सियासत की आग में जल रहा कश्मीर

संक्षेप:

  • सियासत की आग में जल रहा कश्मीर
  •  पुलवामा हमला राष्ट्र  चेतना और स्वाभिमान पर था करारा अघात
  • सरकार सारे पहलुओं पर भविष्य में किस तरह की अपनाती है रणनीतियाँ ?

By: मदन मोहन शुक्ला

पुलवामा में सी.आर.पी.एफ. के जवानों पर हुआ हमला राष्ट्र की चेतना और साथ ही उसके स्वाभिमान पर करारा अघात था। लेकिन उसका सामना करने में हम एक राष्ट्र के रूप में वैसी परिपक्वता, एकजुटता और दृढ़ता नहीं प्रदर्शित कर सके। जबकि इसके इतर राजनीतिज्ञों में जो राजनीतिक क्षुद्रता और स्वार्थपरता झलकी जिसने पिछले दो तीन दशकों में अपनी जड़ें और गहरी कर ली हैं। जब देश शोक मग्न था तब राजनीतिक दलों को कैसे अपने राजनीतिक हितों की चिन्ता सता रही थी। यह उनकी रैलियों और सभाओं से प्रगट हुआ। सर्व दलीय बैठक होती है लेकिन उसमें प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति चिंतित करती है। पता लगता है कि वह किसी चुनावी रैली में थे।

जिस दिन यह घटना घटती है प्रधानमंत्री ने प्रक्रिया दी कि जैसे 130 करोड़ का खून खौल रहा है वैसा मेरा भी। लेकिन उन्होंने इस प्रतिक्रिया का क्या असर होगा इस पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया न उन्होंने यह कहने की जरूरत समझी कि धैर्य एवं संयम रखें। जैसे कि पूर्व में इस तरह की घटनाओं में सरकारों की तरफ से इस तरह की प्रतिक्रिया आती रही हैं। इस घटना के बाद जो माहौल बनाया गया पुलवामा का जिस तरह स राजनीतिकरण हुआ वह भी सत्ता धारियों द्वारा वह अत्यंत अफसोसजनक रहा। कैसे इन शहीदों के शवों के साथ मंत्रीगण सेल्फी ले रहे थे और गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य दे रहे थे जैसे अमित शाह कहते हैं कि आसाम को कश्मीर नहीं बनने देंगे। मेघालय के राज्यपाल ने कहा कि जितने कश्मीरी हैं अन्य दूसरे प्रदेशों में कार्यरत या पढ़ रहे हैं उनका बहिष्कार करके उनके प्रदेशों में वापस भेजा जाये। अफसोस होता है कि एक-दूसरे प्रदेश का गवर्नर जिसका इस मुद्दे से कोई लेना देना नहीं था संवैधानिक पद पर बैठा हुआ है वह इस तरह की बेतुकी बाते कर रहा है । इसका असर हुआ कि कश्मीरियों पर हमले शुरू हो गये । हरियाणा से 250, उत्तराखण्ड से 193 कश्मीरी विद्यार्थियों को उनके प्रदेश भेजा गया । जबकि दूसरी तरफ कश्मीर के गवर्नर ने कहा था कि ‘‘यह एक दुर्घटना है जिसमें सुरक्षा में चूक हुई’’ अब सवाल उठता है कि क्या देश को प्रतिक्रियावादी बनाया जा रहा है ? टी.वी. चैनलों के ऐंकर युद्ध का एलान करने में नहीं चूकते हैं । राजनीतिक सत्ता चुनौती व धमकी के शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकती कि ‘‘किसी को बख्शा नहीं जायेगा’’ राजनीतिक रैलियों में संवेदना व्यक्त की जाती शहीद परिवारों के साथ जिन्होंने अपना बेटा, अपना पति या अपना भाई खोया है । शहादत  इस देश के भीतर पनपाई गई भावना से जोड़ दी जाती है। कितनी बड़ी विडंबना है कि जिसे आमजन समझ नहीं पाता । ‘‘शहादत से गमगीन है देश, राजनीतिक सत्ता उस सियासत को पाने में मशगूल है।’’ राजनीतिक दल कोशिश में हैं इसको किस तरह कैश कराया जाए क्योंकि दो महीने बाद लोकसभा के चुनाव होने हैं। सत्ता के सामने चुनौती है कि पाकिस्तान को कैसे नहीं बख्शा जाएगा।

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याद आता है 1971 का पाकिस्तान से युद्ध जब इन्दिरा गाँधी ने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ से कहा हमला करो। मानकेशॅा ने कहा तैयारी नहीं है। इन्दिरा गाँधी ने पूछा कितना समय लगेगा। मानेकशॉ ने कहा कि छः महीने । मानकेशॅा ने युद्ध का समय जाड़े का चुना। उसके बाद युद्ध का क्या अंजाम हुआ वह किसी से छिपा नहीं है। पूर्वी पाकिस्तान अलग होता है और बंगलादेश का उदय होता है। लेकिन उस समय इस तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी जो आज दिख रही है कि नेस्तनाबूद कर देगे वगैरह वगैरह। भारतीय सेना की स्थिति और भारतीय जवानों की क्या स्थिति है। संसदीय समिति या रक्षा से संबंधित अन्य समितियों की क्या रिपोर्ट है?  एक संसंदीय समिति की रिपोर्ट अध्यक्ष खण्डूरी के नेतृत्व में आयी जिसमें बताया गया था कि 65 फीसदी रक्षा उपकरण पुराने और बेकार हैं इस रिपोर्ट को दबा दिया गया और खण्डूरी को उनके पद से हटा दिया गया फिर क्यों होड़ लगी है राष्ट्रवादी, देश भक्त बनने की और देश को युद्ध की तरफ ले जाने की ।

 दूसरी तरफ अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें वापस हो रही हैं इसका भारत में अवश्य असर होगा। जिहादियों का मनोबल इससे बढ़ेगा, वे खासतौर से भटके कश्मीरियों को इस तरह प्रोत्साहित कर सकते हैं कि अगर हम सोवियत यूनियन सुपर पावर अमेरिका को झुका सकते हैं तो भारत क्या है आओ एक जुट होकर कश्मीर की आजादी के लिए जिहाद छेड़ते हैं अगर ऐसा होता है तो यह बहुत ही सोचनीय होगा लेकिन पाकिस्तानी आतंकी एवं खुफिया ऐजेंसी आई.एस.आई. दोनों के लिए लाभदायक स्थिति होगी।

इसको कैसे काउन्टर करना होगा यह नीतिकारों को सोचना होगा। लेकिन एक सवाल उठता है कि जैसा कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने कहा था कि सुरक्षा में चूक हुई, तो क्यों? अगर सूचना पहले से थी तो खुफिया तन्त्र इस हमले को रोकने में नाकाम रहा तो इसके लिये जो दोषी हैं उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है? यह देश को जानने का पूरा हक है। लेकिन इस पर मीडिया चुप्पी साधे हुए है। राष्ट्रवादी-देश भक्त चैनल के ऐंकर क्यों नहीं सरकार से प्रधानमंत्री से सवाल पूछते हैं? बल्कि वे चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हैं पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देगें और पाकिस्तान बेशर्मी से कह रहा है इसका सबूत दो तो हम कार्यवाही करेंगे। उनको याद दिलाना होगा पूर्व में जो आतंकी हमले हुए उनके दिये गये सबूतों का क्या हुआ? यह पाकिस्तान की हटधर्मी है इसका उपाय युद्व न होकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करना और आर्थिक तौर से उसकी कमर तोड़ना एक विकल्प है। लेकिन इसमें हम सफल हो पायेंगे संदेह हैं क्योकि चीन से सउदी अरब से निरंतर इनको आर्थिक मदद मिल रही है। एक गौर करने वाली बात और है कि हम आज तक पाकिस्तान को अपने स्तर से आतंकी देश घोषित नहीं कर सके। तो फिर दूसरे से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं।

 इधर पौने पाँच साल में हालात बिगड़े हैं इस काल में सुरक्षा बल के करीब 500 जवान शहीद हुए केवल अस्सी जवान उत्तर प्रदेश से थे। सिविलियन की मौत का आँकड़ा गृह मंत्रालय का तो और चैकाने वाला है। अब सवाल उठता है कि क्या कश्मीर समस्या का अन्त संभव है? सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि घाटी के अशान्त होने का मुख्य कारण बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, विकास, आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय असंतुलन में नहीं है। कश्मीर में हमारी लड़ाई उस विषाक्त मानसिकता से है जिसमें घाटी के तमाम वाशिन्दे उस्मत बनाम काफिर-कु्फ्र के विषाक्त मकड़जाल में उलझे हए है। जम्मू-कश्मीर में पुलवामा सी.आर.पी.एफ. काफिले पर भीषण आतंकवादी हमले का दोषी आदिल आखिर क्यों मरने-मारने पर तैयार हो गया ?

 शाह फैसल जो 2009 के भारतीय प्रशासनिक सेवा के टापर रहे हैं और कश्मीर से आते हैं कश्मीर के हालात से कुपित होकर 2018 में अपने पद से इस्तीफा देकर राजनीति में आ गये हैं।  एक टी.वी. चैनल को दिये गये साक्षात्कार में उन्होंने अपनी भावनाये कुछ इस तरह व्यक्त की ‘‘कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार का न होना, वहाँ की सबसे बड़ी समस्या है। कश्मीर जल रहा है। 2018 में ही केवल 550 लोग मारे जा चुके हैं। आखिर वहाँ का युवा वह भी उच्च शिक्षा प्राप्त आतंकवाद की तरफ क्यों अग्रसरित हो रहा है?  इनके कारणों को खोजने की कभी कोशिश की गई। केन्द्र में बैठी सरकार हल केवल मिलिट्री स्ट्राईक में देखती हैं जबकि समस्या यहाँ राजनीतिक है। पाँच साल पहले कश्मीर में इतनी समस्या नहीं थी। स्थानीय, प्रदेशीय एवं केन्द्र स्तर पर राजनीतिक हितों ने स्थिति को और जटिल बनाया एवं बाहरी ताकतों को घुसपैठ करने का मौका दिया। पहले युवा अवसर ढूढ़ता था अब बात करने से कतराता है। प्रदेश से बाहर जो मुसलमानों को अलग-थलग करने की मुहिम चली उसमें भी असुरक्षा की भावना कश्मीरी युवकों में भरी। आज कश्मीर 78 लाख लोगों के जिन्दा दफन होने की कब्रगाह बन चुका है। आज जरूरत है राजनीतिक सौहार्द पैदा करने की, लोकतन्त्र बहाली की और वहाँ के भटके युवकों को मुख्य धारा में लाने की । जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की बहाली एवं कश्मीरी पंडित जो पिछले 23 साल से निर्वासित जीवन जी रहे हैं उनके घर वापसी की ।

पुलवामा हमले के बाद सबसे गंभीर बात यह है कि देश की न तो कोई कश्मीर नीति दिख रही और न ही पाकिस्तान संबंधी नीति। ऐसी कोई नीति शायद इसलिये भी नहीं बन पायी क्योंकि सरकारे आती जाती गई और वे अपने हिसाब से कश्मीर व पाकिस्तान संबंधी नीति में फेर बदल करती गई। नतीजा यह हुआ कि कोई स्पष्ट नीति नहीं बन सकी। यह स्थिति इसलिये भी बनी क्योंकि राजनीतिक दलों के लिये देश के दीर्घ कालिक हित पहली प्राथमिकता नहीं बन सके। एक समय अटल बिहारी बाजपेई ने कहा था कि दल बनेंगे बिगड़ेंगे, सरकारे आएगी जाएगी लेकिन यह देश रहना चाहिए लेकिन राजनीतिक दलों ने इसकी अनदेखी की। कायदे से कश्मीर को शान्त करने और पाकिस्तान में पनप रहे खतरे का सामना करने की कोई ठोस नीति तभी बन जानी चाहिये थी जब 1989 मे उसने वहाँ दखल देना शुरू किया था लेकिन ऐसा नही किया गया। निरंतर घटना घटती रहीं कश्मीर हाथ से निकलता गया पाकिस्तान मनमानी करता गया हम इस भ्रम में रहे कि पाकिस्तान को हम अन्तराष्ट्रीय मंच पर अकेला करने में सफल हो गये लेकिन यह हमारा भ्रम ही रहा।

कश्मीर समस्या के स्थाई समाधान में हमारी नीति विहीनता ही हमारी मुख्य बाधा रही। जब हम कश्मीर पर पाकिस्तान से वार्ता करते हैं तो आम कश्मीरी के मन में यह सवाल जीवित हो जाता है कि अभी समस्यायें मौजूद हैं और कश्मीर का भविष्य और उनकी राष्ट्रीयता अनीर्णित है। कश्मीर का विलय भारत में हो चुका है और यह हमारा अटूट अंश है तो पाकिस्तान से वार्ता आखिर किस लिये?  इन वार्ताओं की वजह से अलगाव वादी सोच यह उम्मीद करने लगती है कि कश्मीर की आजादी संभव है। नियंत्रण रेखा को अंतराष्ट्रीय सीमा मानने की नेहरू कालीन नीति का 1972 मे इंन्दिरा गाँधी और भुट्टो के शिमला समझौते के दौरान भी अलिखित तौर से स्वीकार्य किया गया था एक विजयी देश पराजित देश की तरह व्यवहार कर रहा था ।

हालांकि हमे यह नहीं भूलना चाहिये कि पाकिस्तान में वास्तव में कई पाकिस्तान हैं वहाँ की सरकार, सेना, आई.एस.आई. और आतंकवादियों के तमाम संगठनों के अलावा एक पाकिस्तान वहाँ की जनता का भी है जो भारत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखती है इसीलिये हमे पाकिस्तान की नापाक हरकतों का प्रतिउत्तर देने के लिये इसका बहुत ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान की अमन पसंद जनता का सकारात्मक दृष्टिकोण न खोए।      

अब देखना है कि सरकार राजनयिक, सैनिक, आतंकी, वैश्विक, आर्थिक, राजनीतिक और अन्य पहलुओं पर भविष्य में किस तरह की तात्कालिक, अल्पकालिक, दर्घकालिक रणनीतियाँ अपनाती है जिससे पाकिस्तान की रोज रोज की किच-किच से हमें निजात मिल सके और हम विकास एवं राष्ट्र निर्माण के काम में शान्ति से लग सके।

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