क्या चुनाव खंडित जनादेश की तरफ बढ़ रहा है?

संक्षेप:

  • लोकतंत्र का महापर्व अपने अंतिम दौर में
  • खंडित जनादेश की तरफ इशारा कर रहा है रुझान
  • एनडीए में भी बहुमत को लेकर आत्मविश्वास नहीं आ रहा नज़र

By: मदन मोहन शुक्ला

लोकतंत्र का महापर्व अपने अंतिम दौर में है। छठे दौर के मतदान के साथ 483 सीटों के लिए मतदान पूरा हो चुका है। केवल 59 सीटों के लिए मतदान 19 मई को होना है। उनसे जो रुझान मिल रहा है वो खंडित जनादेश की तरफ इशारा कर रहा है। अगर अंडर करंट जैसा कुछ है तो परिणाम कुछ भी हो सकता है। फिलहाल जो वर्तमान स्थिति है वो इशारा कर रही है कि न तो कांग्रेस और न ही बी जे पी को बहुमत मिलने जा रहा है। इस तरह से देखा जाय तो 23 मई बहुत महत्त्व पूर्ण तिथि होगी। यह चुनाव रोज़ी-रोटी, अर्थव्यवस्था , मंदी और तेल एवं बैंकों से जुड़े मुद्दे के बजाय जवाहर लाल नेहरू और राजीव गांधी को लेकर ज्यादा संजीदा है। जल्दी ही हमें इसका नतीजा भी मालूम पड़ जाएगा।

इधर एन0डी0ए0 खेमे में भी बहुमत को लेकर वो आत्मविश्वास नज़र नहीं आ रहा है। भा0ज0प0 और उनकी सहयोगी दल  संशय के दौर से गुज़र रहे है। इधर बी जे पी के  राम माधव का कहना है अगर बी जे पीे को 273 सीट भी मिल जाये तो बहुत बड़ी बात होगी। यही कुछ शंका सुब्रमण्यम स्वामी ने जताई है वो तो 200 सीट से ज्यादा न मिलने की बात कर रहें है। शिव सेना के संजय राउत का कहना है कि बी जे पी 280 के नीचे ही रहेगी।अकाली दल के नरेश गुजराल का मानना है कि बी जे पी बहुमत से बहुत दूर रहेगी।

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जो मोदी-शाह की जोड़ी का मिशन 400 प्लस है उस पर बी जे पी और सहयोगी दल एक मत क्यों नहीं?क्यों संशय की स्थिति है? कारण स्पष्ट है मतदाता की क्या मंशा है उसकी नब्ज़ टटोलने में ये नेता सफल रहे हैं। यह चुनाव मोदी  मोदी से लड़ रहे हैं।जब 2014 के जनादेश में पूर्ण बहुमत से मोदी को जिताया था और मोदी ने बेरोजगारी,गरीबी से जूझ रही जनता में एक उम्मीद जगाई थी जैसे सबका साथ सबका विकास, अच्छे दिन, भ्रस्टाचारियों की खैर नहीं दो करोड़ बेरोज़गारों को हर वर्ष नौकरी आदि आदि। लेकिन हुआ इसका उल्टा नोट बंदी ने आम जन की कमर तोड़ दी।

दि इकोनॉमिस्ट ने अपने एक लेख में लिखा है कि मोदी पिछले पांच साल में आर्थिक मोरचे पर पूरी तरह असफल रहे। सामाजिक वैमनस्य में बढ़ोतरी हुई जैसा कि अमेरिका कि दि टाइम्स मैगज़ीन ने अपनी कवर स्टोरी में मोदी को देश को बांटने वाला बताया है। इसके साथ साथ आर्थिक पहलुओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। देश पर जो क़र्ज़ 2014 में 54 लाख करोड़ था वह 2019 में बढ़कर 5400 लाख करोड़ कैसे पहुँच गया इसका जबाब मोदी के पास नहीं है।

जो चीजें मोदी के खिलाफ जा रही है जिसको विदेशी मैगज़ीन दि टाइम्स ने लिखी है, मोदी की विभाजन कारी नीति देश के लिए विध्वंसक साबित हुई। मोदी सरकार ने संस्थानों की स्वायतेता पर हमला किया।मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित ढंग से हमले हुए, मोदी ने इसपर कोई संज्ञान नहीं लिया। अमित शाह ने मुस्लिम शरणार्थी को दीमक कहा। पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की आवाज़ पर अंकुश लगाने की कोशिश की गई। स्वतंत्र भारत के इतिहास को मोदी नकारते रहे। लेकिन उनके नैतिक मापदंड क्या हैं, यह भी नहीं बताते। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते है। ऐसा भ्रम लोगों में पैदा किया मोदी है तो देश सुरक्षित है। मोदी साम्प्रदायिक तनाव दूर करने में नाकाम रहे।

1984 के लिए दिवंगत राजीव गांधी को तो कोसते है लेकिन खुद 2002 में अपने  मुख्यमंत्रीत्य काल में जो गुजरात में दंगे हुए 2500 से ऊपर मुसलमान का क़त्ल कर दिया गया लेकिन मोदी ने आज तक माफ़ी नहीं मांगी। आर्थिक पहलू मोदी का देखें तो जी0एस0टी0 1लाख करोड़ से ऊपर नहीं बढ़ा। इसी तरह कॉर्पोरेट टैक्स का संग्रह भी 80000 करोड़ कम हुआ। मोदी सरकार कैसे डब्लू टी ओ और वर्ल्ड बैंक के हाथों की कठपुतली बन गई। जाने माने अर्थशास्त्री पनगढ़िया अपने एक लेख में लिखते हैं कि मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धि के नाम पर है देश में शौचालयों का निर्माण एवं स्वच्छ भारत अभियान एवं आयुष्मान भारत। जबकि इसका नकारत्मक पहलु किसानों की 2017-18 में आय पांच गुना नीचे चली गई और तो और शिक्षा और स्वास्थ्य पर करंट बजट में कोई फण्ड आवंटित नहीं किया गया।

यह सारी चीज़ें टाइम्स मैगज़ीन की एनालिसिस में मोदी को बहुमत पाने और पी0एम0 बनने में सबसे बड़ी रूकावट पैदा कर रही है। अगर बी जे पी बहुमत पाने में नाकाम रहती है तो दो स्थीतियां पैदा होगी। पहला बी जे पी के अंदर से जो आवाज़ दबी है मोदी के खिलाफ मुखर होगी। जैसा कि संकेत मिलना शुरू हो गया है, अभी हाल ही में नितिन गडकरी से एक इंटरव्यू में यह पूछा गया कि मोदी शाह अपने भाषणों में बी जे पी सरकार की जगह मोदी सरकार या मैंने किया कहते है। इसके जवाब में गडकरी ने कहा बी जे पी विचाराधारित पार्टी है यह मोदी-शाह की नहीं हो सकती।

दूसरा चौंकाने वाला पहलू एक और है मोदी-शाह भी कच्चे खिलाड़ी नही हैं। वो सत्ता को अपने हाथ से इतनी आसानी ने नहीं जाने देंगे और बी जे पी में उठने वाले विरोध के स्वर को बखूबी जानते हैं। वे जानते हैं सत्ता को पाने में पावर मैनेजमेंट के साथ साथ मनी मैनेजमेंट भी गेम चेंजर हो सकता है इसके लिए मोदी शाह ने पूरी तैयारी कर रखी है।

ए0डी0आर0 की एक रिपोर्ट बताती है बी जे पी के खाते में जो फण्ड का पैसा जमा है वो केवल 65 करोड़ यानि फंडिंग के मामले में बी जे पी 5वें पायदान पर है यानि कांग्रेस और बसपा से भी नीचे लेकिन अंदर की कहानी कुछ और ही है। अगर पिछले पांच साल में बी जे पी को कॉर्पोरेट घरानों से मिलने वाले फण्ड का आंकलन करें तो 2013-14 में जब मोदी पीएम के दावेदार थे तब कॉर्पोरेट घरानों से 85 करोड़ 37 लाख, 2014-15 में जब मोदी पी एम बने तो पार्टी को 1 अरब 77 करोड़ 65 लाख मिले। 2015-16 में 6अरब 36 करोड़ 88लाख, 2016-17में 12 अरब 96करोड़ 5लाख पार्टी को कॉरपोरेट घरानों से मिला। इसी तरह बी जे पी शासित प्रदेशों में 10 खरब राजनीतिक चंदे के रूप में मिला। बी जे पी को कॉरपोरेट घरानों से 6 खरब मिले । मोदी सरकार ने इन कॉरपोरेट घरानों को 60 खरब का फ़ायदा पहुँचाया।

अब सवाल उठता है कि बी जे पी के खाते में केवल 65 करोड़ जिसकी आयकर विभाग भी पुष्टि करता है तो बाकी पैसा क्या मोदी-शाह ने कही दूसरी जगह रखा है। क्योंकि चुनाव के बाद खंडित जनादेश और मोदी की महत्वाकांछा प्रधानमंत्री बनने की है तो यहाँ हॉर्स ट्रेडिंग की पूरी सम्भावना है जिसके अमित शाह पुराने खिलाड़ी है।बस 23 मई तक इंतजार करें।

लोकतंत्र क्या 23 मई के बाद रूपए की चाशनी में लिपटा होगा। मोदी-शाह का ट्रैक रिकॉर्ड खरीद फरोख्त में बहुत कुख्यात है जैसा कि हमने गोवा, अरुणाचल प्रदेश,गुजरात,मणिपुर और अभी हाल में कर्नाटक में देखा। यहाँ एक सवाल और उठता है कि बी जे पी के साथ जो अन्य दल है वो बहुमत न मिलने पर मोदी के नाम पर अगर सहमत नहीं होते तो क्या संघ की पहली पसंद मोदी होंगे। नितिन गडकरी,राजनाथ या प्रकाश जावेडकर में से किसी एक पर अगर अलायन्स सहमत होता है तो उस दशा में क्या मोदी प्रधानमंत्री की दावेदारी छोड़ेंगे। इसकी सम्भावना कम ही लगती है क्योंकि मोदी की हठधर्मिता,जिद्दीपन,तानाशाह वाली छवि संघ की मंशा से विद्रोह कर सकती है। क्योंकि पॉवर मैनेजमेंट और मनी मैनेजमेंट अमित मोदी के पास है। दूसरा मोदी को संघ ने भले ही पाला पोसा हो,शिखर तक पहुंचाया हो लेकिन आज मोदी का संघीय कट्टरता ,कॉरपोरेट क्रूरता और काइयाँपन के रसायन से उदय हुआ है। इसमे राष्ट्रपति की भूमिका अहम् होगी वह कितना न्याय करते हैं।

दूसरी तरफ विपक्षी खेमा भी सक्रिय हो गया है। खंडित जनादेश की आशंका से।पिछले दिनों राहुल गांधी की चंद्र बाबू नायडू से मुलाकात फिर चंद्र बाबू की ममता बनर्जी से मुलाक़ात। अब 21 मई को 21 सियासी दलों की सरकार बनाने की रणनीति को लेकर मुलाक़ात अहम् मानी जा रही है। इसी बीच तेलंगना के मुख्यमंत्री की कांग्रेस को अलग कर फ़ेडरल फ्रंट की कवायद को समर्थन न केरल के मुख्यमंत्री से न हीं डी0 म 0के0 के स्टालिन से मिला स्टालिन ने तो राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया इस वजह से के सी आर ने विपक्षी मोर्चे में शामिल होने का मन बना लिया। अब सम्भावना यह बन रही है कांग्रेस को फ्रंट रनर के तौर पर एक छतरी के नीचे विपक्षी संगठन सरकार बनाने की दिशा में कार्यरत होंगे।

यहाँ जो सत्ता में है उनकी कोशिश होगी सत्ता बचाने की। और विपक्ष की कोशिश होगी सत्ता में आने की। सत्ता किसकी होगी इसमें विपक्ष को सचेत और एकजुट रहने की। सत्ताधारी पैसो से खरीद फरोख्त करेंगे । अपने सांसदों पर कड़ी नज़र रखनी होगी इसमे चंद्र बाबू नायडू की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

अब सारा दारोमदार राष्ट्रपति के विवेक पर होगा वो कितना जस्टिस करते हैं। अगर राष्ट्रपति सबसे ज्यादा सीट लाने वाले दल की जगह  कम सीट लाने के बावजूद भी बी जे पी को सरकार बनाने का एक मौका देते हैं तो इतिहास एक बार फिर दोहराएगा जैसा की अभी हाल में कर्नाटक में हम सबने देखा था किस तरह से बी जे पी ने संविधान की धज़ियाँ उड़ाई थी। उस स्थति में चंद्र बाबू नायडू की भूमिका अहम् होगी लोकतंत्र की रक्षा के लिए कोशिश होनी चाहिए की मोदी दुबारा प्रधानमंत्री ना बने इसके लिए विपक्ष को एक मंच पर होना होगा। इनमें कुछ दल जो सत्ता के लिए मोदी के जाल में फँस सकते हैं उन पर कड़ी नज़र रखनी होगी। इसमें खासतौर से उ0प्र0 से महागठबंधन एवं उड़ीसा से नवीन पटनायक। साथ साथ एक मत से प्रधानमंत्री कौन होगा इसमे सारे दलों की रजामंदी -एकमत होना होगा अन्यथा एक स्वस्थ्य लोकतंत्र और आमजन अच्छे दिन की आस से दूर हो जायेगा यह 123 करोड़ जनता के साथ घोर अन्याय होगा।

                                                                                                                                                                                                                      यह लेखक के अपने विचार है.

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