केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे बोले, 'बिहार में चमकी बुखार से हो रही मौतों में हुई कमी'

संक्षेप:

  • बिहार में पिछले कई वर्षो से गर्मी के मौसम में बच्चों के लिए काल बनकर आ रहा चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम बीमारी का कहर इस साल भी जारी है
  • इन सबके बीच मोदी सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने मंगलवार को कहा कि बिहार में इंसेफ्लाइटिस से हो रही मौतों में कमी आई है
  • चौबे ने कहा कि केंद्र और बिहार सरकार के डॉक्टरों की टीम प्रदेश में लगातार काम कर रही है. 

बिहार में पिछले कई वर्षो से गर्मी के मौसम में बच्चों के लिए काल बनकर आ रहा चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) बीमारी का कहर इस साल भी जारी है. इन सबके बीच मोदी सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने मंगलवार को कहा कि बिहार में इंसेफ्लाइटिस से हो रही मौतों में कमी आई है. चौबे ने कहा कि केंद्र और बिहार सरकार के डॉक्टरों की टीम प्रदेश में लगातार काम कर रही है. उन्होंने कहा कि हम स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं. सरकार लोगों को इंसेफ्लाइटिस को लेकर जागरुक करने का काम कर रही है.

इस बीमारी से अबतक 150 से अधिक बच्चों की मौत हो गई है. इस बीमारी के सही कारणों का तो अबतक पता नहीं चल सका है, परंतु जानकारों का कहना है कि इसका मुख्य कारण कुपोषण और तापमान व वातावरण में अधिक नमी है.

आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि जिस वर्ष 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान लंबे समय तक रहा, उस साल मृतकों की संख्या में वृद्धि देखी गई है. मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ शिशु रोग चिकिसक डॉ. अरुण शाह बताते हैं कि बच्चों की मौतों के इस सिलसिले के पीछे गरीबी और कुपोषण असली वजह है. इस बीमारी को लेकर काम कर चुके शाह कहते हैं कि यह बीमारी न तो किसी वायरस से हो रही है, न बैक्टीरिया से और न ही संक्रमण से. इस बीमारी के लक्षणों में बुखार, बेहोशी और शरीर में झटके लग कर कंपकंपी छूटना शामिल हैं.

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उन्होंने बताया कि एईएस से पीड़ित बच्चों में अधिकांश गरीब तबके से आते हैं. उन्होंने कहा, "कुपोषित बच्चों के शरीर में रीसर्व ग्लाइकोजिन की मात्रा भी बहुत कम होती है, इसलिए लीची खाने से उसके बीज में मौजूद मिथाइल प्रोपाइड ग्लाइसीन नामक न्यूरो टॉक्सिनस जब बच्चों के भीतर एक्टिव होते हैं, तब उनके शरीर में ग्लूकोज की कमी हो जाती है."

आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2012, 2013, 2014 और 2019 में एईएस से बच्चों की सबसे अधिक मौतें हुईं. इन वर्षो में मई और जून का अधिकतम तापमान 40 डिग्री या इससे ऊपर रहा. वर्ष 2012 में जब मई महीने का तापमान 42 डिग्री और जून का 41 डिग्री सेल्सियस रहा, तो 275 बच्चों की मौत हुई. वहीं, 2014 में मई और जून माह में 41 डिग्री सेल्सियस तापमान रहा तो सर्वाधिक 355 बच्चों की मौतें हुईं. जबकि वर्ष 2019 में मई माह में में पिछले 10 सालों में सर्वाधिक तापमान 43 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है

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