनता जो गरीबी, भुखमरी ,बेरोज़गारी एवं आर्थिक मंदी से जूझ रही थी इसका दोषी केवल और केवल प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को माना।स्थानीय समस्यायों से मुंह मोड़ना भी भाजपा की हार का कारण बना और इसने क्षेत्रीय एवं कांग्रेस पार्टी में एक जोश और उम्मीद रूपी ऑक्सीजन का संचार किया जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है।इस चुनाव ने साबित कर दिया कि विपक्ष अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ ।उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी हो या बिहार में आर जे डी ने अपनी मौजूदगी मजबूती के साथ दर्ज कराई।लोकतंत्र तभी ज़िंदा रह सकता जब पक्ष और विपक्ष दोनों बराबर से मौजूद रहे और एक दूसरे पर नज़र रखें।

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