सांसद मात्र क्या अनमोल वस्तु बन कर रह गए?

संक्षेप:

  • देश में करीब 15 करोड़ युवक-युवतियां बेरोजगारी की यातना सहने को मजबूर
  • लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने से बर्बाद हो रहा भारतीयों का पैसा
  • देश के कल्याण और सुख समृद्धि के लिए सांसद एकजुट हो

By: मदन मोहन शुक्ला

गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी बीमारियों व सामाजिक कुरीतियों से जूझ रहा हमारा देश एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहाँ एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ पहाड़ हैं डगर कठिन है। अब समय आ गया है कि विकास की ऐसी नीति अपनाये जिससे जन सक्रियता सुनिश्चित हो और लोकहित के कर्त्तव्यों को पूरा करने के लिए ऐसा शासनतंत्र हो जिसमें जिम्मेदारी का भाव समाहित हो लेकिन अफ़सोस ऐसा कोई भाव हमारे माननीय सांसद नहीं ला पाये बस वो अपनी कमी का ठीकरा अपने विरोधियों पर फोड़ते हैं।

इस भाव को नाना जी देशमुख ने बहुत पहले पढ़ लिया था तभी तो 24 दिसम्बर 2004 के युवाओं को लिखें एक पत्र में कहा था स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमारा संघर्ष काफी यातनापूर्ण रहा। इसके लिए देश के करोड़ो नौजवानों ने अपने प्राणों की आहूति दी। परन्तु इस सबके बावजूद इसकी परिणीति खंडित भारत के रूप में हुई।

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आगे नानाजी लिखते है हमने संसदीय लोकतंत्र को चुना और मानव अधिकार के मूल तत्वों को अपने संविधान में शामिल किया । इसी संविधान ने केंद्र तथा राज्यों में विधायिका की व्यवस्था दी जो देशभर में एक संवेदनशील तथा उत्तरदायी शासन सुनिश्चित कर सकें। दुर्भाग्य से इसकी परिणीति एक ऐसे राजनीतिक नेतृत्व के रूप में हुई जिसने लोकतंत्र की मूल भावना से ही धोखा किया। यह राजशाही के संस्थानों की याद दिलाता है। स्थिति शायद उससे भी बुरी बनी है।

जिस देश में करीब 15 करोड़ युवक युवतियां बेरोजगारी की यातना सहने के लिए मजबूर हैं तथा एक तिहाई से ज्यादा देशवासी अत्यंत गरीबी से जूझ रहे है तथा वे अपने मूलभूत अधिकारों से भी वंचित हैं। नानाजी देशमुख लिखतें हैं वहीँ हमारे राजनीतिक नेतागण विशेषकर चुने हुए प्रतिनिधि अधिकाधिक धनवान बनते जा रहें हैं इसने निश्चित रूप से हमारें लोकतंत्र को मिट्टी में मिलाया है।

ए0डी0आर0 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2009 से 2019 के आम लोक सभा चुनाव के बीच करीब 30%करोड़पति सांसद बढ़े है जो 2009 में 58%थे वे बढ़कर 2019में 88% हो गए हैं जिनकी औसत संपत्ति 20 करोड़ से ऊपर है। इसी तरह 2009,2014 एवं 2019 चुनावों में आपराधिक छवि वाले सांसदों में 44%तक वृद्धि हुई। सांसदों द्वारा जो शपथ पत्र दाखिल किया गया इसमें 159 सांसद यानि 29%पर गंभीर आपराधिक मामले रेप एवं हत्या के दर्ज हैं। 543 में करीब 43%यानि 233 दागी सांसद जिसमें 116 बी0जे0पी0 से हैं। यही 2014 में दागी सांसद 34%यानि 10%की वृद्धि। इसमें महिला सांसद भी पीछे नहीं है 15%दागी तथा 36%करोड़पति है।

इन करोड़पति सांसदों जिनकी गुणवत्ता का पैमाना इनकी पैसा कमाने की हवस एवं आपराधिक छवि से लगा सकते हैं तो कैसे आशा कर सकते है कि वे संसद में बैठकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से करेंगे।

इनकी कारगुजारी की अगर बात करे तो 2018 के 14वें सेशन में लोकसभा की कार्यवाही को बाधित करने एवं वाहिरगमं में 1.98 अरब रु0 हम भारतवासियों के बर्बाद हो गए। इंडिया स्पेंड की गणना के अनुसार 192 करोड़ हाउस के संचालन एवं 6 करोड़ सांसदों की सैलरी एवं पर्क्स में।2012 में यू पी ए सरकार में रहे संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल के अनुसार प्रति मिनट संसद संचालन पर 250,000 खर्चा आता है। सांसदों की सुख सुविधा सैलरी पर्क्स आदि पर 2015-16 में करीब 1.77 अरब रु0 खर्च हुए थे । इकनोमिक सर्वे 2017-18 की एक रिपोर्ट के अनुसार। यहां सवाल उठता है हमारे सांसद इतनी सुख सुविधा एवं स्वयं में बिना किसी रोजगार के जनता की तथाकथित सेवा में ही, समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी  बढ़ जाती है जो समझ से परे है।

यहाँ सवाल उठता है  लोकसभा की कार्यवाही को बाधित करने बार-बार अद्जॉर्नमेंट से जो आयकरदाता भारतीयों का पैसा बर्बाद होता है उसकी भरपाई कैसे हो? केवल 2018 में ही 127 घंटे 45 मिनट कारवाही बाधित रही जिससे 198 करोड़ का नुकसान हुआ।

एक दुखद पहलु यह भी है कि 1954 में सांसदों के वेतन और भत्तों के लिए जो कानून बना उसमें 2018 तक 39 संशोधन  हो चुके हैं लेकिन इसकी वैधानिकता की कभी समीक्षा  नहीं की गयी।जिसका सीधा लाभ सांसदों को मिलता रहा । आम आदमी की समस्यायों और जनकल्याण से जुड़े मामले पर विभिन्न राजनीतिक दलों में  भले एक राय न बनती हो ,परन्तु यह एक ऐसा विषय है जिस पर सारे दल एक सुर में बोलते हैं इससे गन्दा मजाक लोकतंत्र के साथ और क्या हो सकता है?

यह न केवल आर्थिक व्यवहार के नियमों का उल्लंघन है बल्कि प्रशासनिक विधान की भी अवहेलना है। ऐसा नानाजी देशमुख जी का मानना है आगे लिखतें है किसी भी ऐसी आवश्यकता जिसके लिए सरकारी ख़जाने से धन आता हो ,उसकी जाँच और अनुमति का काम ऐसी इकाई को करना चाहिए जिस पर इन निर्णेयों का सीधा प्रभाव न पड़ता हो। संसदीय लोकतंत्र के अपहरण की इतनी घिनोनी मिसाल शायद ही कहीं मिलेगी।

नाना जी देशमुख मानते थे साठ के दशक में भारत सरकार ने प्रिवी पर्स को औचित्यहीन मानते हुए बंद कर दिया था। आज सांसदों पूर्व सांसदों,पूर्व प्रधाममंत्री,पूर्व राष्ट्रपति,पूर्व उपराष्ट्रपति को मिलने वाली सुख सुविधा भत्ते प्रिवी पर्स का नया अवतार है। इस सन्दर्भ में 2018 में दायर जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में दी गई दलीलों को ना मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी जबकि समीक्षा ज़रूरी है। क्या यहाँ देखना जरूरी है कि संविधान की धारा (आर्टिकल) 14 ( राईट टू इक्वलिटी )का उल्लंघन है। इस संदर्भ में कुछ सुझाव जिसकी समीक्षा होनी चाहिए ।

सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि राजनीति कोई नौकरी या रोजगार नहीं है बल्कि नि:शुल्क सेवा है। एक दुखद पहलु यह भी है एक सरकारी नौकर करीब 34-35 साल के बाद सेवानिर्वती के बाद पेंशन पाता है।  यह सुविधा भी 2005 से खत्म कर दी गयी लेकिन सांसदों विधायकों को यह सुविधा निरंतर जारी है। एक सांसद अगर पहले पार्षद फिर विधायक रहा तो उसे पेंशन तीन जगह से मिलेगी यह जनता के साथ विश्वास घात है।

संसद में सेवा करना एक सम्मान है जहाँ जनहित और जनकल्याण से सम्बंधित मुद्दों पर ठोस नीति बने उन पर अमल हो। देश के कल्याण और सुख समृद्धि के लिए सांसद एक जुट हो। आम जनता जो गरीबी ,भुखमरी,स्वास्थ्य सेवायों से वंचित है उनके दर्द का निराकरण करे न कि खुद लूट -खसूट में शामिल हो जाये यह लोकतंत्र की गरिमा को धूमिल ही करेगा।

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