रामलला आएंगे रामराज्य लाएंगे

संक्षेप:

  • 17 नवंबर से पहले कभी भी आ सकता है अयोध्या पर फैसला
  • हिंदुओं द्वारा सन् 1528 तक की जा रही थी अयोध्या में पूजा
  • बाबर और उसकी सेना ने मीर बकी के नेतृत्व में किया था आक्रमण

By: मदन मोहन शुक्ला

आखिर हम लोग उस स्वर्णिम घड़ी जिसका इंतज़ार पिछले 491 सालों से कर रहे थे वो करीब है ,130 करोड़ भारतीय जनता के साथ-साथ  पूरे विश्व की नज़र सुप्रीम कोर्ट के आने वाले उस जजमेंट पर टिकी है जो मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और उनकी बेंच द्वारा नवंबर के दूसरे सप्ताह में 17 नवंबर से पहले कभी भी आ सकता है। जिसमें अयोध्या के विवादित स्थल रामजन्म भूमि -बाबरी मस्जिद पर निर्णय आना है।  अयोध्या में रामजन्म भूमि की महत्ता हिंदुओ की लिए वही है जो क्रिश्चियन के लिए रोम में वैटिकन सिटी ,यहूदियों के लिए जेरुसलम, मुस्लिम के लिए मक्का।

हिंदुओं द्वारा यहां पूजा 1528 तक की जा रही थी लेकिन वो मनहूस घड़ी जब बाबर और उसकी सेना ने मीर बकी के नेतृत्व में यहां आक्रमण किया तथा एक भीषण युद्ध जो रामजन्म स्थान मंदिर के इर्द गिर्द लड़ा गया इसमें राजा मेहताब सिंह और पंडित रामदीन की हार होती है।बाबर की सेना ने मंदिर को तोड़कर इसी के मलबे से मस्जिद का निर्माण रामजन्म स्थान पर कराया था। इसीलिए इसका नाम रखा गया "जन्मस्थान मस्जिद` जो आगे चलकर बाबरी मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन भगवान राम बेघर हो गए। बाबर की सेना द्वारा की गयी बर्बरता से हिंदुओं की भावना इस कदर आहत हुई कि हिंदुओं ने प्रण किया जब तक राम लला के स्थान को वापस नहीं लेंगे तब तक लड़ते रहेंगे। वही लड़ाई आज तक जारी है जिसमे दोनों पक्षों से हज़ारों लोग मारे गए। लेकिन सवाल आज भी अनुत्तरित है कि यह मुद्दा स्थानीय था इसको राजनीतिक मुद्दा बनाकर धार्मिकता का रंग दिया गया, राजनीतिक दलों ने सियासी जंग को हवा दी और समाज को दो समूह में बांट कर साम्प्रदायिकता की जड़ों को और मजबूत किया । इसकी आड़ में विभिन्न राजनीतिक दलों ने सियासी जंग तेज़ कर दी थी। 1949 में जब हिंदुओं ने कथित तौर पर मूर्ति स्थापित की,सरकार ने ताला लगवाया।

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सोमनाथ मंदिर पर भी सुल्तान ग़ज़नवी द्वारा बार-बार आक्रमण किया गया मंदिर को लूटा गया क्षतिग्रस्त किया गया, प्रिंस मोहम्मद आजम ने अन्तोगत्वा इसको पूरी तरह से गिरा कर 1706 में मुग़ल बादशाह औरंगजेब के आदेश से वहां एक छोटे मस्जिद का निर्माण कराया।(Ref:-Bombay gazetteer,vol XXII-P292)।

अगर देखा जाए तो सोमनाथ और रामजन्म स्थान (अयोध्या )पर आक्रमण में समानता है। दोनों जगह संरचना को गिराकर मस्जिद का निर्माण हुआ। देश के आजाद होने के बाद भारत सरकार ने सोमनाथ मंदिर को दोबारा बनाने का निर्णय लिया, इससे लाखों हिंदुओं की आस जगी की अयोध्या में भगवान राम का मंदिर अब  बन जाएगा लेकिन उनकी आशाओं पर पंडित नेहरू ने पानी फेर दिया ,यह कहकर इससे दूसरे सम्प्रदाय की भावना आहत होगी। यह कृत्य मूल धरमनिर्पेक्षता की प्रासंगिकता को आहत करेगा तथा यह संदेश दुनिया के सामने जायगा की हिंदुत्व को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे लाखों हिंदुओंकी भावना आहत हुई।

फ़िलहाल 1986 में कोर्ट  विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश देता है। यहीं से राजनीतिक सरगर्मी में तेज़ी आती है। 1989 में विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर का शिलान्यास किया। 25 सितंबर 1990 लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा (सोमनाथ से अयोध्या )हिंदुत्व का उभरता चेहरा यहीं से भाजपा ने कदम बढ़ाया हिंदुओं को एक मंच पर लाने का, जब बिहार में रथ यात्रा रोकी गयी गिरफ्तारी हुई।

30 अक्टूबर1990 अयोध्या में पहली बार कारसेवा हुई कारसेवकों ने मंदिर पर चढ़कर झंडा फहराया । इसके बाद मुलायम सरकार द्वारा पुलिस फायरिंग का आदेश 5 कारसेवकों की मौत। जिसका परिणाम हुआ 1991 में हुए चुनाव में मुलायम चुनाव हार गए। सरकार भाजपा की बनी और वही हुआ जिसका अंदेशा था  6 दिसंबर 1992 बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी।

यदि राजनीतिक इच्छा शक्ति होती तो अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को बचाया जा सकता था। यह दावा उस समय केंद्रीय गृह सचिव रहे माधव गोडबोले ने किया। साथ ही कहा, तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इस घटना से पहले गृह मंत्रालय द्वारा तैयार समग्र आकस्मिक योजना खारिज़ नहीं की होती, तो ढांचे को बचा लिया गया होता ।

अपनी नई पुस्तक `द बाबरी मस्जिद-राममंदिर डाइलेमा:एन एसिड टेस्ट फ़ॉर इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन `,इस पुस्तक में उन्होंने कहा कि नरसिम्हा राव के अलावा ,पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और वी पी सिंह भी समय पर कार्यवाही करने में नाकाम रहे। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में विवाद के हल के लिए कुछ व्यावहारिक समाधान सुझाए गए थे लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने कहा- सबसे बड़ा दोष राज्य सरकार का था, जो ढांचे की सुरक्षा के अपने वादें को पूरा करने में जान बूझकर विफल रही। उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल बी सत्यनारायण रेड्डी को भी ज़िम्मेदार ठहराया ।

ठीक 27 साल बाद 491 साल पुराना मुद्दा अंजाम की तरफ बढ़ गया है जब उम्मीद है बेघर भगवान राम को उनका आवास मिलेगा। भारतीय राजनीति और राजनीतिक दलों में तूफान के पहले शांति गहरा गयी है। भाजपा जिनकी सरकार केंद्र और प्रदेश दोनों जगह है, उनकी चिंता वर्डिक्ट आने के बाद आने वाली कानून व्यस्था को चाक चौबंद करने और इसको अधिक से अधिक कैश कराने की होगी क्योंकि नवंबर में झारखंड में चुनाव की तिथि घोषित हो गयी है, इसके बाद बिहार, दिल्ली,उत्तरप्रदेश फिर बंगाल में चुनाव होने हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया योगी जी ने अयोध्या में राम की विराट प्रतिमा के लिए 447 करोड़ का भारी भरकम बजट का आवंटन कर दिया है। भव्य मंदिर के लिए तो बजट असीमित है।

अब सवाल उठता है इस समय देश जिन आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा है देश में मूल समस्याएं मुँह बाएं खड़ी हैं। देश आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ गया है, अर्थशास्त्री तो यहां तक कह रहें अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देश की वही हालात होगी जो अर्जेंटीना और ब्राज़ील की हुई है। रिज़र्व बैंक से सरकार ने 1.75 लाख करोड़ जो मुद्रा ली उसको शुभ संकेत नहीं मानते । इस पर भी मोदी जी का दावा 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो जायेगी । योगी जी का दावा 2022 तक उत्तर प्रदेश 1ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा लेकिन किसी ने कोई रोड मैप नहीं दिया। अगर मान लिया जाय मंदिर के पक्ष में निर्णय आता है तो भगवान राम के प्रताप से क्या सारी समस्यायों का हल हो जाएगा और राम राज्य जिसकी कल्पना गांधी ने की थी वो साकार हो जाएगा? अवश्य कुछ राजनीतिज्ञों,जिनकी दुकान इसी मुद्दें को हवा देकर राजनीतिक हित्त साधने की रही थी उस पर ताला लग जायेगा। फिलहाल इस मुद्दें के समाधान से भाजपा को भी राजनीतिक नुकसान होगा क्योंकि जो मंदिर का मुद्दा हर चुनाव में शीर्ष पर होता था जिसको सबसे ज्यादा भाजपा ने कैश कराया जिसका आज परिणाम है कि इनकी केंद्र के साथ साथ 16 राज्यों में सरकार है। मर्यादा पुरूषोत्तम राम अर्थात वो मनुष्य जो मर्यादा बना सकता, भगवान राम उसकी अंतिम सीमा थी। वो पुरुष भी उत्तम थे और उनकी मर्यादा भी उत्तम थी आदर्श आज्ञाकारी पुत्र,आदर्श भाई-भ्रात प्रेम, आदर्श पति । इसके साथ साथ आदर्श राजा भी थे। श्री राम ने राजा का जो आदर्श प्रस्तुत किया उसे आज तक कोई भूला नहीं सकता। रामराज्य में कोई चोर नहीं ,कोई व्यभिचारी नहीं,कोई भ्रष्टाचारी नहीं था।किसी प्रकार का कष्ट-क्लेश रामराज्य में नहीं था।

योगी जी हों या मोदी जी या हर दल का राजनेता क्या उनमें इतना नैतिक बल है। राम के आदर्शों पर चलते हुए (जिसकी वो दुहाई देते हैं)पार्टी के अंदर जो गंदगी है उसका शुद्धिकरण करें। क्योंकि भाजपा के लिए कहा जाता है यह वो गंगा है जिसमें जो भी डुबकी लगाता है वो शुद्ध हो जाता है लेकिन इतनी गंदगी इस दल में समा गई है कि अगर मोदी जी रामराज्य की कल्पना कर रहे हैं तो यह मुंगेरी लाल के हसीन सपनों से ज्यादा कुछ नहीं है। क्योंकि रामराज्य से इतर गंदगी समाज में -चोरी, व्यभिचार, भ्रष्टाचार इस गहराई तक जड़े जमा चुकी है,और तो और इन बुराइयों से हमारी विधानसभा,संसद और उसमें बैठने वाले माननीय भी अछूते नहीं है। यह तो अपराध और भ्रष्टाचार की एक खुद नर्सरी हैं।

तो सवाल उठता है आज के राजनेताओं का इतना मजबूत मनोबल है कि वे भगवान राम का पवित्र और आदर्श जीवन और मर्यादाओं का पालन करते हुए अपने जीवन, अपने परिवार और अपने देश को सुखी और शांतिमय बनाए। अफ़सोस जो देश की राजनीतिक पृष्ठभूमि है और पिछले कुछ सालों में साम्प्रदायिकता को जिस तरह हवा दी गयी, आमजन की आवाज़ को दबाया गया। विरोधियों को एक-एक कर निष्क्रय किया गया । संस्थाओं को जिस तरह से अपने हित्त में मोहरा बनाया गया। यहां तक कि न्यापालिका को भी सत्तानासिनों ने राजनीतिक हित के लिए नहीं बख्शा। उनसे रामराज्य की कल्पना एक राजनीतिक स्टंट के सिवाय कुछ नहीं है।

सार केवल यही है नेताओं के कोरे वादे में उलझता बेचारा वोटर, कलुषित राजनीति में आशा की किरण रामराज्य के रूप देखता हुआ कि राम लला आएंगे रामराज्य लाएंगे।

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