आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर

संक्षेप:

  • क्या 72 साल की उपलब्धि आरक्षण प्राप्त करना है?
  • नोटबंदी और जीएसटी से झेलना पड़ा लोगों को दर्द
  • मोदी सरकार के पास कोर्स करेक्शन के लिये समय बहुत कम

By: मदन मोहन शुक्ला

जाने कब होगा आरक्षण का अन्त और कैसे होगा समाधान। क्या सवर्णों की बहत्तर साल की उपलब्धि आरक्षण प्राप्त करना है। क्या आरक्षण भारत को पंगु बना रहा है? लोकतन्त्र में जनता का समर्थन जुटाना एक चुनौती है लेकिन उसके लिये शॉर्टकट और सरल रास्ता अपनाने से समर्थन तो मिल सकता है पर उस जनता का प्यार और आशीर्वाद नही क्योकि अंततः उससे जनता का भला नहीं होता । कुछ ऐसा ही मोदी सरकार ने 2019 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव से ठीक 100 दिन पहले सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी सवर्णो को आरक्षण देने का फैसला किया है जो भारतीय जनता पार्टी की बदहवासी तीन प्रदेश मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में हार तथा राफेल रक्षा सौदे में सीधे तौर पर प्रधान मंत्री पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और डील में हस्तक्षेप के तौर पर देखा जा रहा है।

साथ-साथ जब 2014 में नरेन्द्र मोदी देश के प्रधान मंत्री बने तो लोगो को उम्मीद जगी थी कि जो नारा मोदी ने दिया था अच्छे दिन का वह इन साढ़े चार सालों में मरीचिका ही साबित हुआ । जनता को जो दर्द झेलना पड़ा वह चाहे नोट बंदी का हो या जी.एस.टी. लागू होने का जिसने व्यापारियों की कमर तोड़ दी साथ में मॅंहगाई और बेरोजगारी बची खुची कसर पूरी कर रही है। जो बड़े-बडे़ वादे मोदी ने किये कि हर साल दो करोड़ नौकरी हर व्यक्ति के खाते में रू0 15.00 लाख आयेगा । विदेशो में जमा काला धन वापस आयेगा। ना खाऊंगा न किसी को खाने दूंगा यह सब चुनाव स्टंट साबित हुआ । इसके अलावा देश के प्रमुख संस्थानों को लेकर मोदी के रवैये ने भी उनकी छवि को प्रभावित किया।

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लोकसभा चुनाव में कुछ महीने ही शेष बचे हैं इसीलिये मोदी सरकार के पास कोर्स करेक्शन के लिये समय बहुत कम है। भारतीय जनता पार्टी की हार में केन्द्र में आर्थिक मुददे ज्यादा रहे। किसानों की बदहाली और बेरोजगारी की मार ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। किसानों के अलावा अनुसूचित जाति/जन जाति कानून में संशोधन के कदम से दलित आदिवासी खुश तो नहीं हुए परंतु सवर्ण जरूर नाराज हो गये । पार्टी का परम्परागत व्यापारी और मध्य वर्ग पहले से ही नाखुश है। लिहाजा सवर्णों में भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रति बढ़ते आक्रोश की परिणनीति रही 10 फीसदी आर्थिक तौर से पिछड़े सवर्णों का आरक्षण का 124वां संविधान संशोधन विधेयक।

सबसे आश्चर्य करने वाली बात जो है कि लोक सभा में इस विधेयक को लेकर सत्ताधारी पार्टी पर यह आरोप लगा कि यह विधेयक चार साल पहले क्यों नहीं आया ठीक लोकसभा चुनाव की तिथि घोषित होने से पहले ही क्यों आया ? फिर भी सारी पार्टियों ने अपनी सहमति से इसे पारित कर दिया क्योकि यह उनकी राजनीतिक मजबूरी थी। आर्थिक आधार पर गरीब सवर्णों समेत सभी को दस प्रतिशत आरक्षण देने के सरकार के प्रस्ताव पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह वर्तमान में निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण के अलावा होगा या इसे सामान्य सीटों के भीतर ही दिया जायेगा । लेकिन सरकार के इस कदम को संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जा रहा है। इस प्रस्ताव पर तीन सवाल उठ रहे हैं ।

पहला संविधान में आरक्षण का प्राविधान उन जातियों और वर्गों के लिये किया गया है जो सामाजिक रूप से पिछड़े हैं। सरकारी नौकरियों, शिक्षा, राजनीति जैसी जगहों पर उनका प्रतिनिधित्व नहीं है इस आधार पर देखें तो दलित जाति पिछड़े वर्गों के मुकाबले सवर्ण आरक्षण तार्किक नहीं ठहरता। दूसरा सामाजिक रूप से उपेक्षा या पिछड़े पन के शिकार को आरक्षण दिया जाता है इसका उद्देश्य ऐसे तबके को समाज की मुख्य धारा में लाना है। सवर्ण समुदाय इसमें नही आता । देश में कई जातियों एवं वर्गो के लोग सामाजिक रूप् से भेदभाव, उपेक्षा का शिकार कर रह हैं। आरक्षण सामाजिक भेदभाव दूर करने का साधन भर है। तीसरा सवर्णो के आरक्षण की राह में सबसे बड़ी बाधा देश में उनका सामाजिक आर्थिक स्तर या उनकी संख्या को लेकर अभी तक कोई सर्वे उपलब्ध नही है। जातिगत जनगणना शुरू तो की गई थी लेकिन उसे बीच में ही बन्द कर दिया गया। सवाल उठता है कि सवर्णों को आरक्षण देने का रास्ता व तरीका क्या होगा? उनका आर्थिक पिछड़ापन कैसे तय होगा ?

अब इसका दूसरा पहलू यह भी देखना है कि देश में बेरोजगारी दर 7.3 प्रतिशत जो पिछले 23 महीने में सबसे ज्यादा है। केवल 2018 में एक करोड़ दस लाख लोगों की नौकरियां छिन गईं । संसद में खुद सरकार ने माना है कि केन्द्र सरकार में 24 लाख पद खाली हैं जिसे मोदी सरकार ने भरा नहीं है। कहीं बगैर नौकरियों के आरक्षण जुमला बन कर न रह जाये? जहां तक आरक्षण के इतिहास की बात करें तो पहले भी प्रयास हो चुके हैं। 1991 में मंडल आयोग लागू होने के बाद पूर्व प्रधान मंत्री श्री नरसिम्हा राव ने गरीब सवर्णो को 10 फीसदी आरक्षण दिया कोर्ट ने 1992 में खारिज कर दिया । 1978 में बिहार में तत्कालीन मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने सवर्णो को 3 फीसदी आरक्षण दिया कोर्ट ने रदद कर दिया । 2015 सितम्बर में राजस्थान में 14 फीसदी आरक्षण का ऐलान 2016 में राजस्थान हाई कोर्ट ने बिल रदद कर दिया हरियाणा में भी यही हुआ । 2016 गुजरात में 10 प्रतिशत आरक्षण की घोघणा हाई कोर्ट ने तुरंत असंवैधानिक बता दिया । क्या इसका भी भवि-ुनवजयय पूर्व पारित विधेयकों की तरह होगा ? अरूण जेटली ने स्पष्ट किया है कि अब तक यह इसलिए खारिज होता रहा है क्योकि संविधान में आर्थिक पिछड़ेपन का प्राविधान ही नहीं किया गया था इस बार संविधान में इसका प्राविधान किया गया है इसीलिये सवंधिान सम्मत है। उन्होने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट ने भी अपने फैसले में साफ कर दिया था कि 50 प्रतिशत आरक्षण

सीमा केवल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगो के संदर्भ में थी । 124वां संविधान संशेधन बिल दोनो सदनों में पारित हो गया अब राष्ट्रपति की मंजूरी की औपचारिकता रह गई है इसके बाद यह व्यवस्था अब तक अनारक्षित हर जाति या धर्म के जरूरतमंदों के लिये लागू हो जायेगी । लेकिन कुछ सवाल आज भी अनुत्तरित हैं कि जो दस फीसदी का सवर्णो के आरक्षण का प्राविधान रखा गया इसमें जातिवार आर्थिक आधार पिछड़ेपन का पैमाना क्या होगा और किस जाति को कितना आरक्षण दिया जाये कैसे तय होगा।

दूसरा सवाल सबसे प्रमुख यह है कि आर्थिक पिछड़ेपन के जो प्रावधान विधेयक में रखे गये हैं कि ऐसे परिवार जिनकी सालाना आय 8.00 लाख रूपए या उससे कम है । मान लीजिये कि एक परिवार में एक व्यक्ति की सलाना आय 0 7.50 लाख रूपए है तो वह 20 प्रतिशत के आयकर के स्लैब में आयेगा और आयकर देता होगा तो क्या वह आर्थिक तौर से पिछड़ा। कहा जायेगा क्या उसके बच्चे सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण पाने के हकदार होगे क्योकि आयकर से छूट तभी तक है जब तक सालाना आय रू 2.50 लाख या उससे कम हो।

आर्थिक पिछड़ेपन के साथ-साथ यह भी देखना जरूरी हो जाता है कि क्या वे सामाजिक मुख्य धारा से बाहर हैं? तभी हम संविधान में परिभाषित आरक्षण की मूल भावना को सम्मान दे पायेगे। इसका इस विधेयक में उल्लेख नहीं है। मुसलमान, क्रिश्चियन, पारसी में जो सवर्ण हैं मसलन मुसलमानों में सैयद, -रु39योख, मुगल, पठान जो आर्थिक तौर पर पिछड़े हैं उनको क्या इसका लाभ मिलेगा यह सवाल अनुत्तरित है। साथ-साथ आगे यह प्रशन उठना भी लाजमी है कि ओ.बी.सी., एस. सी., एस.टी. जिनको क्रमश 27 फीसदी, 15 फीसदी एवं 7.5 फीसदी आरक्षण के हकदार हैं वो मांग कर सकते हैं कि अगर 15 प्रतिशत सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण तो 85 प्रतिशत आबादी को 90 प्रतिशयात आरक्षण क्यों नहीं। 10 प्रतिशत आरक्ष्ण किस सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर दिया गया ? जातिवार जनगणना के आंकड़े सरकार कब सार्वजनिक करेगी यह सब आगे आने वाले समय में आन्दोलन का सबब बनेगी ? आखिर मोदी सरकार 2019 के लोकसभा चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिये कौन सा गेम खेल रही है इसकी परिणति क्या होगी ? क्या यह मामला एक बार फिर से उच्चतम न्यायालय के सामने आयेगा। क्योकि उच्चतम न्यायालय की नौ जजो की बेन्च ने इंदिरा सहानी केस में साफ कहा है कि किसी नागरिक के पिछड़े होने का आधार आर्थिक नहीं हो सकता। दूसरा जाति को सम्मिलित या हटाने का अधिकार केवल उच्चतम न्यायालय को होगा । यह जो चाल मोदी सरकार ने खेली है अगड़ी जाति के मूल जनाधार को पकड़ के रखने का मात्र चुनावी हथकण्डा है असली दिक्कत यह क्या है समाज को जातिवादी बनाने की । हर जाति को आरक्षण का लालीपाप देकर हम किस तरह का समाज देना चाहते हैं। क्या हम संविधान की मूल भावना का अनादर तो नहीं कर रहे हैं कि हम समाज को आर्थिक तौर से बांट रहे हैं । मात्र वोट की राजनीति के लिये।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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