पांच ट्रिलियन डॉलर का ख़्वाब मोदी का क्या पूरा होगा?

संक्षेप:

  • केंद्र सरकार ने पूरे किए 100 दिन
  • 15 नवंबर तक राम मंदिर पर आ जायेगा फैसला
  • वर्ल्ड बैंक यहां हो रहे आर्थिक सुधारों से असंतुष्ट

By: मदन मोहन शुक्ला

अभी हाल में केंद्र सरकार ने 100 दिन और योगी की सरकार ने उत्तर प्रदेश में दो साल 6 महीने  पूरे किए और इसको जश्न के तौर पर लिया गया । मानो मोदी और योगी सरकार ने कुछ ऐसा कर दिया हो अब बस रामराज्य आ ही गया और मर्यादा पुरुषोत्तम राम पृथ्वी पर अवतरित हो गये हों। शायद यह सपना मूर्त रूप न ले लें क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्टूबर तक राम जन्मभूमि से संबंधित बहस को पूरा करने का आदेश दोनों पक्षों को दिया है लिहाज़ा उम्मीद की जाती है 15 नवंबर तक इस पर फैसला आ जायेगा, क्योंकि मुख्य न्यायधीश 17 नवंबर को सेवा निर्वत हो रहे हैं।अगर मान लीजिये मंदिर के पक्ष में फैसला आता है तो फिर सारा देश ऐसे जश्न में डूबेगा और भूल जायगा अपनी बेरोज़गारी, पैसे की तंगी, दो जून रोटी के जुगाड़ कि कश्मकश और सबसे शीर्ष पर 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था  2024 तक कैसे होगी ?जहां सरकार के पास पैसा नहीं ,उद्योगों में उत्पादन नहीं ,उपभोक्ता के पास  समान खरीदने के लिए पैसा नहीं है।लेकिन हमारे राजनेता 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था के घोड़े पर सवार हो कर दिन में भोली भाली जनता को सपने दिखा रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ जी विश्वास से लबरेज़ हैं अगले 30 महीनों में 1ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के बिंदु को छू लेंगे ऐसा वो दावा कर रहे हैं। सी एम बोले अब सुशासन,विकास और विश्वास प्रदेश की पहचान होगी। शुभ कामना योगी आदित्यनाथ जी ।

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केंद्र सरकार के 100 दिन का मूल्यांकन विपक्ष के आईने से  अन्याय,अस्तव्यस्तता, संक्रीन राजनीति,अराजकता एवं उपद्रव का  रहा।अनुच्छेद 370 का हटना बीजेपी एक क्रांतिकारी कदम मान रही जबकि उससे उपजी स्थिति को विपक्ष विस्फोटक अराजक मान रहा है।
एन आर सी असम में लागू हो गया 20 लाख का भविष्य अनिश्चित। संस्थानों को कमजोर एक रणनीति के तहत किया जा रहा है। संघीय ढांचे पर हमला जो संविधान की आत्मा है।जिसकी आशंका प्रेम शंकर झा ने अपने एक लेख में की  है। आर टी आई को कमजोर किया जा रहा है।पिछले 100 दिनों में ढहती अर्थव्यवस्था लुढ़कता शेयर बाजार, 14लाख करोड़ रु0 निवेशको के डूब चुकें हैं। यू ए पी(अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट)किसी को शक के आधार पर आतंकवादी घोषित किया जा सकता है।

सरकार इसका प्रयोग अपने विरोधियों की  आवाज़ दबाने के लिए कर सकती है। तीन तलाक जो एक सिविल एक्ट था उसको क्रिमिनल एक्ट में बदला गया।जिसका मुस्लिम संघटन विरोध कर रहे हैं ।तलाक की प्रक्रिया में कोई कमी नहीं कोई भय नहीं दिख रहा।बीजेपी इसको बड़ी उपलब्धि के तौर पर देख रही है उसकी नज़र अब अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के नवंबर में आने वाले निर्णय पर टिकी है। देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था पर सरकार की पेशानी पर अब बल  दिख रहे है कदम भी उठा रही है लेकिन स्थिति आंकड़ों के झरोखे से विचलित करने वाली है। विश्व मे अर्थव्यवस्था की सेहत के लिहाज से 2017-18 में 2.85 ट्रिलियन डॉलर के साथ 5वी रैंकिंग थी जो आज 2.58 ट्रिलियन डॉलर के साथ 7वे पायदान पर फ्रांस के नीचे आ गयी है।

इन सबके बीच सबसे चौकाने वाली बात यह है कि पलायन उल्टी दिशा में हो रहा है पहले पलायन जो गांव से शहर की तरफ होता था वो शहर से गांव की तरफ हो रहा है क्योंकि शहर में नौकरी नही।अनिश्चितता ,असमंजस का माहौल होने से उद्योग में कोई पैसा नही लगा रहा।सरकार इससे निपटने के उपाय भी कर रही है विदेशी निवेश पर सरचार्ज में कटौती,बैंकों का विलयन और 70,000 करोड़ का पैकेज ,इंफ्रास्ट्रक्चर को 20,000 करोड़ और रियल इस्टेट को 58,000 करोड़ का पैकेज।

एंजेल टैक्स वापस ले लिया,जी एस टी का और सरलीकरण किया जा रहा है,कई वस्तुओं पर जी एस टी की दर घटाई गई, कॉर्पोरेट टैक्स की दर घटाकर 22% की गई।हालांकि सेस आदि को मिलाकर प्रभावी दर 25.17% होगी।15% नई घरेलू कंपनियों के लिए टैक्स की नई दरें प्रभावी दर 17.01%(सेस एवं अन्य करो के साथ),जुलाई,2019 तक शेयर बायबैक की घोषणा कर चुकी कंपनियों पर नही लगेगा बाय बैक टैक्स।कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती से सरकार को करीब 1.45 लाख करोड़ राजस्व का नुकसान होगा जिसकी भरपाई कहाँ से होगी इसका कही जिक्र नहीं।जो भी रिफार्म सरकार कर रही है उसमें तथ्यों को छुपाने की प्रवृति जन्म ले रही है।

वर्ल्ड बैंक यहां हो रहे आर्थिक सुधारों से असंतुष्ट है वो कह रहा है आपको विकासशील देशों की श्रेणी में न रखकर नीचे श्रीलंका के समानांतर रखेंगे।अर्थशास्त्री भारत को नामीबिया के समकक्ष मान रहे हैं।मोदी मोरल पॉलिटिक्स की बात करते है लेकिन जो उनकी योजना है वो अपने नफे नुकसान की कसौटी पर प्रदेश वार परख कर लागू की जाती है।किसानों को लेकर सरकार चिंतित है होना भी चाहिए।क्योंकि करीब 25 करोड़ बड़े और मज़होले किसान है इनके साथ मज़दूरों को भी मिला लिया जाए तो यह संख्या बढ़ कर 60 करोड़ हो जाती है।5ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को लेकर अर्थशास्त्री और सरकारी हलकों में चर्चा तो बहुत हो रही है लेकिन क्या हमने जानने की कोशिश की कि खेत का किसान उसे कैसे और क्या समझ रहा है।उसकी ज़रूरते क्या हैं?प्रभावी नीति बनाने के लिए नज़रिया बदलना होगा।

किसानों को लेकर सरकार की चिंता जायज़ है क्योंकि वो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।वो अगर खुशहाल है तो देश खुशहाल है इसीलिए  किसानों को लेकर ढेरों योजनाए चलाई जा रहीं हैं  जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना,पशुधन विपरण योजना, किसान क्रेडिट योजना,फ़सल बीमा योजना,किसानो को खेती का उचित मूल्य मिले इसके लिए मूल्य नीति समय समय पर संशोधित करती है।इसके अलावा बागवानी ,सिचाई,मिट्टी के स्वाथ्य को लेकर भी योजनाए है।इसके लिए बजट भी भारी भरकम होता है।

2014 के बजट में 1000 करोड़ एग्रो इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए था,200करोड़ कृषि विश्वविद्यालय ,मिट्टी परीक्षण के लिए भी बजट आवंटित है।5लाख करोड़ का बजट जो 2018-19 की तुलना में78% ज्यादा है।लेकिन ज़मीनी हक़ीकत इससे इतर है सरकार किस तरह बातों को छुपा रही है और आंकड़ो के साथ भ्रमित कर रही है।किसानों के लिए एक नई योजना जिसके तहत मज़होले किसानों को प्रति वर्ष 6000 रु अनुदान दिया जाएगा जो हर 4 महीने में 2000 के हिसाब से उनके खातें में जायेगा।कुल 14 करोड़ किसानों में 12करोड़ 50लाख किसान लघु कृषि में संलग्न ।इनमें से 7करोड़ 22लाख 419 किसान चिन्हित किये गए जिनको इस योजना का लाभ मिलना था इसमें से 6करोड़ 47 लाख को पहली किस्त का भुगतान हुआ केवल 63लाख 10हज़ार को लाभ नही मिला कारण सरकार जाने।दूसरी क़िस्त 6करोड़ को तीसरी क़िस्त  केवल 3करोड़ 83लाख को जिसमें गुजरात को सबसे ज्यादा हिस्सा 94लाख मिला।

वहीं वेस्ट बंगाल को एक पैसा नहीं मिला।किस तरह मोदी सरकार योजनाओं में भी नफ़ा नुकसान देखतें हुए उन्हीं प्रदेशों को लाभ दे रही जहां उनकी सरकारें है या जो सरकारें उनके मुताबिक काम कर रहीं हैं।संघीय ढाँचे को किस तरह चोट पहुचाई जा रही है।छत्तीसगढ़ के हिस्से 11लाख किसानों में लाभ मिला केवल1लाख,12हज़ार किसानों को पहली किस्त मिली ,दूसरी 23000किसानों को मिली तीसरी क़िस्त किसी को नहीं मिली।मध्य-प्रदेश में 32लाख किसान में लाभ मिला केवल 9लाख को,तीसरी क़िस्त किसी को नही मिली।दिल्ली के 10हज़ार600 किसान में से किसी को लाभ नही मिला।गुजरात 45लाख,37लाख और 14लाख लाभर्ती हुए।

उत्तरप्रदेश 1.70करोड़  में से 1. 58करोड़ ,8लाख,तीसरी क़िस्त का लाभ एक  को भी नहीं मिला। पहली किस्त का बजट 75000 करोड़ ,दूसरी क़िस्त का बजट 25000 करोड़ तीसरी क़िस्त का बजट नही आया कारण जो सरकार ने दिया कि किसानों की लिस्ट नहीं आई या पैसा नहीं, इसलिए दे नही पा रहें।अर्थशास्त्री का मानना है कि ग्रामीण भारत को ठीक करिये कुटीर उद्योग का कांसेप्ट गांधी जी का कितना कारगर हो सकता है आज की परिस्थिति में अगर सरकार इस पर अमल करें इससे लोगों को रोजगार तो मिलेगा ही साथ साथ लोगों में क्रय करने की क्षमता भी बढ़ेगी।

सरकार की एक और योजना मनरेगा के तहत लोगों को रोज़गार देना जिसमे 25 करोड़ लोग पंजीकृत हैं ,जॉब कार्ड 12करोड़ के पास ,रोजगार जो मिला केवल 45 लाख को 100 दिन के लिए ।भुगतान केवल 37 से 38% ही हुआ।आज केवल 30% ही भुगतान हो पा रहा है।

एसेट मैनेजमेंट म्यूचअल फण्ड डेब्ट 2013-14 मनमोहनसिंह सिंह सरकार के समय 7लाख 13 हज़ार करोड़,आज 13लाख22हज़ार करोड़ हो गया,इसी तरह कॉरपोरेट डेब्ट मार्केट 14लाख 40 हज़ार करोड़ आज 30 लाख 60हज़ार करोड़ पहुंच गया ।इसका मतलब ट्रेडिंग कम हुई।

इससे ज्यादा त्रास्दी दायक है उद्योगपति अपना व्यापार समेट कर देश छोड़ रहें हैं।पहले मज़दूर बाहर जाते थे जिन्हें गिरमिटिया कहा जाता था।लेकिन आज रईस देश छोड़ रहे है उनका कहना है यहां भविष्य अनिश्चित है क्योंकि वो नही जानता कल क्या होगा?बीते डेढ़ दो सालों में हर महीने 1लाख 14 हज़ार करोड़ रु इस देश से बाहर जा रहा है।मनमोहन सरकार जा रही थी मोदी सरकार आ रही थी उस समय 1लाख 32 हज़ार करोड़ बाहर गया,2015-16में 4.60 lakh crore,2016-17 8.17लाख करोड़,2017-18 11.33 लाख करोड़,2018-19 में 13.78 लाख करोड़ देश से बाहर चला गया।

इस साल शुरुआती चार महीनों अप्रैल, मई,जून,और जुलाई में ही 5.80लाख करोड़ देश से बाहर चला गया।इसके पीछे जो कारण थे यहां का टैक्स स्ट्रक्चर ,दूसरा देश मे अनिश्चितता, सामाजिक वैमनस्यता और सरकार का संदेहास्पद रवैया ,इन्फोर्समेंट डिपार्टमेंट, आयकर डिपार्टमेंट सेबी,आर बी आई ,आई बी बिज़नेस कम्युनिटी में यह मैसेज दे रही है कि आप कर चोरी के राडार पर हैं और बेवजह नोटिस भेजना ,रेड डालना आदि-आदि बाध्य कर रहा है पलायन को।लेकिन सरकार फौरी राहत दे रही है लेकिन असर आना बाकी है।

पलायन जिन देशों में हो रहा है वो देश हैं दुबई,अमेरिका,ब्रिटेन, कनाडा,स्पेन और पुर्तगाल जहां व्यापार करना आसान है।आर बी आई की एक रिपोर्ट के अनुसार 2010-14 में जब मनमोहन सरकार थी तब 129 मिलियन डॉलर देश से बाहर अपने सगे संबंधी को भेजा गया वही यह रकम 2014-19 के बीच 992 मिलियन डॉलर पहुँच गयी।इसी तरह इसी काल मे 14 बिलियन डॉलर पर्यटन पर,10बिलियन डॉलर करीब 2लाख करोड़ शिक्षा पर,10.50 बिलियन डॉलर विदेश में अपने संबंधियों को भेजा गया,4.8बिलियन डॉलर उपहार के तौर पर और करीब 1.98 बिलियन डॉलर विदेश में कर्ज चुकाने के लिए शिफ्ट किया ।इसमें छोटे बिज़नेस मैन ,इंट्रप्रेनेउर शिफ्ट कर रहे है।एल आर एस के तहत 2.5लाख करोड़ तक शिफ्ट कर सकते हैं बिज़नेस, एम्प्लॉयमेंट,इमीग्रेशन आदि के लिए।

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि पिछले 6 महीने में अमेरिका में ई बी5 वीजा पाने के लिए इतने ज्यादा भारतीय प्राथी हो गए हैं कि अमेरिकी सरकार ने रेजिडेंट सिटीजनशिप के दस्तावेज़ को तैयार करने की जो पहले फ़ीस 5लाख डॉलर यानी 3.75 करोड़ रु थी बढ़ा कर 9लाख डॉलर यानि 6.47 करोड़ कर दी है। लोग इतनी  फीस भी देने को तैयार हैं।इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जो सरकार अच्छे दिन का सपने दिखा रही है वो मात्र मरीचिका है।कंपनियां कोई नया निवेश नहीं कर रहीं पिछले दो तिमाही में निवेश की जो ग्रोथ है सबसे निम्तम स्तर पर 3.8%  है।यही मनमोहनसिंह के काल मे 2012 में 9.58% इन्वेस्टमेंट ग्रोथ थी।ऐसा नही कि मोदी काल मे ग्रोथ रेट निम्नतम स्तर पर रही है ।2016 में ग्रोथ रेट 16% रही।

इसी तरह चुनाव से ठीक पहले ग्रोथ रेट 12.5% रही थी लेकिन आज केवल 4.04% रह गईं है।यह रिपोर्ट सेंट्रल फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की है। इसने अपनी जांच में पाया कि इसकी सबसे बड़ी वजह बैलेंस शीट की समस्या नही है,समस्या इकनोमिक अंसरटैनिटी है।सरकार ने अपने को ब्रोकर की स्थिति में ला खड़ा किया है।उसे पैसा चाहिए।आर बी आई कि एक रिपोर्ट के आंकड़े चौकाने वाले है ।सोने के अंडे देने वाली सार्वजनिक उपक्रम पर मार्च 2014 में कर्ज़ 4.38 लाख करोड़ था जो  आज बढ़ कर 6.15 लाख करोड़ पहुंच गया है ।यह केवल 10 बड़ी कंपनियों का कर्ज है जिसमे एन टी पी सी,एच ए एल ,गेल, कोल् इंडिया,ओ एन जी सी, भेल आदि।10 कंपनियों का जो शुध्द कर्ज 2014 में 2.65 लाख करोड़ था वो आज 2019 में बढ़ कर 5.33 लाख करोड़ हो गया।2014 में ओं एन जी सी पर कर्ज 49हज़ार करोड़ था जो आज 2019 में 1लाख 60 हज़ार करोड़ हो गया।28 हज़ार करोड़ तो कैश कर्ज़ है।आज स्थिति यह है कि कोल इंडिया के पास इतने पैसे नही की अपने कर्मचारियों का वेतन पूरा दे सके लिहाज़ा वेतन में 25 फीसदी की कटौती की है।बी एस एन एल में भी 50000 कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चित हो गया है।

पेट्रोल डीज़ल के दाम जिस तरह बढ़ाए जा रहें है तर्क दिया जा रहा है सऊदी अरब में तेल संस्थानों पर हमला।लेकिन मनमोहन सरकार के समय जब क्रूड ऑयल 140 डॉलर प्रति बैरल था तब पेट्रोल डीज़ल की कीमत क्रमशः 70-72,60-62 थी।आज 59 डॉलर प्रति बैरल कीमत 75-78,60-65 के आसपास है।क्यों नही पेट्रोल डीजल को जी एस टी के दायरे में लाकर कर 18 से 20 %कर निर्धारित कर दिया जाता ।तेल की बिक्री में तेल कंपनियां कितनी मनमानी करती है तेल पर 50%से ज्यादा तो विभिन्न तरह के कर इसमे 15 से 17 % तेल शोधन का कर भी वसूल जाता है।यानी कुल कर 60 से ऊपर जाता है तब भी सारी तेल कंपनियां घाटे में हैं यह गड़ित समझ से परे है।भारत मे करीब 4.5मिलियन बैरल तेल कि खपत है जिसमें 20%सऊदी अरब से आता है।

सरकार की अदूरदर्शिता का एक और उदाहरण रियल इस्टेट को सरकार ने 10000करोड़ का पैकेज दिया है जबकि जानकर का मानना है इस सेक्टर को 2 से 3 लाख करोड़ चाहिए।डेवलपर का कहना है 40000 करोड़ तो बैंको की देनदारी है तो इतने कम पैसों का कोई मायने नही रहता यह मोटे तौर पर पैसा बर्बाद करना ही है।तो ले देकर भारत की अर्थ व्यवस्था का रुख कही से भी 5ट्रिलियन डॉलर का नहीं लगता जितना है उसी को सुरक्षित रखें तो बड़ी बात होगी।

इसमें अब नरेंद्र मोदी जी को कुछ समय के लिए विदेशी दौरों को विराम देकर बदहाल अर्थ व्यवस्था पर गंभीरता से सोचना होगा।अपनी वाकपटुता का सभी क्षेत्रों के उधमियों और निवेशको का प्रत्येक मोर्चे पर हौसला बढ़ाने में करना होगा।प्रधानमंत्री को यह आश्वस्त करना होगा कि वास्तविक गलतियां और नुकसान स्वीकार होंगे और कानूनी ढंग से कमाई स्वागत योग्य होगी।बेवजह किसी को परेशान नही किया जाएगा, निर्भीक होकर व्यापार करने को सरकार पूरा समर्थन देगी।मुझे आशा है ज़रूर इसका असर पड़ेगा।

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