SP को मुस्लिम वोट बैंक संजोने की चिंता, क्या मायावती के फॉर्मूले को फेल कर पाएंगे अखिलेश?

संक्षेप:

  • लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) को मुस्लिम वोट बैंक को संजोए रखने की चिंता सता रही है
  • पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब इस कवायद में जुटे हैं कि कैसे अपने इस परंपरागत वोट बैंक को संभाला जाए
  • अखिलेश की तैयारी है पार्टी संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ ही अल्पसंख्यकों की समस्याओं को लेकर आंदोलन चलाने की

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) को मुस्लिम वोट बैंक को संजोए रखने की चिंता सता रही है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब इस कवायद में जुटे हैं कि कैसे अपने इस परंपरागत वोट बैंक को संभाला जाए.

ये बन रही है रणनीति
अखिलेश की तैयारी है पार्टी संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ ही अल्पसंख्यकों की समस्याओं को लेकर आंदोलन चलाने की. विधानमंडल के मॉनसून सत्र के बाद चलाए जाने वाले इस अभियान में अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और किसानों पर ही केंद्रित रहने की रणनीति बन रही है.

उपचुनाव के लिए सीटवार समीक्षा
सूत्र बताते हैं कि प्रदेश की जिन 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से केवल एक रामपुर ही सपा के कब्जे में है. ऐसे में रामपुर पर कब्जा बरकरार रखने के साथ समाजवादी अन्य सीटों पर भी बेहतर प्रदर्शन चाहती है. इसके सपा मुखिया अखिलेश यादव विदेश से लौटने के बाद लगातार कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे हैं. उपचुनाव के लिए सीटवार समीक्षा भी कर रहे हैं.राजनीतिक विश्लेषक राजकुमार सिंह ने बताया कि बसपा मुखिया मायावती ने जिस तरह लोकसभा में ज्यादा सीटें जीती हैं. मायावती की रणनीति है दलित और मुस्लिम को एकत्रित किया जाए. मुस्लिमों को लगता है कि अखिलेश के साथ जुड़ने से सिर्फ यादव वोट बैंक के साथ जुड़ते थे. अगर मायावती के साथ जुड़ेंगे तो दलित और मुस्लिम का अच्छा गठजोड़ होगा. उससे अखिलेश का मुस्लिम वोट बैंक प्रभावित होगा. अखिलेश के सामने बसपा से मुस्लिम वोट बचाए रखने की चुनौती है. अखिलेश के पास मुस्लिम की कोई बड़ी आवाज भी नहीं बची है. आजम हैं भी तो वह अपने ढंग से काम करते हैं

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